ग़ज़ा में हमास की सुरंगों का जाल

ग़ज़ा में हमास की एक सुंरग इमेज कॉपीरइट Israeli Defence Forces

पिछले कई दिनों से इसराइल और हमास के बीच ग़ज़ा में संघर्ष हो रहा है. दोनों पक्ष एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं.

ग़ज़ा, मिस्र से भी सटा है. दोनों के बीच कई ऐसी सुरंगें हैं जिन्हें ग़ज़ा की अर्थव्यवस्था के हिसाब से अहम माना जाता है.

जब मिस्र में सेना ने मुस्लिम ब्रदरहुड की सरकार का तख़्ता पलटा, तब नई सरकार ने ऐसी कई सुरंगों को बंद कर दिया. ग़ज़ा में मौजूदा आर्थिक संकट की एक वजह इन सुरंगों का बंद होना भी है.

पढ़ें डॉक्टर ईगो हेक्ट की पूरी रिपोर्ट

मिस्र से सटे ग़ज़ा में सुरंगों का इस्तेमाल लगभग 15 साल पहले शुरू हुआ, जिसका मक़सद था ग़ज़ा में हथियारों को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से लाना. उस वक़्त ग़ज़ा इसराइल के सीमा सुरक्षा बल डिफ़ेंस फ़ोर्स (आईडीएफ़) के नियंत्रण में था.

लेकिन हथियारों की तस्करी के साथ ही सुरंग संचालकों ने नागरिक ज़रूरत की उस हर चीज़ का आयात करना शुरू कर दिया, जिसे बेचा जा सके.

इसराइल के ग़ज़ा से हटने के बाद तस्करी के लिए इस्तेमाल होने वाली इन सुरंगों की तादाद में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई. जहां पहले कुछ दर्जन ऐसी सुरंगें थीं, वहीं इसराइल के ग़ज़ा से हटने के बाद इनकी संख्या सैकड़ों में पहुंच गई क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा ग़ज़ा निवासी फ़ायदे वाले इस धंधे में शामिल हो गए.

इन सुरंगों के ज़रिए आने वाले सामान पर ग़ज़ा का हमास प्रशासन कर लगाता था, जो उसके राजस्व का एक बड़ा हिस्सा था.

मिस्र ने सुरंगों को बंद किया

लेकिन मिस्र में सेना द्वारा मुस्लिम ब्रदरहुड की सरकार का तख़्ता पलटने के बाद वहां की नई सरकार ने इन सुरंगों को बंद कर दिया.

साल 2001 से फ़लस्तीनियों ने इसराइली सीमा नाकों पर हमलों के लिए विस्फोटकों से भरी सुरंगों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. हालांकि ऐसी कोशिशें ज़्यादा नहीं की गईं क्योंकि इसमें मेहनत ज़्यादा थी और फ़ायदे कम. इन हमलों में हताहत बहुत कम लोग होते थे. जबकि हमले और तरीकों से करना ज़्यादा आसान था.

साल 2006 में फ़लस्तीनियों ने एक नया तरीक़ा अपनाया- ग़ज़ा-इसराइल सीमा के नीचे एक सुरंग खोदी गई और इस सुरंग के रास्ते पहुंची टीम ने इसराइली सीमा नाके पर पीछे से हमला किया.

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इसराइली सैनिकों को इस तरह के हमले की उम्मीद नहीं थी. इस हमले में दो सैनिक मारे गए, एक घायल हुआ और एक अन्य-गिलाद शालित (ऊपर- तस्वीर में) को अग़वा कर लिया गया.

ग़ज़ा पर क़ब़्ज़े के बाद हमास ने ज़मीन के नीचे कंक्रीट बंकरों का एक जाल बनाना शुरू किया, जिससे कई सुरंगें जुड़ती थीं और ज़मीन के ऊपर ग़ज़ा के रिहाइशी इलाक़ों में इनमें कई जगहों से घुसा और निकला जा सकता था.

ज़मीन के नीचे बनी सुरंगों का ये जाल काफ़ी कुछ दशकों पहले दक्षिण वियतनाम के जंगलों में वियत कॉन्ग द्वारा खोदी गई सुरंगों की तरह है. इन सुरंगों की दीवारें और छतें कंक्रीट से बनी हैं और इनमें लंबे समय तक रहने के मक़सद से बिजली और बाक़ी सारी ज़रूरत का सामान होता है.

मिस्र की सीमा के नीचे बनी सुरंगें, जिनका इस्तेमाल तस्करी के लिए होता है, वे ज़्यादातर बड़ी होती हैं ताकि लगातार इनका इस्तेमाल हो सके और बड़ा सामान आसानी से लाया जा सके.

