चीन का बढ़ता असर कम कर पाएंगे मोदी?

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भारत और नेपाल के बीच संबंध ऐतिहासिक हैं. मगर पिछले कुछ साल में चीन नेपाल को अपनी ओर लुभाने में सफल रहा है.

वहीं भारत ने नेपाल में चीन के बढ़ते असर को कम करने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाया.

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस दिशा में कामयाब होंगे?

पढ़ें बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद का विश्लेषण

पिछले दो दशकों से चीन ख़ामोशी से लेकिन पूरी दृढ़ता के साथ बर्मा, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में अपना असर बढ़ा रहा है.

चीन के काम करने का तरीका सरल है. चीन पैसे से मदद नहीं करता, बल्कि इन देशों में बुनियादी ढांचा बनाने का बीड़ा उठाता है.

चीन ने इन देशों में सड़कें, पुल, बंदरगाह और हवाईअड्डों के कई प्रोजेक्ट पूरे किए हैं.

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नेपाल में चीन ने काफ़ी काम किया है. इस कारण नेपाल साफ़ तौर पर चीन के प्रभाव में आया है और भारत का असर थोड़ा कम हुआ है.

एक समय था जब काठमांडू में भारतीय दूतावास सबसे असरदार जगह थी.

क्या मोदी उस असर को बहाल कर सकने में सफल होंगे? यह अब इतना आसान नहीं दिखता.

हिमालयी देशों का संगठन?

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नेपाल, भूटान, भारत और चीन की सरहदें एक दूसरे से मिलती हैं और ये देश एक दूसरे के सहयोग से फ़ायदा उठा सकते हैं.

इस संदर्भ में पिछले साल चीन ने सहयोग का एक प्रस्ताव रखा था लेकिन तब यूपीए सरकार ने इस पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया था.

भारत को डर है कि इससे भूटान और नेपाल में चीन का असर और बढ़ जाएगा.

नरेंद्र मोदी की चीन के प्रति सोच अलग दिखती है. वह चीन से डरने के बजाय उससे सीखना चाहते हैं. वो गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में चार बार चीन गए थे.

गुजरात में चीन ने काफी निवेश भी किया है, लेकिन मोदी अब प्रधानमंत्री हैं और देशहित को सामने रखकर ही अगला कदम उठाएंगे.

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देखना यह है कि वह नेपाल के प्रधानमंत्री कोइराला के साथ बंद कमरे में बातचीत में चीन के भूत को कितना महत्व देते हैं?

'भारत विरोधी तत्वों' पर अंकुश

पिछले कुछ साल से काठमांडू 'भारत विरोधी तत्वों' का केंद्र सा बन गया है. भारत ने काठमांडू में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के सक्रिय रहने का आरोप लगाया है.

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भारत में पुलिस ने ऐसे कई कथित चरमपंथियों को पकड़ा है जो नेपाल के रास्ते भारत आए थे.

इस आवाजाही को रोकने के लिए नेपाल सरकार पर दबाव डालना मोदी के लिए एक बड़ी चुनौती है.

भारत के पड़ोसी देश अक्सर यह शिकायत भी करते रहे हैं कि भारत बिग ब्रदर जैसा सुलूक करता है और इसमें शायद कुछ सच भी हो.

हालांकि नरेंद्र मोदी ने इस शिकायत को पहले दूर करने की कोशिश की है.

अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई देशों के नेताओं को बुलाकर उन्होंने पैग़ाम दिया कि भारत अपने पड़ोसियों का दोस्त है 'बिग ब्रदर' नहीं.

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