नाम में ही सबकुछ रखा है!

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नई कंपनियां बच्चों की तरह होती हैं, ग़लत नाम पूरी ज़िंदगी सताता रहता है. कल्पना करिए कि अगर गूगल का नाम बैकरब होता तो क्या होता? गूगल का नाम पहले बैकरब ही रखा गया था.

कंपनियों को ब्रांड नामों का सुझाव देने वाली अमरीका के कैलिफ़ोर्निया की फ़र्म लेक्सिकॉन के संस्थापक डेविड प्लेसेक कहते हैं, "कुछ शब्द कल्पना बढ़ाते हैं और उम्मीद जगाते हैं. किसी ब्रांड की ताक़त को कम करके मत आंकिए."

लेक्सिकॉन ने कई बड़ी कंपनियों को सलाह दी है. जैसे इंटेल के लिए पेंटियम, एपल के लिए पॉवरबुक और कोका कोला के लिए दसानी.

1998 में कनाडा की एक छोटी सी कंपनी लेक्सिकॉन के पास पहुंची, वो ऐसा फ़ोन ला रही थी जो ईमेल भेज सकता था. समस्या थी मेगामेल और प्रोमेल में से एक नाम चुनने की.

डेविड प्लेसेक की कंपनी ने इस पर काम करना शुरू किया. इसी दौरान किसी ने ताज़गी और आनंद के लिए स्ट्राबेरी का नाम सुझाया और इसके बाद किसी ने ब्लैकबेरी नाम सुझाया.

रिसर्च इन मोशन के एक्ज़ीक्यूटिव्स को दूसरा नाम पसंद आया. फ़ोन का नाम ब्लैकबेरी रखा गया.

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ब्लैकबेरी के नाम से जाने जाने वाली रिसर्च इन मोशन सवा तीन करोड़ से ज़्यादा फ़ोन बेच चुकी है.

कुछ कंपनियां और उनके पहले के नाम

सोनी (टोक्यो टेलीकम्युनिकेशंस इंजीनियरिंग)

याहू (जेरीस गाइड टू द वर्ल्ड वाइड वेब)

आईबीएम (कंप्यूटिंग टैब्यूलेटिंग रिकॉर्डिंग कॉर्पोरेशन)

पेप्सी (ब्रैड्स ड्रिंक)

फ़ेसबुक (द फ़ेसबुक)

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प्लेसेक कहते हैं कि कंपनी या उत्पाद के लिए नाम चुनना बहुत मुश्किल हो चुका है.

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32 साल पहले लेक्सिकॉन जब शुरू हुई थी तब सिर्फ़ पांच कर्मचारी थे. आज 700,000 से ज़्यादा लोग इस कंपनी के लिए काम करते हैं.

कुछ ऐसे ही हालात में टेक्सस के लॉयड आर्मब्रस्ट को अपनी कंपनी का नाम बदलना पड़ा था. 2010 में कंपनी शुरू करते हुए उन्होंने नाम सीइंग इंटरेक्टिव रखा था. ये कंपनी अख़बारों को प्रिंट विज्ञापनों को ऑनलाइन में बदलने में मदद करती है.

वो कहते हैं, "हमें यही वेब नेम मिला था. हमें लगा नाम मायने नहीं रखता, लेकिन ये बोलना मुश्किल था और लंबा था."

आख़िर उन्हें नाम बदलकर ऑनलोकल करना पड़ा.

आर्मब्रस्ट कहते हैं कि लगता है कि इसका असर हुआ है. वो बताते हैं, "अब ग्राहकों को कहते सुनते हैं कि 'ऑनलोकल 'ऑनलाइन उद्योग' में सबसे आगे है.'"

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