'इसराइल की एकतरफ़ा आलोचना सही नीति नही'

  • 20 जुलाई 2014
ग़ज़ा पट्टी Image copyright AFP

ग़ज़ा पर इसराइली हमले के मुद्दे पर मोदी सरकार की विदेश नीति की कांग्रेस समेत सभी विपक्ष आलोचना कर रहा है. लेकिन बीजेपी ने इसे निष्पक्ष विदेश नीति की शुरुआत कहा है.

बीजेपी के विदेश मामलों के प्रकोष्ठ के संयोजक शेषाद्रि चारी का कहना है कि अब तक इसराइल की एकतरफ़ा आलोचना वोटबैंक की राजनीति के कारण होती रही है.

भारत को फ़लस्तीन के साथ ही इसराइल की भी ज़रूरत है.

(गज़ा संघर्ष को लेकर भारत की चुप्पी पर सवाल)

पढ़िए शेषाद्रि चारी का पूरा विश्लेषण

ग़ज़ा के घटनाक्रम के मद्देनज़र संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद एक आपात बैठक बुला रही है तो उधर ग़ज़ा में नाज़ुक युद्धविराम फिर ख़त्म हो गया है जिससे और भी ज़्यादा लोग हताहत हो रहे हैं.

ग़ज़ा में जारी संघर्ष में इस्लामी समूह हमास के रॉकेट हमलों और इसराइल के हवाई हमलों से मारे जाने वाले लोगों के प्रति किसी के भी दिल में सहानुभूति पैदा होगी.

हालांकि इसराइल की आलोचना और ग़ज़ा में सक्रिय सभी तत्वों की तारीफ़ की जल्दबाज़ी के बाद ज़रूरी हो जाता है कि क़रीब-क़रीब असंभव शांति प्रक्रिया का वास्तविक विवेचन किया जाए.

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इसराइल की आलोचना का चलन एक बार फिर चल पड़ा है और भारत के स्व-घोषित 'धर्मनिरपेक्ष' वामदल स्थिति की ऐतिहासिक सच्चाई की ओर आंखें मूंद कर वर्तमान स्थिति को लेकर बेहद अतिरंजित बयान जारी कर रहे हैं.

इसकी पुष्टि तब हुई जब 15 जुलाई को मोदी सरकार ने, एक तरह से परंपरा बन चुकी, उस मांग को अस्वीकार कर दिया कि संसद एक प्रस्ताव पारित कर ग़ज़ा में हमलों की निंदा करे.

अगर 'धर्मनिरपेक्ष' विपक्ष यह उम्मीद कर रहा था कि इस बार भी चीज़ें पहले की तरह ही होंगी तो उन्हें तगड़ा धक्का लगा.

सरकार ने इस मामले में कोई ढील नहीं दी और ग़ज़ा में जारी घटनाक्रम पर लोकसभा में, जहां उसके पास पूर्ण बहुमत है, चर्चा से इनकार कर दिया.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस पर चर्चा करने से साफ़ इनकार करते हुए कहा कि इससे बहुत ग़लत संकेत जाएगा क्योंकि भारत के इसराइल और फ़लस्तीन दोनों के साथ बराबरी के रिश्ते हैं.

लेकिन राज्यसभा में स्थिति अलग थी क्योंकि वहां विपक्ष के पास संख्याबल है, कम से कम शोर मचाने लायक़ तो है.

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ग़ैर-एनडीए दलों के दिखावे को गंभीरता से लेना बहुत मुश्किल है. अरब जगत से भारत के नज़दीकी संबंधों की प्रमुख वजह तो यह है कि हमारी पश्चिमी एशिया के तेल पर निर्भरता और खाड़ी में बड़ी संख्या में भारतीयों की मौजूदगी.

भारत की विश्वसनीय वैकल्पिक ऊर्जा ढूंढ पाने में नाकामी की वजह से पश्चिमी एशिया पर हमारी निर्भरता बढ़ी है और हम अधिक यथार्थवादी रुख़ अपनाने को स्वतंत्र नहीं हो पाए हैं. हालांकि उनमें से कोई भी जम्मू-कश्मीर और 'आतंकवाद' जैसे मुद्दों पर हमारे पक्ष में कभी खड़ा नहीं हुआ है.

