शिया-सुन्नी के बीच युद्ध छिड़ा तो क्या होगा?

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इराक़ में इस तरह के संघर्ष की कोई भनक नहीं थी. ना तो भारत सरकार को, ना ही इराक़ सरकार को, ना ही अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी को.

यह पूरा ऑपरेशन बड़े ही गुपचुप तरीके से हुआ है. यह अल कायदा के समूह इस्लामिक स्टेट इन इराक़ ऐंड अल शाम या आईएसआईएस का ऑपरेशन है. इसकी जानकारी किसी को नहीं मिली.

इस ऑपरेशन के होने के बाद फौरन ही फ़ेसबुक, ट्विटर और स्काइप जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटें वहाँ बंद हो गईं. फोन लाइंस भी नहीं मिल रही हैं. मैं ख़ुद भी कोशिश कर रहा हूं लेकिन बात नहीं हो पा रही है. दो दिन पहले तक हर दिन बात हो रही थी.

ऐसे में 40 भारतीयों के अगवा किए जाने की ख़बर चिंता पैदा करने वाली है. पहले तो ये भी नहीं पता था कि भारतीय लोग किडनैप हुए थे या फिर इधर-उधर छिपे हुए थे.

ऐसे में वहां फंसे भारतीय नागरिकों को निकलना बड़ी चुनौती बन गई है. वहां एयरपोर्ट बंद हैं. सड़कें बंद हैं. बाहर निकलने के रास्ते पर युद्ध चल रहा है.

मुश्किल में भारतीय

जहां तक नर्सों की बात है, ये भी पता चल रहा है कि बहुत सी नर्सें भारत नहीं लौटना चाहतीं, वे एक सुरक्षित इलाके में जाना चाहती हैं.

ये भी एक बड़ी समस्या है. दरअसल ये बेहद गरीब लोग हैं. एजेंटों को कई-कई लाख रुपए देकर वहां गए हैं. किसी ने जेवर बंधक रखे होंगे, किसी ने घर. बहुत बड़ी मुश्किल है, इसे बयान करना मुश्किल हो रहा है.

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इन समस्याओं से इतर भारत के सामने राजनीतिक चुनौती भी आ गई है. आईएसआईएस सुन्नी संगठन है. ईरान और अमरीका भी इराक़ की मदद करने की बात कह रहा है. ऐसे में इराक़ दो गुटों में बंटता दिख रहा है.

ऐसे में हमें समझना होगा कि भारत इस इलाके को लेकर एक संतुलित नजरिया रखता आया है. किसी एक का समर्थन नहीं करेगा. भारत के अच्छे संबंध सऊदी अरब से भी हैं और ईरान से भी. दोनों देश इस बात को बखूबी समझते भी हैं.

हमारा तेल का बहुत बड़ा सप्लायर सऊदी अरब ही है. हमारा उनके साथ मज़बूत कारोबारी संबंध हैं. सऊदी अरब भारत के बड़े निवेशकों में भी शामिल है.

हमारे 15-16 लाख आदमी सऊदी अरब में काम कर रहे हैं. इस क्षेत्र में करीब 70 लाख भारतीय काम करते हैं. जो हर साल 30-35 अरब डॉलर की रकम भारत भेजते हैं.

कूटनीतिक संबंधों का तानाबाना

हम इन्हीं देशों से तेल खरीदते हैं. हमारा तेल का बिल ही 200 अरब डॉलर का होता है. ईरान से ज़्यादा सऊदी अरब से तेल आता है. इराक़ दूसरे नंबर पर होगा. तो भारत का सऊदी अरब से संबंध है, लोग इसे समझते हैं.

जहां तक इराक़ की बात है, वो तीन हिस्सों में विभक्त हो गया है. कुर्द इलाके के लोगों की भी अरब के लोगों से नहीं बनती. कुर्दिस्तान में ज़्यादातर लोग सुन्नी हैं.

कुर्दिस्तान को सबसे ज्यादा फ़ायदा हुआ है. वे आजादी के कगार तक पहुंच गए हैं. वे सीधे तेल भी बेच सकते हैं. इराक़ी सेना इन इलाकों में किसी काम की नहीं रह गई है.

मुझे नहीं लगता है कि इन इलाकों में इराक़ी सेना फिर से कब्जा कर पाएगी. चाहे वह फ़ालूज़ा हो या फिर रमादी प्रांत. तिकरीत या फिर कुर्दिस्तान. आईएसआईएस को स्थानीय समर्थन मिल रहा है. सद्दाम हुसैन के समर्थक भी इनका साथ दे रहे हैं.

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इस समूह को स्थानीय लोगों का साथ मिला है. सेंट्रल बैंक को लूटने के बाद इनके पास काफी पैसा आ गया है. सोना काफी मिला है. फिरौती, किडनैपिंग, गन रनिंग का उद्योग भी ये चलाते रहे हैं. सीरिया में ये सब पहले से ही कर रहे हैं. इराक़ और सीरिया के मिले हिस्से पर भी इनका असर है. इनके पास काफ़ी ज़मीन भी है.

ऐसे में चरमपंथियों के हिस्से वाला इलाका एक तरह से शक्तिशाली देश के तौर पर उभर रहा है.

शिया-सुन्नी के बीच धर्म युद्ध

मुझे तो लगता है कि एक तरह का धर्म युद्ध शुरू हो गया है. शिया और सुन्नी के बीच. अगर यह फैलता है तो पूरे क्षेत्र के लिए बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय दबाव के जरिए इस पर अंकुश लगाना चाहिए. सऊदी अरब और ईरान को हालात पर काबू करने के लिए कहा जाना चाहिए.

इराक़ में अब ना तो अमरीकी सैनिक आएंगे. ना ही नैटो सैनिक आएंगे. इन सबका बुरा अनुभव रहा. 450 अमरीकी सैनिक वहां मारे गए थे. उनके करोड़ों डॉलर का नुकसान अलग हुआ था. हजारों सैनिकों का अभी तक इलाज चल रहा है.

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अमरीका और यूरोप में मंदी का दौर चल रहा है. ऐसे में कोई इराक़ नहीं आना चाहेगा.

अमरीका ने ग्रीन रेड्स समूह के लोगों को भेजा है. जो इराक़ियों को गुरिल्ला युद्ध में प्रशिक्षण दे सकते हैं. जल्दी प्रशिक्षण देकर यह समूह उन्हें युद्ध के लिए तैयार करेगा.

हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति ने इराक़ में सैनिकों को भेजने से इनकार किया है. ईरान के लिए भी इस मामले में सीधा हस्तक्षेप करना मुश्किल लग रहा है.

ख़ुद ईरान पर तमाम तरह की पाबंदियां लगी हुई हैं. ईरान ख़ुद भी सीरिया में फंसा हुआ है, लेकिन वो मदद जरूर करेगा. उनके लोग मदद करने जरूर आएंगे.

ईरान ने धार्मिक स्थानों कर्बला, नजफ़ या समारा की सुरक्षा की बात कही है लेकिन इराक़ की कोशिश होनी चाहिए कि बगदाद की तरफ बढ़ रहे चरमपंथियों को रोका जाए.

इसमें मुश्किल यह है कि आईएसआईएस बहुत संगठित समूह है और इसे दूसरे समूहों का समर्थन मिल रहा है. मल्टीनेशनल समूह के चरमपंथी इसमें शामिल हैं. चेचन्या से लेकर जॉर्डन तक के. ऐसे समूह को रोकना किसी भी सरकार के लिए बेहद मुश्किल काम है.

(बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत पर आधारित)

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