दूसरी ओर जिन सुरंगों के ज़रिए घुसपैठ की जाती है, उनका इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा एक या दो बार होता है और वे सिर्फ़ इतनी चौड़ी होती हैं कि एक हथियारबंद आदमी उससे गुज़र सके.

हमास नेताओं की पनाहगाह

सुरक्षा सुरंगों का मक़सद ये है कि हमास के वरिष्ठ अधिकारी ज़मीन के नीचे सुरक्षित रह सकें और ऊपर हमास की सैन्य इकाई इसराइली सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करती रहे.

कई सुरंगें एक दूसरे से जुड़ी हैं जिससे नीचे ही एक जगह से दूसरी जगह आना जाना आसान हो जाता है और ज़मीन के ऊपर ये कई जगहों पर खुलती हैं.

इसके चलते हमास इसराइली सुरक्षाबलों पर अचानक हमला कर फिर से ज़मीन के अंदर ग़ायब हो सकता है.

सुरंगों के ऐसे जाल की पूरी संख्या का तो पता नहीं है, लेकिन इसराइली सेना के अनुमान के मुताबिक़ सुरंगों के ऐसे दर्जनों जाल हैं.

इन सुरंगों के मुहाने और शायद पूरी सुरंगों में भी विस्फोटक भरे होते हैं.

इनका पहली बार इस्तेमाल 2008-09 में हुआ जब इसराइल ने ग़ज़ा पर कार्रवाई की. इनकी कामयाबी के बाद सुरंगों के जाल को और तेज़ी से बढ़ाया गया.

वर्ष 2012 में रॉकेट हमले जब व्यर्थ सिद्ध होने लगे तो हमास ने सुरंगों का सहारा लेने का फ़ैसला लिया.

इनके ज़रिए कुछ ही किलोमीटर पर स्थित इसराइल के गांवों तक पहुंचा जा सकता था या उन गांवों के नीचे विस्फोटक बिछाया जा सकता था.

आईडीएफ़ को इस योजना के बारे में जानकारी थी, लेकिन वे सिर्फ़ कुछ ही सुरंगों को ढूंढकर तबाह कर पाए.

इन सुरंगों को ढूंढने के लिए या तो इसके प्रवेशद्वार का पता होना ज़रूरी है या फिर विभिन्न उपकरणों की मदद से इन्हें देखना ज़रूरी है.

इसराइल की मुश्किल

इसराइली ख़ुफ़िया तंत्र से इन्हें छुपाने के लिए सुरंगों के प्रवेश द्वार ज़्यादातर घरों की निचली मंज़िल, मस्जिदों, स्कूल या अन्य सार्वजनिक इमारतों में बनाए जाते हैं.

सुरंगें खोदने के काम में मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता क्योंकि उससे शोर होता है. इसलिए इसमें कई महीने लग जाते हैं. मिट्टी हटाने का काम भी धीरे-धीरे और किसी और काम की आड़ में किया जाता है.

अब तक ऐसी विश्वसनीय तकनीक विकसित नहीं हुई है जो ज़मीन के नीचे कुछ मीटर से ज़्यादा इन सुरंगों की पहचान कर सके. इनकी पहचान के लिए इसराइलियों के पास ग़ज़ा में बेहतरीन ख़ुफ़िया तंत्र होना चाहिए या हर घर की तलाशी करनी होगी.

हमास द्वारा खोदी गई सुरंगें ज़्यादातर 20 मीटर की गहराई पर खोदी जाती हैं. इसलिए इनके स्थान का अनुमान होने के बावजूद इन्हें ढूंढना मुश्किल होता है.

एक सुरंग को तबाह करने में बहुत समय लगता है और ये एक जटिल प्रक्रिया है क्योंकि सिर्फ़ इसके प्रवेशद्वार को बारूद से उड़ाने के बाद भी ज़्यादातर सुरंग बच जाती है. और हमास फिर से इसे खोदकर दोबारा इस्तेमाल शुरू कर सकता है.

इसलिए सुरंग की पूरी लंबाई, उससे निकलने वाले विभिन्न रास्ते और अन्य सुरंगों को ढ़ूंढने, उनका नक़्शा बनाने के बाद ही इन्हें पूरी तरह से तबाह किया जा सकता है.

(डॉ. ईडो हेक्ट एक स्वतंत्र रक्षा विशेषज्ञ और बार इलान विश्वविद्यालय के बेगिन सादात सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टीज़ में सैन्य मामलों के प्राध्यापक हैं.)

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