इराक संकट तेल बाज़ार के लिए महंगा साबित हो रहा है?

  • 19 जून 2014
इराक संकट का तेल बाजार पर असर इमेज कॉपीरइट r

इस्लामी जेहादियों ने इराक़ के दो नए शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया है और बग़दाद पर हमले की चेतावनी दी है जिससे तेल बाज़ार में डर का माहौल है.

सुन्नी जेहादी ईरान सीमा से सटे और राजधानी बग़दाद के नज़दीक दियाला प्रांत की ओर बढ़ रहे हैं और उत्तर में दो महत्वपूर्ण शहरों मोसुल और तिकरित पर क़ब्ज़ा कर चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक ताज़ा हिंसा में अब तक सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं.

आईएसआईएस यानी इस्लामिक स्टेट इन इराक़ एंड अल-शाम के लड़ाकों ने देश के शिया बहुल इलाक़ों में हमलों की चेतावनी दी है.

ताज़ा रिपोर्टों के मुताबिक जेहादियों ने इराक़ की सबसे बड़ी तेल रिफ़ायनरी पर बड़ा हमला किया है. रिपोर्टों के मुताबिक बैजी रिफ़ायनरी के कुछ हिस्सों पर जेहादियों का नियंत्रण हो गया है. यह बग़दाद से 210 किलोमीटर दूर उत्तर में स्थित है.

जेहादी लड़ाकों के आगे बढ़ने के कारण दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं.

तेल उत्पादन मुश्किल

इराक़ में ज़्यादातर लड़ाई उत्तरी इलाक़ों में हो रही है. आईएसआईएस के क़ब्ज़े में भी उत्तरी शहर ही आए हैं. इराक़ में 1999 से कार्य कर रही पेट्रेल रिसोर्सेज़ के मुख्य अधिकारी डेविड होर्गन के मुताबिक देश का सत्तर फ़ीसदी तेल उत्पादन दक्षिणी इलाक़ों होता है.

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वे कहते हैं, यह कोई नई समस्या नहीं है, इराक़ का फ़लूजा जैसा शहर पहले ही आईएसआईस चरमपंथियों के हाथ में जा चुका है, लेकिन जो अब हो रहा है वह बड़ा घटनाक्रम है क्योंकि जेहादी इराक़ी सेना को पीछे धकेलने में कामयाब हुए हैं.

यह एक बुरी ख़बर है कि इससे तेल उत्पादन भले तुरंत बंद न हो लेकिन ऐसे घटनाक्रम से तेल उत्पादन मुश्किल हो जाता है. दूसरे खाड़ी युद्ध के बाद से इराक़ में तेल उत्पादन उबर नहीं पाया है और तेल के कुओं के संचालन और नए इलाक़े की तलाश के लिए ज़रूरी पैसा जुटाना भी मुश्किल हो जाता है.

डेविड कहते हैं कि इराक़ में काम करने के लिए मानव संसाधन और पैसा जुटाना बेहद मुश्किल काम है.

डर और अनिश्चिततता का माहौल

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चैटहैम हाउस के प्रोफ़ैसर पॉल स्टीवंस बताते हैं कि इराक़ के कई तेल उत्पादक कुए दक्षिणी इलाक़े में हैं जहाँ तक लड़ाई अभी नहीं पहुँची है. क़ुर्द नियंत्रित इलाक़ों के बाहर के उत्तरी क्षेत्र में अधिक तेल उत्पादन नहीं हो रहा है.

वे बताते हैं कि इस क्षेत्र में दुनिया के दूसरे सबसे बड़े तेल भंडार हैं लेकिन युद्ध के बाद से यहाँ तेल उत्पादक कम हो रहा है और इसलिए अब ये उतना महत्वपूर्ण बाज़ार नहीं है.

जहाँ तक विदेशी निवेश का सवाल है, कंपनियों का भरोसा अब इराक़ सरकार में नहीं हैं.

वे कहते हैं, "ढाँचागत सुविधाओं और रख-रखाव के अभाव में उत्पादन प्रभावित हो रहा है."

प्रोफ़ेसर स्टीवंस बताते हैं, "तेल बाज़ार में ये आम भावना है कि यदि मध्यपूर्व में दिक़्क़तें होती हैं तो तेल के दाम बढ़ जाते हैं."

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वे कहते हैं, "जब तक बग़दाद में कोई बड़ा फ़ेरबदल नहीं होता तब तक तेल के दामों पर असर नहीं होना चाहिए था लेकिन डर और अनिश्चिततता तेल के दाम बढ़ने का बड़ा कारण हैं."

प्रोफ़ेसर स्टीवंस कहते हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अगर अमरीका और ईरान के बीच कोई समझौता होता है तो इससे तेल बाज़ार को राहत मिल सकती हैं क्योंकि ईरान पर लगे व्यापारिक प्रतिबंध हट सकते हैं.

80 दिनों का ही तेल भंडारण

तेल बाज़ार का एक और सच यह है कि अंतिम रूप में इस्तेमाल होने से पहले तेल का हर एक बैरल कई बार बेचा-ख़रीदा जाता है और बाज़ार अपेक्षाओं से प्रभावित होता है.

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प्रोफ़ेसर स्टीवंस कहते हैं, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तुर्क साम्राज्य के पतन के बाद पश्चिमी देशों ने इराक़ का गठन किया था. यदि इराक़ एक बार फिर से टूटता है तो फिर बाक़ी का मध्यपूर्व भी कृत्रिम ही रह जाएगा. ऐसे में इसके बड़े प्रासंगिक परिणाम हो सकते हैं.

बचे हुए इलाक़े अपने सहयोगी तलाशेंगे. उत्तरी क़ुर्द इलाक़ा सीरिया के क़ुर्दों में सहयोगी तलाशेगा और शिया बाहुल्य दक्षिणी इलाक़ा ईरान के साथ जाना चाहेगा जिससे संघर्ष और बढ़ेगा ही. इस सबसे तेल उत्पादन धीमा ही होगा.

विश्व का बड़ा हिस्सा आज भी तेल के लिए मध्यपूर्व पर ही निर्भर करता है. दुनिया में इस समय 80 दिनों तक चलने लायक तेल भंडारण ही है जो सौ दिन से ऊपर के भंडारण से काफ़ी नीचे हैं.

तेल के बड़े भंडारण मध्यपूर्व, साइबेरिया और वेनेजुएला जैसे देशों में हैं जो अंतरराष्ट्रीय अन्वेषण के लिए बंद हैं.

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