लोग दमादम मस्त कलंदर करते सड़कों पर उतरें, इससे पहले..

  • 22 जून 2014
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पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में जहां उत्तरी वज़ीरिस्तान में सैन्य अभियान, बढ़ती गर्मी, बिजली संकट और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के लिए हालिया फ़ैसले की चर्चा है तो भारतीय अख़बारों ने सियासी हलचलों को अपने संपादकियों में जगह दी है.

जंग के संपादकीय में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले की चर्चा है, जिसमें अल्पसंख्यकों के धर्मस्थलों की हिफ़ाज़त के लिए सरकार को एक ख़ास सुरक्षा बल बनाने की हिदायत दी गई है.

यह फ़ैसला पेशावर में एक चर्च पर हमले, कराची में तीन हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ और चितराल ज़िले में कैलाश क़बीले और इस्माइली लोगों को धर्म परिवर्तन की धमकियों के मद्देनज़र दिया गया है.

अख़बार लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की एक निगरानी कमेटी भी बनाई है.

अख़बार की राय है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का अमल सरकारों को सुनिश्चित करना चाहिए.

फ़ौज के साथ

उत्तरी वज़ीरिस्तान में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान सेना के ऑपरेशन पर नवाए वक़्त ने संपादकीय लिखा है.

अख़बार लिखता है कि उत्तरी वज़ीरिस्तान में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ लड़ाई जल्द ही पाक सेना की जीत के साथ ख़त्म होगी, लेकिन उसके बाद पूरे देश से दहशतगर्दों के अंत की लड़ाई लंबी हो सकती है.

इस पर औसाफ़ का संपादकीय है- देश पाकिस्तानी फ़ौज के साथ खड़ा है. अख़बार का कहना है कि दहशतगर्दों का ख़ात्मा ही सबके फ़ायदे में है.

पोलियो टीका जायज़

दैनिक एक्सप्रेस ने लिखा है कि इस्लामाबाद में अंतरराष्ट्रीय उलेमा कांफ्रेस में पोलियो टीके के इस्तेमाल को जायज़ करार दिया गया है.

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कांफ्रेस के बाद जारी घोषणापत्र में कहा गया है कि पोलियो टीका किसी तरह से हराम नहीं है और मुस्लिम देशों में बच्चों को पोलियो से बचाने के लिए क़दम उठाए जाएं.

अख़बार कहता है कि 57 में से 54 मुस्लिम देश पोलियो पर क़ाबू पा चुके हैं. केवल पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और नाइजीरिया बचे हैं.

इस सम्मेलन में जहां पाकिस्तान में पोलियो टीम पर होने वाले हमलों की निंदा की गई है, वहीं इस मुद्दे का इस्तेमाल राजनीतिक कारणों के लिए करने पर भी सख़्त ऐतराज़ जताया गया.

गर्मी की मार

वहीं रोज़नामा दुनिया ने पाकिस्तान में गर्मी के मौसम में नहर में डूबकर मरने वाले लोगों की संख्या में हो रहे इज़ाफ़े को अपने संपादकीय में उठाया है.

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बीते हफ़्ते लाहौर और पाकपत्तन की नहरों में पांच बच्चे डूब गए. ये लोग गर्मी से राहत पाने के लिए वहां नहाने गए थे.

अख़बार के मुताबिक़ पिछले साल इस तरह नहर में डूबने से लगभग 1850 लोग मारे जा चुके हैं. अख़बार प्रशासन से कदम उठाने की मांग करता है.

इसी से मिलता जुलता संपादकीय है दैनिक ख़बरें का. शीर्षक है –गर्मी और बिजली की किल्लत, दोनों में मुक़ाबला.

अख़बार लिखता है कि इस गर्मी के मौसम में बिजली 16 से 20 घंटे ग़ायब हो रही है.

अख़बार लिखता है कि इससे पहले कि गर्मी और बिजली की किल्लत से मारे लोग दमादम मस्त कलंदर करते हुए सड़कों पर उतर आएं, सरकार को कदम उठाने चाहिए.

भारत के अख़बार

राष्ट्रीय सहारा ने बिहार में राज्यसभा के उप चुनाव में जेडीयू के उम्मीदवारों को समर्थन देने के लालू प्रसाद यादव के फ़ैसले को समझदारी वाला क़दम बताया है.

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अख़बार की राय है कि बिहार में आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को जो ज़ोरदार कामयाबी मिली, उसकी वजह सिर्फ़ धर्मनिरपेक्ष वोटों में बिखराव था.

राष्ट्रीय सहारा कहता है कि आगामी विधानसभा चुनाव में अगर जेडीयू और लालू की आरजेडी अलग-अलग मैदान में उतरीं, तो फ़ायदा फिर बीजेपी को होगा और इसीलिए दोनों पार्टियों के बीच भविष्य में सहयोग के रास्ते खुल सकते हैं.

'अब तो जागो कॉमरेड'

रोज़नामा ख़बरें ने आम चुनावों में वामपंथियों की ख़स्ता हालत पर लिखा है- अब तो जागो कॉमरेड.

अख़बार के मुताबिक़ सीपीएम बीजेपी पर आरोप लगा रही है कि वो उसके कार्यकर्ताओं और समर्थकों को तोड़कर अपनी तरफ़ कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि सीपीएम अपने कार्यकर्ताओं को रोकने में नाकाम क्यों है.

दूसरी तरफ़ हमारा समाज ने अपने संपादकीय में इराक़ में फंसे भारतीयों का जिक्र किया है.

अख़बार कहता है कि सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वहां फंसे लोगों को संभव हो, तो स्वदेश लाए या फिर कम से कम उन्हें ऐसी जगह रखे जहां से उन्हें वतन लाना आसान हो.

अख़बार के अनुसार, ऐसा न हो कि 'हम हालात बिगड़ने पर उनकी मदद के क़ाबिल भी न हों.'

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