चीन: 'समलैंगिकता के इलाज' पर उठे सवाल

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चीन में समलैंगिक कार्यकर्ता इस कोशिश में जुटे हैं कि वहां समलैंगिकता को एक बीमारी न माना जाए.

इस महीने एक चीनी अदालत एक मुक़दमे की सुनवाई करने वाली है जो समलैंगिकता के इलाज का दावा करने वाले एक क्लीनिक के ख़िलाफ़ दायर किया गया है.

चीन में लगभग एक दशक पहले समलैंगिकता को मानसिक बीमारी की श्रेणी से हटा दिया गया. लेकिन अब भी वहां इसके इलाज का दावा करने वाले क्लीनिक आसानी से दिख जाते हैं.

मैं चीन के पूर्वी शहर नानचिंग में एक ऐसे ही क्लीनिक में गया, जहां मुझे डॉ. चोऊ चेंगयू मिले. वो दावा करते हैं कि उन्होंने अपने '70 प्रतिशत पुरुष समलैंगिक मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज' किया है.

कम स्वीकार्यता

डॉ. चोऊ कई किताबें दिखाते हैं जो उन्होंने इस विषय पर लिखी हैं. इनमें से एक किताब उन माता पिता के लिए हैं जिन्हें संदेह है कि उनका बेटा या बेटी समलैंगिक हैं.

आलोचक कहते हैं कि डॉ. चोऊ एक बार के 120 डॉलर लेते हैं जो बहुत खर्चीला है.

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वो कहते हैं कि अपने इलाज में वो काउंसलिंग पर जोर देते हैं और इसके लिए कोई दवाएं लेने को नहीं कहते हैं, जैसा कि चीन में कई जगह होता है. लेकिन वो ये ज़रूर बताते हैं कि इस इलाज कैसे कैसे तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं.

वो कहते हैं, "एक सामान्य तरीका है बिजली के करंट देना. जब किसी मरीज़ को पुरुष समलैंगिकता वाले विचार आते हैं तो हम उन्हें करंट देते हैं और उन्हें इंजेक्शन भी लगाते हैं जो उन्हें बीमार बनाते हैं."

चीन में अब समलैंगिक समुदाय सक्रिय हो रहा है और उन्होंने कई प्रदर्शन भी किए हैं. अकसर उनके हाथ में तख्तियां होती हैं जिन पर लिखा होता है- 'समलैंगिक होना कोई बीमारी नहीं है'. फिर भी इसके लिए स्वीकार्यता बहुत कम है.

एक डॉक्टर का कहना है, "हम समलैंगिकता का समर्थन नहीं कर सकते हैं."

उम्मीद

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लेकिन पहली बार चीन में समलैंगिकता का इलाज करने वाले क्लीनिक के ख़िलाफ़ मुक़दमे की अनुमति दी गई है.

मुक़दमा दायर करने वाले शिआओ चेन कहते हैं, "मुझे एक बार करंट देने वाली थेरेपी से गुजरना पड़ा है. उन लोगों के बारे में सोचिए जो कई बार इससे गुज़रते हैं."

उन्होंने सबूत जुटाने के लिए इस थेरेपी को आज़माया था और उन्हें उम्मीद है कि अदालत का फ़ैसला उनके हक़ में आएगा और ऐसे क्लीनिकों और डॉक्टरों पर रोक लगेगी.

यूरोप और अमरीका में ऐसे क्लीनिकों और डॉक्टरों के ख़िलाफ़ दशकों से मुहिम चलती रही हैं लेकिन अब भी वहां इस धारणा को पूरी तरह ख़त्म नहीं किया जा सका है.

लेकिन पश्चिमी चिकित्सा जगत में इस बात को लेकर एक राय है कि ऐसे कोई सबूत नहीं है कि व्यक्ति के लैंगिक रुझान को बदला जा सकता है.

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