'भारत से शरीफ़ को क्या मिला, सिर्फ़ चार्जशीट'

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पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में जहां प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के भारत दौरे के नफ़ा नुक़सान का आकलन जारी है, वहीं भारत में उर्दू मीडिया की तवज्जो अनुच्छेद 370 पर विवाद और बदायूं सामूहिक बलात्कार जैसी ख़बरों पर रही.

बदायूं में दो बहनों के सामूहिक बलात्कार और उसके बाद उनकी हत्या की घटना पर मुंबई से छपने वाले उर्दू टाइम्स का कहना है कि अखिलेश यादव सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही है.

अख़बार कहता है कि लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के पांच सीटों पर सिमट जाने की सबसे बड़ी वजह यही है कि इस पार्टी की सरकार न तो क़ानून व्यवस्था पर क़ाबू रख सकती है और न ही जनता इसके राज में ख़ुद को सुरक्षित महसूस करती है.

अख़बार ने संपादकीय में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ में भी एक दलित लड़की के बलात्कार की घटना का ज़िक्र किया है.

जेडीयू में बिखराव!

पिछले दिनों अनुच्छेद 370 को लेकर हुए विवाद पर हिंदोस्तान एक्सप्रेस का संपादकीय है- बेवक़्त की रागनी.

अख़बार लिखता है कि कश्मीर की स्थिति में बड़ी मुश्किल से कुछ बेहतरी आई है. ऐसे में अगर अनुच्छेद 370 के मुद्दे ने तूल पकड़ा तो इससे अलग-थलग पड़े अलगाववादियों को बहाना मिल जाएगा.

अख़बार कहता है कि वैसे भी मौजूदा हालात में अनुच्छेद 370 को हटाना तक़रीबन नामुमकिन है क्योंकि इसके लिए दो तिहाई बहुमत से संविधान में संशोधन करना होगा, दूसरा जम्मू कश्मीर की विधानसभा में भी इस संविधान संशोधन को दो तिहाई बहुमत से पारित कराना होगा.

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Image caption नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद के लिए महादलित समुदाय के जीतन राम मांझी को चुना.

उधर हमारा समाज लिखता है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव के बीच कशमकश बढ़ती जा रही है.

अख़बार के अनुसार जहां नीतीश कुमार किसी भी सूरत में एनडीए में वापस नहीं आना चाहते हैं, वहीं शरद यादव की एनडीए के नेताओं के साथ लंबी गुफ़्तगू चल रही हैं.

अख़बार लिखता है कि आम चुनावों में हार के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ कर और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना कर एक तीर से कई निशाने लगाने की कोशिश की लेकिन अब शरद यादव की चालें उनकी रणनीति पर भारी पड़ती नज़र आ रही हैं.

‘सिर्फ़ चार्जशीट मिली’

उधर, पाकिस्तानी मीडिया में पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने आए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के भारत दौरे पर लगातार चर्चा जारी है.

रोज़नामा दुनिया लिखता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस व्यस्तता और हज़ारों मेहमानों के बीच सबसे ज़्यादा वक्त पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को दिया.

दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधिमंडल की 50 मिनट बात हुई जिसमें वह 15 मिनट भी शामिल हैं जिसमें दोनों प्रधानमंत्रियों ने अकेले बात की.

लेकिन अख़बार के मुताबिक पाकिस्तान को इस मुलाक़ात से सिवाय चार्जशीट के कुछ हासिल नहीं हुआ. बल्कि जिसे चार्जशीट कहा जा रहा है, वे वही बातें हैं जो भारत दोहराता रहता है.

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Image caption नरेंद्र मोदी ने शपथ ग्रहण में शामिल हुए नवाज़ शरीफ़ को पूरी तवज्जो दी.

मसलन पाकिस्तान दहशतगर्द हमलों को रोकें, 2008 के मुंबई हमले से जुड़े मुक़दमे की तेज़ी से सुनवाई हो, पाकिस्तान मुंबई हमलों की साजिश रचने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे वगैरह-वगैरह.

वही सवाल, वही जवाब

इसी विषय पर रोज़नामा पाकिस्तान लिखता है कि भारत की सुई अगर 2008 पर अटकी रहेगी, तो पाकिस्तान भी उसका वही जवाब देगा जो आज तक देता रहा है.

अख़बार के मुताबिक इसका साफ़ मतलब है कि मामला वहीं रहेगा जहां है, तो फिर बात आगे कैसे बढ़ेगी और जिन खाली नेक ख्वाहिशों का इज़हार किया जा रहा है, उन पर अमल नहीं हो सकेगा.

वहीं नवा-ए-वक्त लिखता है कि स्वदेश लौटने पर नवाज़ शरीफ़ ने यह नहीं बताया है कि उन्होंने मोदी की तरफ़ से रखी गई मांगों पर क्या जवाब दिया.

अख़बार कहता है कि यह मुलाकात भारत के नज़रिए से तो सकारात्मक हो सकती है, लेकिन पाकिस्तान के नज़रिए से हरगिज़ नहीं. फिर न जाने क्यों विदेश मामलों पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अज़ीज़ इसे उम्मीद से ज़्यादा कामयाब बता रहे हैं.

दोनों देशों की इस बातचीत में कश्मीर को एजेंडे पर न रखने के लिए भी अख़बार ने पाकिस्तान सरकार की खिंचाई की है.

पाकिस्तान में अराजकता

रोज़नामा एक्सप्रेस ने पिछले दिनों लाहौर हाई कोर्ट के बाहर एक महिला की सरेआम हत्या को देश में बढ़ती अराजकता का सबूत बताया है.

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Image caption लाहौर में अदालत के बाहर युवती की हत्या पर कई विरोध प्रदर्शन भी हुए

अख़बार कहता है कि कई ऐसी वारदात हो चुकी हैं जबकि जजों के सामने खड़े मुल्ज़िमों को कत्ल कर दिया, जब जेलों में बंद क़ैदी कत्ल कर दिए गए, लेकिन सरकार ने कभी ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए क़दम नहीं उठाए.

अख़बार के अनुसार अब लाहौर हाई कोर्ट के बाहर महिला को क़त्ल करने की घटना से पाकिस्तान की एक बार फिर विश्व स्तर पर बदनामी हुई है.

वहीं जंग ने पाकिस्तान तालिबान में फूट पर अपने संपादकीय में लिखा है कि एक प्रभावी धड़े महसूद गुट ने संगठन से अलग होने का ऐलान किया है और तहरीके तालिबान के मुखिया मौलाना फज़लुल्लाह पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं.

अख़बार कहता है कि विश्लेषक तो अब भी यही मानते हैं कि तालिबान के साथ शांति वार्ता अब भी अविश्वास का शिकार है, लेकिन बातचीत के समर्थक एक बड़े गुट के अलग होने के बाद, उन समूहों के हौसले बुलंद होंगे जो शांति वार्ता पर विश्वास रखते हैं.

अख़बार ने पाकिस्तानी सरकार को भी हिदायत दी है कि वह पश्चिमी सीमा पर शांति के लिए सोच समझ कर क़दम उठाए क्योंकि तालिबान का चरमपंथी धड़ा हताशा की स्थिति में देश को हमलों का निशाना बना सकता है.

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