जो बर्फ़ में जमने और मरने को छोड़ दिए गए

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आमिर मेहदी का सपना था पाकिस्तान के सबसे ऊंचे पहाड़ के-2 को फतह करना. वह कामयाबी हासिल करने के करीब पहुँच ही गए थे, लेकिन उनके साथी इटली के पर्वतारोही ने उन्हें दग़ा दे दिया.

उन्हें पूरी रात हड्डियां तक जमा देने वाली बर्फ पर गुजारनी पड़ी, लेकिन खुशकिस्मत रहे और ज़िंदा बच गए.

यह वाकया लगभग 60 साल पहले का है.

पढ़िए शाहज़ेब जिलानी की रिपोर्ट

पाकिस्तान को चीन से जोड़ने वाले काराकोरम राजमार्ग पर हुंज़ा घाटी में पड़ता है हसनाबाद गांव.

जब मुझे पता चला कि यह पाकिस्तान के दिग्गज पर्वतारोही आमिर मेहदी का घर है तो मैं खोजता-खोजता इस गांव तक चला आया. आमिर मेहदी को हुंज़ा मेहदी के नाम से भी जाना जाता है.

हुंज़ा नेपाल के शेरपाओं की तरह हैं. पाकिस्तान के ऊंची चोटियों मसलन के-2, नंगा पर्बत, ब्रॉड चोटी पर चढ़ने के लिए पर्वतारोही अब भी इनकी मदद लेते हैं. ये सभी चोटियां 8 हज़ार मीटर से अधिक ऊंची हैं.

Image caption आमिर मेहदी को बाद में इटली की सरकार ने मेडल देकर सम्मानित किया

लेकिन 1954 में के-2 पर चढ़ने वाले इटली के पर्वतारोही दल में शामिल आमिर मेहदी, आज तकरीबन भुलाए जा चुके हैं.

आमिर के 62 वर्षीय पुत्र सुल्तान अली बताते हैं, "मेरे पिता के-2 पर देश का झंडा गाडने वाले पहले पाकिस्तानी बनना चाहते थे, लेकिन 1954 में उन्हीं लोगों ने उन्हें धोखा दिया जिनकी वो मदद कर रहे थे."

पर्वतारोही कोम्पागनोनी और लेसडेली सबसे आगे थे. चोटी पर चढ़ने के ठीक एक दिन पहले उन्होंने मेहदी को वाल्टर बोनेट्टी की मदद करने और ऑक्सीजन सिलेंडर 8 हज़ार मीटर की ऊंचाई तक ले जाने को कहा.

सुल्तान अली कहते हैं, "दल में शामिल अन्य पोर्टर्स ने इससे इनकार कर दिया था, लेकिन मेरे पिता इसके लिए तैयार हो गए, क्योंकि उनसे चोटी पर साथ ले जाने का वादा किया गया था."

Image caption ठंड से गल जाने के कारण मेहदी के पैरों की उंगलियों को काटना पड़ा

लेकिन जब वो दोनों देर शाम निर्धारित जगह पर पहुंचे तो न तो वहाँ कोम्पागनोनी और लेसडेली थे और न ही टेंट. दोनों उन्हें ढूंढते हुए और ऊपर चढ़ने लगे. बोनेट्टी अपने साथियों को ज़ोर-ज़ोर से पुकार रहे थे, तभी उसकी आवाज़ पर एक जवाब आया. कहा गया कि ऑक्सीजन सिलेंडर छोड़ दो और लौट जाओ, लेकिन अंधेरे में लौटना नामुमकिन था.

मेहदी और बोनेट्टी को बर्फ के बीच माइनस 50 डिग्री सेल्सियस की हड्डियों को जमा देने वाली ठंड में रात गुजारनी पड़ी. दोनों ने ज़िंदा रहने की उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन वे किसी तरह बच गए.

बाद में खुलासा हुआ था कि कोम्पागनोनी ने जान-बूझकर वहां से टेंट हटा दिया था क्योंकि वह बोनेट्टी और मेहदी को चोटी पर साथ नहीं ले जाना चाहते थे.

मेहदी के पैर बुरी तरह गल चुके थे और रावलपिंडी स्थिति सैनिक अस्पताल में उपचार के दौरान डॉक्टरों को उनके पैर की सभी उंगलियां काटनी पड़ी.

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Image caption पर्वतारोही की कामयाबी में सामान ले जाने वाले पोर्टर्स का अहम योगदान होता है

आठ महीने बाद वह अस्पताल से निकलकर जब अपने गांव हुंज़ा पहुंचे तो इस कदर दुखी थे कि उन्होंने बर्फ काटने की अपनी कुदाल फेंक दी और परिवार से कहा कि वह फिर कभी इसे अपने आस-पास नहीं देखना चाहते.

1994 में इस्लामाबाद में के-2 पर जीत की 40वीं सालगिरह के जश्न में कोम्पागनोनी, लेसडेली और मेहदी एक साथ थे. उनके बेटे सुल्तान भी उनके साथ थे.

सुल्तान बताते हैं, "यह बेहद भावुक पल था. वे एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते थे, लेकिन जब तीनों गले मिले तो बच्चों की तरह रोए थे."

मेहदी ने दिसंबर 1999 में 86 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा.

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