पाकिस्तानः पीपीपी के दांव से शरीफ़ हैरान

  • 23 जुलाई 2014
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पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ सरकार इस वक्त बेहद दबाव में है. कनाडा में रहने वाले इस्लामी विद्वान ताहिर-उल-क़ादरी के नेतृत्व में सेना-समर्थक कई दल सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

नवाज़ शरीफ़ पर अपने भाई, पंजाब के मुख्यमंत्री को हटाने का दबाव भी बनाया जा रहा है.

लेकिन शरीफ़ को सबसे बड़ा धक्का चुनावी राजनीति में अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी और सैन्य तानाशाही के ख़िलाफ़ सबसे भरोसेमंद सहयोगी पीपीपी के पाला बदलने से लगा है.

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने लाहौर की चार सीटों पर आम चुनाव के दौरान पड़े वोटों की फिर से गिनती कराने की तहरीक-ए-इंसाफ़ के प्रमुख इमरान ख़ान की मांग का समर्थन किया है.

ऐसे में पाकिस्तान की राजनीति में इस समय भारी हलचल है. पीपीपी का फ़ैसला नवाज़ शरीफ़ सरकार के लिए कितनी बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है और इसकी वजह क्या है?

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पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने हाल ही में तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी प्रमुख इमरान ख़ान की 2013 के चुनाव के मतदान के वोटों की फिर से गिनती कराने की मांग का समर्थन किया था. इससे प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और अलग-थलग पड़ सकते हैं.

ज़रदारी का बयान ऐसे वक्त में आया है जब शरीफ़ पहले ही देश में शक्तिशाली सेना और उसके साथ लामबंद कई छोटी पार्टियों के दबाव में हैं.

अस्सी के दशक के आख़िर में लोकतंत्र की बहाली से ही नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल-एन) और ज़रदारी की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) मुख्य प्रतिद्वंद्वी रहे हैं.

अगस्त 1990 में जब बेनज़ीर भुट्टो को चुनाव जीतने के बाद दो साल से भी कम वक्त में सत्ता से हटा दिया गया था तो पीएमएल-एन ने सत्ता प्रतिष्ठान का समर्थन किया था.

इसके बाद 1993 में पीपीपी सदस्यों ने अपनी संसद सदस्यता छोड़ दी थी. ऐसे में पूर्व राष्ट्रपति ग़ुलाम इश्हाक़ ख़ान ने संकट का हवाला देते हुए नवाज़ शरीफ़ को बर्ख़ास्त कर दिया था.

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लेकिन अक्टूबर 1999 में शरीफ़ को दूसरी सत्ता से हटाए जाने के बाद हालात बदल गए, जब दोनों पार्टियों के नेताओं को निर्वासन में रहने को मजबूर होना पड़ा.

सीओडी

दोनों पार्टियों के बीच 2006 में लंदन में तीन दौर की वार्ता के बाद एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर हुए जिसे चार्टर ऑफ़ डेमोक्रेसी (सीओडी) कहा गया.

इसमें सत्ता में आने पर तानाशाही के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की कसम खाई गई और पीएमल-एन सरकार की बर्खास्तगी के समय संविधान में किए गए फेरबदल को दूर करने की बात कही गई थी.

दोनों पक्ष सत्ता में आने के लिए सेना के साथ नज़दीकी बढ़ाने से बचने पर भी एकमत हुए थे.

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उस वक़्त बीबीसी को दिए साक्षात्कार में पीपीपी नेता बेनज़ीर भुट्टो ने कहा था, "यह सच है कि पहले दोनों पार्टियों में गंभीर मतभेद रहे हैं. लेकिन हम दोनों ही सैन्य तानाशाही के शिकार हुए हैं और इसलिए बड़ी तस्वीर को नज़र में रखते हुए हम एक समझौते को तैयार हुए हैं."

पीपीपी 2008 का चुनाव जीतकर सत्ता में आई. उसकी सरकार संसद में बहुमत न होने के बावजूद पांच साल पूरे करने में कामयाब रही, क्योंकि बिजली संकट और महंगाई के बावजूद नवाज़ शरीफ़ की पार्टी सड़कों पर नहीं उतरी.

मई 2013 में पीएमएल-एन की ज़बरदस्त जीत के बाद भी दोनों पक्षों में सौहार्द बना रहा.

मौजूदा नवाज़ शरीफ़ सरकार का अब तक का चौदह महीने का कार्यकाल राजनीतिक संकटों से मुक्त नहीं रहा.

सबसे पहले उन्हें क्रिकेट से राजनीति में आए तहरीक-ए-इंसाफ़ के नेता इमरान ख़ान ने चुनौती दी. उनकी मांग थी कि लाहौर के चार संसदीय क्षेत्रों में वोटों की फिर से गिनती कराई जाए जहां वह और उनकी पार्टी के तीन और सदस्य हारे थे.

ताहिर-उल-क़ादरी

दूसरी राजनीतिक चुनौती सामने आई कनाडा में रहने वाले मुस्लिम विद्वान ताहिर-उल-क़ादरी के रूप में, जो पाकिस्तान राजनीतिक तंत्र को बदलने के इरादे से आए थे.

करीब आधा दर्जन पार्टियों के नेता 29 जून को क़ादरी द्वारा बुलाए गए सम्मेलन में पहुंचे.

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पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई), मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम), पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क़ायद-ए-आज़म), जमात इस्लामी (जेआई), अवामी मुस्लिम लीग और पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने क़ादरी की पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ़, जो प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के छोटे भाई हैं, को हटाने की मांग का समर्थन किया.

सेना-समर्थक राजनीतिक दलों का एक संयुक्त मोर्चा बनना यकीनन सत्ताधारी पार्टी के लिए चिंताजनक बात थी लेकिन इसके नेतृत्व को यह राहत तो थी ही कि पीपीपी अब भी इसके साथ है.

ज़रदारी का ज़ोर का झटका

लेकिन पूर्व-राष्ट्रपति ज़रदारी ने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरत में डालते हुए 16 जुलाई को पीटीआई की चार संसदीय सीटों पर पुनर्मतगणना की मांग का समर्थन कर दिया.

इससे पीटीआई को बहुत जोश मिला जो पिछले साल मई में हुए आम चुनावों में धांधली का आरोप लगाती रही है.

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ज़रदारी ने कहा, "अगर चार सीटों पर फिर से गिनती हो जाती है तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा."

इसके बाद सरकार पर दबाव बनाने के लिए पीटीआई नेतृत्व तुरंत सक्रिय हो गया और उसने पीपीपी प्रमुख को 14 अगस्त को होने वाली अपनी पार्टी की रैली में शामिल होने के निमंत्रण दे डाला.

सिंध का खेल

ज़रदारी का बयान बिना किसी तैयारी के नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक कारण हैं.

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि ज़रदारी इस बात से ख़ुश नहीं है कि सिंध, जहां पीपीपी सत्ता में है, वहां नवाज़ शरीफ़ कथित रूप से हस्तक्षेप कर रहे हैं.

जिओ टीवी के एंकर हामिद मीर के मामले में सेना और मीडिया के बीच पहले ही जारी तनाव के बीच इस मामले से पाकिस्तान में राजनीतिक अनिश्चित्ता का माहौल और गहरा गया है.

वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडी ने हाल ही में पाकिस्तान की रेटिंग को 'स्थिर' करार दिया है. लेकिन इसके साथ ही चेतावनी दी है कि देश में बिगड़ते हुए राजनीतिक हालात इसे एक बार फिर नकारात्मक रेटिंग दिला सकते हैं.

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