कश्मीर पर वार्ता टूटने से पाक मीडिया बेपरवाह

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एक ओर जहां इमरान ख़ान और ताहिर उल क़ादरी नवाज़ शरीफ़ पर इस्तीफ़े का दबाव बना रहे हैं वहीं पाकिस्तानी मीडिया में भारत पाकिस्तान रिश्तों को लगे झटकों की ख़बर को इसकी अहमियत से कहीं कम जगह मिली है.

अंग्रेजी के दो प्रमुख दैनिक अख़बार डेली डॉन और द न्यूज़ ने सचिव स्तर की वार्ता स्थगित किए जाने की ख़बर को अपने मुखपृष्ठ के निचले हिस्से में जगह दी है.

इस्लामाबाद में जारी विरोध प्रदर्शनों के 24 घंटे के प्रसारण में उलझे पाकिस्तानी टीवी चैनलों ने तो इस ख़बर को महज़ सरसरी सी तवज्जो दी.

संबंधों में आई गिरावट

लगता है, कुछ समाचारपत्रों ने अपने संपादकीय के लिए इमरान और क़ादरी के भाषणों का देर रात तक इंतज़ार किया. इसकी वज़ह से वे दोनों देशों के बीच संबंधों में आई कड़वाहट पर टिप्पणी करने से चूक गए.

हालांकि द न्यूज़ ने अपने 'टेंस टाइज़' शीर्षक से लिखे संपादकीय में नियंत्रण सीमा रेखा पर बढ़े हालिया तनाव का ज़िक्र किया है. लेकिन उसमें बातचीत को लेकर कुछ नहीं लिखा गया है.

अख़बार ने पाकिस्तानी हुकूमत का पक्ष लेते हुए नियंत्रण रेखा पर तनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कारगिल दौरे की आलोचना की है.

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संपादकीय में इस बात की आशंका जताई गई है कि "शांत लोगों की वजह से हो सकता है कि हालात इस बार न बिगड़े लेकिन बातचीत पटरी पर से उतरने का ख़तरा हमेशा बना रहेगा."

संपादकीय पन्ने पर पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक मलीहा लोधी का व्यंगात्मक लेख भी 'टॉक्स अबाउट टॉक्स' शीर्षक से छपा है.

देखने से लगता है कि यह लेख बातचीत स्थगित करने के भारतीय फ़ैसले के पहले लिखा गया था.

भविष्य की वार्ता

मलीहा ने अपने लेख में स्थगित हुए वार्ता से बहुत ज़्यादा उम्मीद करने के प्रति चेताते हुए कहा है, "ये वार्ता भविष्य की वार्ता की संभावनाओं और रूपरेखा के बारे में हैं."

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ऐसा लगता है कि अब इसका इंतज़ार और लंबा हो गया है.

दकियानूसी उर्दू मीडिया में हालात और भी बदतर है. आप उर्दू डेली एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर वार्ता स्थगित होने की ख़बर भी नहीं ढूंढ पाएंगें.

अख़बार ने बड़े बड़े अक्षरों वाले शीर्षक के साथ इमरान ख़ान के रेड ज़ोन में घुसने की धमकी की ख़बर आठ कॉलम में जगह दी है.

ऐसा लगता है कि भारत के साथ संबंधों में लगे गंभीर झटके पर पाकिस्तानी मीडिया तब चेतेगा जब उसका इमरान और क़ादरी का बुख़ार उतर पाएगा.

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