क़ातिलों को माफ़ करता ईरान, फांसी पर क़ायम

ईरान में फ़ासी की सज़ा माफ़ करती एक माँ इमेज कॉपीरइट AFP

गुज़श्तम यानी मैंने माफ़ किया- गुज़रे बरस यह वाक्य ईरानी समाज ने अपने ही परिजनों के क़ातिलों को माफ़ करते हुए 375 बार दोहराया.

लेकिन बीते साल ही ईरानी राज्य व्यवस्था ने 369 लोगों को फांसी की सज़ा दी.

समाज और राज्य व्यवस्था की यह नितांत विपरीत सोच ईरान को एक ओर फांसी देने वाले देशों में दूसरे स्थान में दर्ज कराती है, साथ ही यह मुल्क अपने समाज की संवेदना के तहत फांसी माफ़ करने वाले देशों में अव्वल पायदान पर जा पहुंचा है.

ईरानी दंड प्रावधान

समाज और राज्य व्यवस्था के अलगाव के इस विरोधाभास का कारण ईरान की न्याय व्यवस्था पर नज़र डालने से साफ़ होता है.

ईरानी न्याय प्रणाली अपराध को दो भागों में विभाजित करती है. पहले वे अपराध, जो राज व्यवस्था को चुनौती देते हैं और समाज के भीतर उस सोच को जन्म देते हैं, जिसके तहत लोगों का राज्य व्यवस्था से भरोसा और विश्वास भंग होता हो.

इस तरह के अपराधों की श्रेणी में राज्य व्यवस्था की मुख़ालफ़त करने वाली राजनैतिक गतिविधियां, सशस्त्र डकैती, नशीले पदार्थों का व्यापार एवं बड़ी राशि का ग़बन शामिल हैं.

इस श्रेणी के अपराधों में सरकार मुद्दई होती है. इन अपराधों की सज़ा का आधार देश के संविधान द्वारा पारित दंड विधान के अंतर्गत होता है.

बड़ी संख्या में मौत की सज़ा दिए जाने के पीछे ईरानी सरकार का कहना है कि मुख्यतः फांसी की सज़ा नशीले पदार्थों के व्यापारियों को ही दी जाती है और इक्का-दुक्का फांसी दूसरे अपराधों के लिए दी जाती हैं.

साथ ही साथ ईरानी सरकार यह भी दावा करती है कि वह विरोधी राजनैतिक गतिविधियों के तहत फांसी की सजा नहीं देती. लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही बयान करती है.

'मौत के बदले मौत'

दूसरी ओर वे अपराध हैं, जो एक इंसान द्वारा समाज के दूसरे इंसान पर किए गए हों. इस श्रेणी में मुख्यतः हत्या, बलात्कार एवं अन्य लैंगिक अपराध आते हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP

इन अपराधों की सज़ा का आधार धार्मिक क़ानून यानी इस्लामी शरिया होता है. इस श्रेणी के अपराधों में पीड़ित व्यक्ति या उसके परिजन मुद्दई होते हैं.

ईरान: मां ने बेटे के क़ातिल को किया माफ़

इन अपराधों की सज़ा इस्लामी धर्मग्रंथ क़ुरान के अध्याय 5 आयत 45 के तहत सज़ा दी जाती है. इस आयत के तहत "मौत के बदले मौत, आंख के बदले आंख.." बराबरी का बदला लेने की अनुमति दी जाती है, लेकिन आयत यह भी कहती है कि यदि पीड़ित व्यक्ति या उसके परिजन रहम करते हुए अपराधी को क्षमा कर दें, तो क्षमा करने वाला व्यक्ति अल्लाह की कृपा का पात्र बनेगा.

इन अपराधों में सज़ा की तामील भी पीड़ित व्यक्ति या उसके परिजन ही करते हैं– वह चाहे फांसी हो, अपराधी के पैर तले तख्ता हटाकर जान लेनी हो या उसे माफ़ करते हुए जीवनदान देना हो.

जीवन लेने के कारण ईरानी राज्य व्यवस्था और जीवनदान के कारण ईरानी समाज का यह अंतर्द्वंद इन दोनों के बीच अलगाव तो दर्शाता ही है, यह भी लगता है कि ईरानी समाज क़ुरान की आयतों का अर्थ अपने मुहावरों में परिभाषित कर रहा है– जिसमें करुणा, संवेदना और दूसरे के दर्द को अपनी पीड़ा से अधिक महसूस करने का जज़्बा है.

एक कठोर राज्य व्यवस्था के अधीन ईरानी समाज आसमानों के ख़ुदा से मुख़ातिब हो, यह कहता हुआ लगता है कि ख़ुदाया हम तो तेरी करुणा और संवेदना की राह का अनुसरण करने लगे हैं, लेकिन ईरान के ज़मीनी ख़ुदाओं को भी तू राह दिखा!

मृत्युदंड पर भारत

भारत 59 फांसी देने वाले देशों की श्रेणी में है. यूं जनसंख्या के हिसाब से देखें, तो लगता है कि भारत में फांसी की सज़ा का प्रावधान अपराधों पर रोक लगाने के अन्य उपायों में एक है.

फांसी के समर्थन में जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें मुख्यतः अपराधियों के मन में फांसी का ख़ौफ़ और परिणामतः अपराधों पर अंकुश लगाना है. हालांकि यह तर्क उन देशों में भी दिए जाते थे, जहां अब फांसी की सज़ा पर अंकुश लग चुका है.

ये देश काफ़ी सोच-विचारकर इस नतीजे पर पहुंचे कि न तो फांसी का भय किसी व्यक्ति को अपराध करने से रोकता है और न अपराधों में वांछित कमी आती है.

Image caption मृत्युदंड के सवाल पर इन दिनों भारतीय लॉ कमीशन विचार विमर्श कर रहा है.

सन 2004 से सन 2012 के बीच भारत में कोई फांसी नहीं दी गई. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार "इन आठ वर्षों में अपराध दर में कोई उछाल नहीं आया".

सन 2014 में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने नर्म रवैया अपनाते हुए 15 क़ैदियों की फांसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया.

एक बार फिर यही रवैया देखने को मिला, जब राजीव गांधी हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन अभियुक्तों की फांसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदला.

मानवाधिकार वकील युग मोहित चौधरी का कहना है कि भारत में हर एक लाख हत्या के मामलों में सिर्फ़ आठ फांसी की सज़ा मिलती हैं. उनका मानना है कि जब लगातार पिछले 22 साल में देश में हत्या दर में गिरावट आई है तो क्यों न हम अपनी दंड संहिता से फांसी का प्रावधान ही हटा दें.

मृत्युदंड के सवाल पर इन दिनों भारतीय लॉ कमीशन विचार-विमर्श कर रहा है.

देखना यह है कि भारत में इन मामलों में न्याय देते हुए न्यायाधीश अपनी कलम तोड़ना जारी रखेंगे या ईरानी समाज की तर्ज़ पर कहना सीखेंगे- गुज़श्तम.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार