फ़ुटबॉल विश्व कपः ब्राज़ील के लिए 'ईश्वर' दागेंगे गोल

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फ़ुटबॉल विश्व कप का मेज़बान ब्राज़ील 12 जून को जब क्रोशिया के ख़िलाफ़ पहला मैच खेलेगा, तब ईश्वर भी मैदान में होंगे. ब्राज़ील की ओर से पहला गोल बेशक कोई भी दागे, पर श्रेय ईश्वर को ही जाएगा.

सब जानते हैं कि फ़ुटबॉल ब्राज़ील में धर्म की तरह है लेकिन धर्म भी खेल में ख़ुद को कई तरह से अभिव्यक्त कर रहा है. मैदान पर और मैदान के बाहर खिलाड़ियों का बर्ताव देश के बदलते धार्मिक परिदृश्य के बारे में बहुत कुछ कहता है.

मैदान में खिलाड़ियों को अब ईसाई धर्म के प्रतीक क्रॉस को बनाते हुए देखा जा सकता है. हाल में ईसायत के भावों का प्रदर्शन बढ़ा है.

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Image caption फ़ीफ़ा ने ऐसा करने पर काका के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी की थी.

2002 के विश्वकप फ़ाइनल में जीत के बाद ब्राज़ील की पूरी टीम ने मैदान में ही एक साथ प्रार्थना की. कुछ खिलाड़ियों ने अपनी जर्सी उतारी जिसके भीतर उन्होंने टी-शर्ट पहनी हुई थी जिस पर लिखा था 'मेरा जीवन ईसा का है.'

सोलहवीं सदी में पुर्तगालियों के अधीन होने के बाद ब्राज़ील एक ईसाई बहुल देश हो गया. 1940 के दशक तक देश की 99 फ़ीसदी आबादी कैथोलिक ईसाई थी. अब यह संख्या 63 फ़ीसदी है.

नास्तिक और अनीश्वरवादी भी

दूसरी ओर ब्राज़ील में प्रोटेस्टेंट चर्च के प्रति भी श्रद्धा बढ़ी है. इस्लाम, बौद्ध और उमबांडा और केंडोम्ब्ले जैसे अन्य अफ़्रीकी-ब्राज़ीली धर्मों के अनुयायियों में भी इज़ाफ़ा हुआ है.

यही नहीं देश में नास्तिकों और अनीश्वरवादियों की संख्या में भी भारी बढ़ोत्तरी हुई है. 2010 की जनगणना के मुताबिक आठ प्रतिशत लोगों का कहना है कि वो किसी मज़हब में यक़ीन नहीं रखते हैं.

लेकिन ब्राज़ील में नव-पेंटाकोस्टाइल के प्रति लोगों में बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई है. आत्मा, झाड़-फूंक और दैवीय चिकित्सा वाला ईसाई संप्रदाय 'पेंटाकोस्टलिज्म' बीसवीं शताब्दी के शुरुआती सालों में अमरीका से ब्राज़ील पहुँचा था. 1970 के दशक में ब्राज़ील में नव-पेंटाकोस्टल गिरजाघरों की संख्या बढ़ने लगी.

1990 के दशक के बाद से ब्राज़ील में धर्मों की स्थिति पर शोध कर रहे लेंकास्टर यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ व्याख्याता एंड्रयू डॉसन कहते हैं कि नव-पेंटाकोस्टल गिरजाघरों ने उस समय की ज़रूरत पूरी की.

वे कहते हैं, "1960 के दशक में ब्राज़ील में भारी ओद्योगिकरण हुआ. इसके साथ हुई सामाजिक और सांस्कृतिक उधल-पुथल के कारण विस्थापित लोगों को धर्म और जीवनशैली को लेकर ऐसे विकल्प मिले जो पहले नहीं थे. इस तेज़ी से बदलते परिवेश में नव-पेंटाकोस्टेलिज़्म के व्यक्तिवाद तथा आत्मनिर्भरता पर ज़ोर ने इसे प्रचिलित किया."

'यूनिवर्सल चर्च ऑफ़ द किंग्डम ऑफ़ द गॉड' ब्राज़ील का सबसे बड़ा नव-पेंटाकोस्टल चर्च है. सामान्य तौर पर ईसाई धर्म पश्चिम से दूसरे देशों में पहुंचा है लेकिन अब ये अभियान ब्राज़ील से विदेशों को जा रहा है. चर्च का अपना ग्लोबल टीवी नेटवर्क है. ब्राज़ील में इसके लगभग अस्सी लाख सदस्य हैं और लगभग दस लाख अनुयायी विदेशों में हैं. इसके अनुयायी बड़े मंदिरों में एक साथ इकट्ठा होते हैं.

आस्था का टकराव

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साओ पाउलो में बन रहे सबसे नए चर्च का अगला हिस्सा 56 मीटर ऊँचा होगा और यह रियो डे जेनेरियो की 'क्राइस्ट द रिडीमर' मूर्ति से भी बड़ा होगा.

