नाइजीरिया: बोको हराम क्यों है 'बेकाबू'?

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नाइजीरिया के राष्ट्रपति गुडलक जोनाथन को उत्तर-पूर्वी नाइजीरिया में 'आपातकाल' घोषित किए एक साल बीत गया है लेकिन अब तक उन्हें इस्लामी चरमपंथ को रोकने में कोई ख़ास कामयाबी नहीं मिली है.

नाइजीरिया के चरमपंथी संगठन बोको हराम ने सेना के बैरकों पर हमला, उत्तरी शहर कानो के बस स्टेशन पर बम विस्फोट और चार बच्चों समेत फ्रांसीसी परिवार के अपहरण जैसे कामों से दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है.

राष्ट्रपति ने 'आपातकाल' जैसा गंभीर क़दम उठाते हुए यह उम्मीद ज़ाहिर की थी कि इससे हिंसा की इन घटनाओं पर लगाम लगेगी और इलाक़े में सामान्य स्थिति बहाल होगी.

आपातकाल

बोको हराम ने सेना के कई ठिकानों पर हमले किए, राजधानी अबुजा के एक व्यस्त बस टर्मिनल पर दो बार बमबारी की और बोर्नो राज्य के चिबोक कस्बे में स्थित आवासीय स्कूल से 200 से अधिक छात्राओं का अपहरण किया.

नाइजीरिया में क्या है बोको हराम?

नाइजीरिया के 'डेली ट्रस्ट' अख़बार के संपादक हबीब पिंडिगा मानते हैं कि आपातकाल लागू होने के बावजूद स्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया है.

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ब्रिटेन के 'ससेक्स विश्वविद्यालय' की ओर से जुटाई गई जानकारी के अनुसार नाइजीरिया के अदामावा, बोर्नो और योब राज्यों में आपातकाल के दौरान 741 नागरिकों की मौत हुई है.

यदि पिछले 12 महीने की बात की जाए तो मारे जाने वाले नागरिकों की संख्या तीन गुना होकर 2,265 तक पहुंच गई है.

हबीब पिंडिगा का कहना है कि सेना अपने सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने में विफल रही है.

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सेना के मानवाधिकार रिकॉर्ड के कारण स्थानीय लोगों का सेना पर विश्वास नहीं है. इसके अलावा सेना के पास आधुनिक हथियारों, प्रशिक्षण और प्रेरणा की कमी रही है.

नाइजीरिया की सेना के साथ काम कर चुके सेवानिवृत कर्नल और ब्रिटेन के ब्रितानी सैन्य अधिकारी जेम्स हॉल का मानना है कि नाइजीरिया के सैनिक ऐसी हालत में फंसे हुए हैं जहांसे निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं दिखता.

जेम्स हॉल कहते हैं, "नाइजीरिया सरकार की दिक्कत यह है कि वह एक ऐसा बटन चाहती है जिसे दबाने भर से सारी समस्याएं सुलझ जाएं."

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सैन्य कार्रवाई

कर्नल जेम्स बताते हैं, "एक वरिष्ठ कमांडर ने मुझसे पूछा कि क्या हम उन्हें कोई ऐसी मशीन बेच सकते हैं जो सड़क पर चलती हुई कार में बैठे चरमपंथी की जानकारी दे."

वह कहते हैं, "मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि ऐसी कोई मशीन नहीं होती. लेकिन उन्हें शक है कि हम उन्हें इसके बारे में बताना नहीं चाहते."

उनका कहना है कि ब्रिटेन प्रशिक्षण संबंधी कोई सहायता देने में काफी एहतियात बरतता है, इसके अलावा बेहतर उपकरणों की बिक्री में भी समस्या आती है.

ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने नाइजीरिया सरकार की सैन्य कार्रवाई और रणनीति की आलोचना की है.

एमनेस्टी की एक रिपोर्ट के मुताबिक मार्च में मैदुगुरी जिवा बैरक पर हमले में सैन्य कार्रवाई में करीब 600 लोग मारे गए थे.