सभी सरकारों ने इसराइल के साथ संभलकर सबंध बनाए रखने की नीति अपनाई है और उसी समय अरब जगत के साथ लेन-देन किया है.

यह भी विचित्र बात है कि भारत का वह राजनीतिक वर्ग जिसने कभी भी कश्मीरी हिंदुओं की दुर्दशा पर आक्रोश नहीं जताया, न ही इराक़ या अन्य जगहों पर सुन्नी आतंकी गुटों द्वारा मारे जा रहे शिया मुसलमानों पर कुछ कहा, वह ग़ज़ा पर इतना शोर मचा रहे हैं.

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ऐसे में किसी को भी यह संदेह हो सकता है कि इसराइल पर हमले अपने वोट बैंक को रिझाने के लिए, राजनीतिक फ़ायदा उठाने के लिए किए जा रहे हैं.

भारत ने संघर्ष विराम का पुरज़ोर समर्थन किया है और आम नागरिकों की हत्या की निंदा की है, ख़ासतौर पर महिलाओं और बच्चों की.

भारत सरकार उन तथ्यों से भी अवगत है जो सीमा से लगे पूरे इलाक़े में इसराइली नागरिक क्षेत्रों में रॉकेट हमलों में सीधे हमास की भागीदारी की ओर इशारा करते हैं.

इस जानकारी को दरकिनार कर इसराइल की एकतरफ़ा आलोचना निष्पक्ष विदेश नीति के लिए अनुपयुक्त होगी.

इस तरह की पूर्वाग्रह वाली कार्रवाई ऐसी पार्टियों और संगठनों को तो सही लगेगी जो भेदभाव की राजनीति करते हैं लेकिन भारत के राष्ट्रीय हित और भौगोलिक हक़ीक़तें एक अलग मामला है.

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पूरी सीमा पर अपने शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों के आतंकी हमले झेल रहे इसराइल का लगातार जारी विरोध के चलते भारतीय लोगों को उससे स्वाभाविक सहानुभूति होती है.

हालांकि भारत को ऊर्जा और सुरक्षित नौकरी के लिए तेल से समृद्ध अरब देशों की ज़रूरत है लेकिन हम मज़बूत सुरक्षा संबंधों के लिए इसराइल पर भी निर्भर हैं.

जहां तक वर्तमान ग़ज़ा संकट का सवाल है इस वक़्त सूक्ष्म भेदयुक्त रास्ता ही सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा है. यह संघर्ष इसराइल और हमास के बीच है, इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच नहीं.

और जो लोग इस मामले में गले फाड़कर चिल्ला रहे हैं और ख़ुद को फ़लस्तीनी हित के लिए काम करने वाले चैंपियन समझ रहे हैं उन्हें यह याद रखना चाहिए कि यह मामला बाइबिल के समय से चला आ रहा है.

भारत की संसद में प्रदर्शन करने और चिल्लाने तथा वॉक आउट करने से ग़ज़ा, तेल अवीव, यरूशलम, और रमाल्लाह की स्थिति में लेशमात्र भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.

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हमास एक 'इस्लामिक आतंकी गुट' है और और यक़ीनन भारत का दोस्त नहीं है.

यक़ीनन कोई भी चाहेगा कि ग़ज़ा में जारी जंग वार्ता से हल हो, हिंसा से नहीं. जहां हम चाहते हैं कि यह संघर्ष जल्द ख़त्म हो वहीं भारत की संसद को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग करनी चाहिए और इसमें सिर्फ़ ग़ज़ा ही नहीं दुनिया भर में तमाम संघर्ष की जगहों पर विचार किया जाए.

इसराइल को शैतान घोषित करने या सिर्फ़ हमास को फटकारने से सिर्फ़ शोर ही बढ़ेगा कोई परिणाम हासिल नहीं होगा.

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