ब्राज़ील की शांत और समधर्मी संस्कृति में लोकप्रिय कैथोलिक और अफ़्रीकी-ब्राजीली धर्म सदियों से सहिष्णुता से साथ रह रहे थे लेकिन नव-पेंटाकोलिज़्म ने इसमें तनाव पैदा कर दिया है.

कैथोलिक संत और अफ़्रीकी-ब्राजीली धर्मों के देवता एक-दूसरे में समाहित होते गए और किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाया.

लेकिन नव-पेंटाकोलियाइयों ने इस पर कठोर रुख अपनाया. अफ़्रीकी-ब्राजीली धर्मों की राक्षसी बताकर आलोचना की गई.

नव-पेंटाकोलिस्टियाई शुरुआत में फ़ुटबॉल को भी 'शैतान का अंडा' कहकर इसकी आलोचना करते थे. लेकिन अब ये मार्केटिंग का बड़ा मौका है. टीवी पर दुनिया का सबसे ज़्यादा देखे जाने वाला यह आयोजन धर्म प्रचार का बहुत बड़ा मौक़ा है.

जीवन के दर पहलू में धर्म

सांता कैटेरिना की फ़ेडेरल यूनिवर्सिटी में सामाजिक मानवविज्ञानी प्रोफ़ेसर कार्मेन रियाल का कहना है कि उन्होंने ब्राज़ील के जिन 60 फ़ुटबॉलरों के साक्षात्कार किए हैं उनमें से लगभग सभी धार्मिक हैं.

वे कहती हैं, "मैं उनके रहन सहन को लेकर अध्ययन कर रही थी. इसलिए मैंने उनसे धर्म पर सीधे सवाल तो नहीं पूछे लेकिन धर्म हर जगह आ रहा था. जब मैं उनके साथ उनकी कार में चल रही थी तो धार्मिक गीत बज रहे थे. जब मैं उनसे घर पर मिली तो वे धार्मिक टीवी चैनल देख रहे थे. उनकी पत्नियों ने मुझे बताया कि परिवार चर्च जाते हैं."

ब्राज़ील के चर्चित फ़ुटबॉलरों में से कई नव-पेंटाकोस्टालिज़्म के अनुयायी हैं जो देश और विदेश में अपने धर्म का प्रचार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. 1994 में विश्व कप जीतने वाली ब्राज़ील की टीम के सदस्य जोरगिंघों ने म्यूनिख़ में एक चर्च का निर्माण करवाया. एसी मिलान के खिलाड़ी काका का कहना है कि रिटायर होने के बाद कोच बनने के बजाए पादरी बनना पसंद करेंगे.

खिलाड़ी अपनी कमाई का दसवां हिस्सा चर्च को दान करते हैं. जिन गिरिजाघरों के वे सदस्य हैं उनके लिए ये अच्छी ख़बर है. इससे फ़ुटबॉल को भी फ़ायदा होता है.

प्रोफ़ेसर रियाल का कहना है कि ब्राज़ील के खिलाड़ियों की छवि बिगड़ैल लड़कों जैसी थी. वे बहुत कम समय में बहुत अधिक पैसा कमा लेते थे जिसके बाद उनका ध्यान कई तरह की चीज़ों की ओर भागता था. लेकिन नव-पेंटाकोस्टालिज़्म के के साथ उनकी छवि सुधरनी शुरू हुई है.

'अनुशासन बढ़ा है'

वे कहती हैं, "फ़ुटबॉलर न सिर्फ़ धार्मिक नियमों का पालन करते हैं, वे कोच और क्लब के नियमों से भी ख़ुद को बांधते हैं. अनुशासन में उनका यक़ीन बढ़ा है और यह उनके करियर के लिए बेहद फ़ायदेमंद साबित होता है क्योंकि उनका करियर उनके शारीरिक क्षमता पर ही निर्भर करता है."

हालांकि खेल के मैदान में ईसाइयत का प्रदर्शन फ़ुटबॉल की नियामक संस्था फ़ीफ़ा को बहुत नहीं भा रहा. 2009 में कंफ़ेडरेशन कप के दौरान फ़ीफ़ा ने ईसाइयत का प्रदर्शन करने वाली टी-शर्टों के प्रदर्शन पर काका और लूसियो के ख़िलाफ़ अनुशासनिक कार्रवाई भी की थी.

तो क्या इस विश्व कर के दौरान ब्राज़ील के खिलाड़ी मैदान पर धर्म का जश्न मनाने से परहेज़ करेंगे?

प्रोफ़ेसर रियाल कहती हैं, "मुझे लगता है कि हर गोल के बाद ईश्वर का धन्यवाद अदा किया जाएगा लेकिन इस बार धार्मिक आस्था का स्पष्ट प्रदर्शन शायद ही देखने को मिले. लेकिन यदि वे विश्वकप जीत जाते हैं तो निश्चित तौर पर जश्न बेहद मुखर होगा."

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