थाईलैंड में सैन्य तख्तापलट का विरोध

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अमरीका समेत कई देशों ने थाईलैंड में सैन्य तख्तापलट की आलोचना की है. इस दक्षिण पूर्वी एशियाई मुल्क की पहली रात गुरुवार को कर्फ़्यू तले बीती.

अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा, ''सैन्य तख्तापलट का कोई औचित्य नहीं था. थाईलैंड की 10 मिलियन डॉलर की द्विपक्षीय मदद निलंबित की जा सकती है.''

फ्रांस और जर्मनी ने भी सैन्य कार्रवाई की आलोचना की है, जबकि संयुक्त राष्ट्र ने इस पर गहरी चिंता ज़ाहिर की है.

थाईलैंड में लंबे समय से जारी राजनीतिक गतिरोध के बाद गुरुवार को सेना ने मार्शल लॉ लगाकर संविधान निलंबित कर दिया था और सभी नागरिक शक्तियों को अपने हाथ में ले लिया था.

देश में लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी लगा दी गई है और राजनीतिज्ञों को हिरासत में लिया जा रहा है.

सेना ने कहा है कि कई महीने से देश में जारी उथलपुथल के बाद ये कदम उठाना ज़रूरी हो गया था.

सेना ने मंगलवार को पहले देश में मार्शल लॉ लगाया. दो दिन बाद उसनेसंकट पर बातके लिए बैंकाक में नेताओं को बुलाया.

इसी बीच सेना प्रमुख जनरल प्रायुत चान-ओचा ने टीवी पर तख्तापलट की घोषणा कर दी.

बातचीत में बुलाए गए कई नेताओं को हिरासत में ले लिया गया. इनमें विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई कर रहे विपक्षी नेता सुथेप थागसुबन और सरकार समर्थक प्रदर्शनकारी नेता जटुपोर्न प्रोम्पन शामिल हैं.

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कार्यकारी प्रधानमंत्री निवाथमरांग बूनसांगफ़ियानसान बातचीत में नहीं आए थे. वह फिलहाल कहां हैं, यह साफ नहीं है.

विपक्षी पार्टी पीडीआरसी के तमाम समर्थकों का मानना है कि देश में जो कुछ चल रहा था, उसका अंत सैन्य तख्तापलट ही था.

अनुत्तरित सवाल

हालांकि यह सवाल अभी अनुत्तरित है कि क्या जनरल प्रायुत वाकई दो छोटी बैठकों में किसी नतीजे तक पहुंचने की अपेक्षा कर रहे थे? या हमेशा से बातचीत की आड़ में उनका इरादा सत्ता हथियाने का था.

क्या बातचीत के लिए बुलाया जाना महज़ नाटक था और असली मक़सद हिरासत से पहले सारे प्रमुख नेताओं को एक जगह पर लाना था?

यह माना जा रहा था कि थाई सेना में कुछ ऐसे तत्व हैं जो बलपूर्वक सत्ता पर काबिज़ हो सकते हैं.

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मार्शल लॉ लगाने से लेकर तख्तापलट तक सेना ने जिस तेज़ी से कार्रवाई की, उससे थाईलैंड में बहुत से लोग हैरान रह गए.

दो पूर्व प्रधानमंत्रियों सुश्री यिंगलुक और सोमाची वांगसावत समेत कार्यकारी प्रधानमंत्री निवाथमरांग और उनके काबीना मंत्रियों को सेना को रिपोर्ट करने का आदेश दिया गया है. सत्ताधारी पुए थाई पार्टी के क़रीब 23 सदस्यों को समन दिया जा चुका है.

गंभीर चिंता

संयुक्त राष्ट्र ने सैन्य तख्तापलट पर गंभीर चिंता जताई है. महासचिव बान की मून ने संविधान की ओर लौटने और नागरिक, लोकतांत्रिक शासन कायम करने की बात कही है.

अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा, ''बेशक अमरीका थाई जनता के साथ अपनी लंबी दोस्ती को तवज्जो देता है लेकिन यह कदम अमरीका-थाई संबंधों पर नकारात्मक असर डालेगा, खासकर थाई सैन्य शासन.''

अमरीका 10 मिलियन डालर की मदद पर रोक लगा सकता है.

ब्रिटेन ने सभी पक्षों से मतभेद खत्म कर लोकतंत्र के मूल्यों को समझने और क़ानून के शासन की पैरवी की है.

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फ्रांस के राष्ट्रपति और जर्मनी के विदेश मंत्री ने भी सैन्य तख्तापलट की निंदा की है जबकि जापान ने इसे अफ़सोसनाक बताया है.

यूरोपीय यूनियन की विदेशी नीतियों की प्रमुख कैथरीन एश्टन की प्रवक्ता ने कहा कि यह ज़रूरी हो गया है कि चुनाव जल्द से जल्द कराए जाएं.

आसियान में थाईलैंड के सहयोगी सिंगापुर ने घटनाक्रम पर गहरी चिंता ज़ाहिर की है.

फ़ौजी नियंत्रण की पहली रात

गुरुवार को थाईलैंड में कर्फ़्यू की पहली रात थी. सैन्य तख्तापलट के बाद से बैंकॉक में शांति छाई हुई थी.

बैंकॉक के बाहरी पश्चिमी इलाक़ों में सरकार समर्थक रेड शर्ट कैंप में उत्तेजना ज़रूर दिखी लेकिन विरोधी प्रदर्शनकारी बगैर किसी हिंसा के रुख़्सत हो गए.

कर्फ़्यू का समय क़रीब आने के साथ ही सड़कों पर भारी ट्रैफ़िक दिखा, पर रात के साथ ही शांति छा गई.

टीवी प्रसारणों पर सेना का नियंत्रण हो गया है. बीबीसी, सीएनएन और कई अन्य चैनलों को रोक दिया गया है.

गुरुवार दोपहर सेना ने एक बुलेटिन जारी किया, जिसमें सैन्य तख्तापलट के प्रमुख बिंदुओं के बारे में बताया गया.

कई बार सैन्य तख्तापलट

1932 में देश में राजशाही खत्म होने के बाद कम से कम 12 बार सैन्य तख्तापलट हो चुका है.

पिछले साल से थाई राजधानी में अस्थिरता का दौर शुरू हुआ, जब सुश्री यिंगलुक ने संसद के निचले सदन को भंग कर दिया.

इस महीने एक अदालत ने सत्ता के दुरुपयोग पर उन्हें हटाने का आदेश सुनाया.

2006 में सेना द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री और यिंगलुक के भाई थाकसिन शिनवात्रा को हटाए जाने के बाद से थाईलैंड में सत्ता को लेकर संघर्ष जारी है.

ग्रामीण क्षेत्रों में थाकसुन और यिंगलुक को ज़बर्दस्त समर्थन हासिल है. अलबत्ता शहरी अभिजात्य और मध्य वर्ग उनका विरोध कर रहा है.

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