हालांकि नाइजीरियाई सेना ने अफ्रीका में कई शांति अभियानों में भागीदारी करके अच्छी प्रतिष्ठा हासिल की है, लेकिन वह अपने अतीत की विरासत को नहीं बचा पाई.

नाइजीरिया अपहरणकर्ता बोको हराम से बातचीत को तैयार

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कर्नल जेम्स मानते हैं कि सेना ने ख़ुद को अपंग बना लिया है. नाइजीरियाई सेना इन आलोचनाओं को खारिज करती है.

राजधानी अबुजा में प्रेस से बात करते हुए ब्रिगेडियर जनरल ओलाजीदे लालेय ने कहा कि विद्रोह को रोकने के लिए सेना जो कर सकती थी, कर रही है.

उन्होंने कहा, "बड़े पैमाने पर चरमपंथ विरोधी अभियानों के साथ ही साथ नागरिकों की सहायता के लिए चलाए जाने वाले अनगिनत सहयोग कार्यों के कारण सेना के जवानों और संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ा है."

सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए सेना ने उनकी मौत के बाद परिवार को पहले से ज़्यादा समय तक मदद दिए जाने की घोषणा की.

आम तौर पर सैनिकों की मौत के बाद परिजनों को तीन महीने तक के वेतन भुगतान का नियम है.

'विश्वास की कमी'

नाइजीरियाई प्रेक्षकों का कहना है कि सेना की क्षमता के अलावा अन्य कई कारणों से भी मौजूदा स्थितियों से निपटने की क्षमता पर प्रभाव पड़ा है.

तेल बहुल इलाके दक्षिणी नाइजर डेल्टा में सक्रिय रहने वाले पूर्व कार्यकर्ता लीदम मिती बताते हैं, "राजनीतिक ढांचे में जनता का विश्वास कम हो रहा है."

कार्यकर्ता लीदम मिती ने राष्ट्रपति गुडलक जोनाथन के करियर को काफी करीब से देखा है. गुडलक जोनाथन भी नाइजर डेल्टा से ताल्लुक रखते हैं.

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नाइजीरिया में 'अगवा लड़कियों' का वीडियो जारी

वर्तमान में उत्तर-पूर्वी तीन राज्यों का राजनीतिक नेतृत्व विपक्षी पार्टी ऑल प्रोग्रेसिव कांग्रेस (एपीसी) के साथ गठबंधन में है.

मिती कहते हैं, "गठबंधन में शामिल नेता राष्ट्रपति के ज्यादा करीबी हैं. वे राष्ट्रपति को यही बताते हैं कि बोको हराम उत्तरी इलाक़े की राजनीति की पैदाइश हैं. इसका असर ये होता है कि वह पूरे मामले से ख़ुद को दूर रखते हैं."

कार्यकर्ता लीदम मिती का ये भी कहना है कि नाइजीरियाई सेना के कमांडर भी राष्ट्रपति के साथ राजनीति कर रहे हैं.

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वे कहते हैं, "हालात ये है कि यदि ये अधिकारी वास्तविक स्थिति का बयान करते हैं तो उनके अयोग्य समझे जाने का ख़तरा रहेगा. इसलिए ये लोग अपने राष्ट्रपति को स्थिति की गंभीरता को कम करके बताते हैं."

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मिती कहते हैं कि जब संकट पैदा होता है तो कोई भी इससे निपटने में सक्षम नहीं दिखाई देता क्योंकि वे सब उलझन में होते हैं.

चिबोक से लड़कियों के अगवा किए जाने के कारण पैदा हुए अंतरराष्ट्रीय दबाव ने सरकार को अपना रुख़ बदलने पर मजबूर किया है.

नाइजीरिया की सरकार ने चीन, फ्रांस, इजरायल, ब्रिटेन और अमरीका के सलाहकारों को सेना की मदद करने की इजाज़त दे दी है.

लेकिन विभिन्न देशों के सलाहकारों की भूमिका अपहृत लड़कियों की तलाश तक ही सीमित रहेगी. नाइजीरिया की सैन्य क्षमता बढ़ाने से इनका कोई वास्ता नहीं होगा.

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