थाईलैंड में मार्शल लॉ क्यों लगा?

थाईलैंड मार्शल लॉ इमेज कॉपीरइट AP

थाई सेना ने कई महीनों की राजनीतिक अस्थिरता के बाद मार्शल लॉ लगा दिया है. राजधानी में सैनिक तैनात हैं, जिन्हें बहुत सी शक्तियां दे दी गई हैं. मगर सेना ने ज़ोर देकर कहा है कि यह तख्तापलट नहीं है.

थाई सेना के कमांडर जनरल प्रयूथ चान ओचा ने कहा है कि ‘हथियारों का इस्तेमाल करके नागरिकों को ख़तरे में डाल रहे दुर्भावनापूर्ण संगठनों’ की मौजूदगी की वजह से मार्शल लॉ लागू किया गया है.

मगर देश में राजनीतिक उठापटक कई महीनों से जारी है, और अब भी यह साफ़ नहीं है कि सेना ने अचानक अब यह कार्रवाई करने का फ़ैसला क्यों लिया.

सरकार विरोधी आंदोलनकारी पिछले कुछ समय से कैबिनेट को हटाने की धमकी दे रहे हैं, पर ऐसी धमकियां पहले भी दी जा चुकी हैं.

पिछले हफ़्ते सरकार विरोधी प्रदर्शनकारी खेमे पर हमले में तीन लोग मारे गए थे और सेना ने हिंसा की स्थिति में ‘निर्णायक कार्रवाई’ की चेतावनी दी थी. मगर इसके बावजूद मंगलवार के ऐलान के लिए कोई सीधा कारण मौजूद नहीं था.

क्या यह तख्तापलट है?

सेना ने मार्शल लॉ लगाते हुए कहा है, "यह कोई तख्तापलट नहीं है."

इमेज कॉपीरइट Reuters

लेकिन बहुत से थाई विश्लेषकों के लिए यह बहुत बड़ी कार्रवाई है. ह्यूमन राइट्स वॉच के एशिया डायरेक्टर ब्रैड एडम्स ने इसे "वास्तविक तख्तापलट" की संज्ञा दी है.

थाईलैंड की सेना ने पिछले कुछ दशकों में कई बार तख्तापलट किए हैं– 1932 में पूर्ण राजशाही के ख़ात्मे के बाद से अब तक 11 बार ऐसा हो चुका है.

ताज़ा तख़्तापलट 2006 में हुआ था, जब प्रधानमंत्री थाकसिन चिनावाट को भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद सेना ने पद से हटा दिया था.

सेना पर अक्सर सरकार विरोधी खेमे के लिए सहानुभूति रखने के आरोप लगते रहे हैं, मगर फिलहाल सरकार कह रही है कि सेना उसके नियंत्रण में है और यह तख्तापलट नहीं है.

बैंकॉक में बीबीसी के जोनाथन हेड कहते हैं कि बहुत कुछ इस पर निर्भर है कि सेना के कमांडर कैसे सरकार के साथ मिलकर काम करते हैं, जो आम चुनावों के लिए कोई तारीख तय करने की कोशिश कर रही है या फिर वह इसे विस्थापित करने का फ़ैसला लेते हैं.

ज़मीनी हक़ीक़त

इमेज कॉपीरइट AP

थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक और शहर से बाहर अहम ठिकानों पर सेना मार्च कर रही है.

सड़कों पर टैंक खड़े हैं और रेडियो और टीवी स्टेशन बंद कर दिए गए हैं. सैनिक मुख्य सरकारी इमारतों में घुस गए हैं, जो महीनों के प्रदर्शन के बाद से खाली पड़ी हैं.

हालांकि बैंकॉक में आम जनजीवन पर ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ा है. स्कूल, कारोबार और पर्यटन केंद्र खुले हैं और यातायात भी आम दिनों की तरह चल रहा है.

रेड शर्ट्स के नाम से मशहूर, सरकार समर्थक आंदोलनकारियों, ने कहा है कि वह राजधानी के बाहर अपनी रैलियां जारी रखेंगे मगर साथ ही कहा गया है कि उनके समर्थक सैनिकों को चुनौती न दें.

समस्या की जड़

थाईलैंड में ज़्यादातर ग्रामीण, ग़रीब थाकसिन समर्थकों और शहरी मध्यवर्ग के बीच गंभीर राजनीतिक मतभेद हैं, जिसे थाई राजनीति में उनके बढ़ते प्रभाव की तरह देखा जाता है.

2006 में थाकसिन को सत्ता से हटाए जाने के बाद से दोनों ओर से लगातार विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं, जो पिछले कुछ साल में मौजूदा थाकसिन समर्थित फ्यू थाई सरकार पर केंद्रित हो गए हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty

पिछले साल नवंबर में विरोध प्रदर्शन हिंसात्मक होने शुरू हो गए थे जब निचले सदन ने विवादित क्षमादान विधेयक पास किया. इसके बारे में आलोचकों का कहना था कि इसके ज़रिए थाकसिन बिना जेल में वक़्त बिताए निर्वासन से वापस लौट सकते हैं.

सरकार विरोधी खेमे का दावा है कि प्रदर्शनों के दौरान अब तक क़रीब 28 लोगों की मौत हो चुकी है.

इस महीने की शुरुआत में हालात तब और बिगड़े जब एक अदालत के विवादित आदेश के बाद थाकसिन की बहन यिंगलक को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया. इसमें कहा गया था कि उन्होंने अवैध ढंग से अपने राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख को दूसरे पद पर स्थानांतरित कर दिया था.

दो गुट

सरकार विरोधी प्रदर्शनकारी एक पृथकतावादी गुट है, जो थाकसिन के ख़िलाफ़ विपक्ष में एकजुट है. इनका नेतृत्व एक पूर्व उप प्रधानमंत्री सुथेप थॉगसुबान कर रहे हैं जिन्होंने रैलियां करने के लिए विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था.

इमेज कॉपीरइट AFP

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि फ़्यू थाई सरकार ग़ैरज़िम्मेदाराना ढंग से वादे करके वोट खरीद रही है, जिसका मक़सद अपने समर्थकों का विस्तार करना है और इसके ज़रिए एक कमज़ोर लोकतंत्र को जन्म देना है.

वह चाहते हैं कि सरकार को हटाया जाए और राजनीतिक सुधारों की देखरेख के लिए एक अंतरिम प्रशासन नियुक्त किया जाए.

इसके विरोध में रेड शर्ट्स ज़्यादातर सरकारी नीतियों के समर्थक रहे हैं और उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर उनकी चुनी गई सरकार को हटाया गया, तो वे बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरेंगे.

वे बड़ी संख्या में रैलियां कर चुके हैं, मगर अब तक सड़कों पर नहीं आए हैं. पर्यवेक्षकों का डर है कि अगर वे फिर प्रदर्शन का फैसला करते हैं, तो इसके नतीजे में हिंसा होगी.

रेड शर्ट्स के नेता जातुपोर्न प्रॉमपान ने कहा है कि उनका ग्रुप मार्शल लॉ को कुबूलने को तैयार है पर "तख्तापलट या सत्ता पाने के दूसरे असंवैधानिक तरीकों को स्वीकार नहीं करेंगे.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार