चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात का डर

  • 24 अगस्त 2014
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पाकिस्तान का सियासी गतिरोध जहां वहां के मीडिया में छाया हुआ है, वहीं पाकिस्तान से बातचीत रद्द करने के मोदी सरकार के फ़ैसले पर भी ख़ूब टीका टिप्पणियां की गई हैं.

जंग ने दोनों देशों की विदेश सचिव स्तरीय बातचीत रद्द करने को भारत का नकारात्मक रवैया बताया है.

अख़बार कहता है कि हुर्रियत के नेताओं से सलाह मशविरा दशकों से होता रहा है, इसे मुद्दा बना कर बातचीत रद्द करना और पाकिस्तान पर दहशतगर्दी फैलाने के आरोप लगाना अफ़सोसनाक है.

वहीं नवाए वक़्त का कहना है कि दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिल कर लौटे हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी की श्रीनगर में गिरफ़्तारी पाकिस्तानी सरकार के लिए चिंता का विषय है.

अख़बार कहता है कि पाकिस्तान को भारत और ख़ासकर मोदी सरकार से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए और बेहतर होगा कि नवाज़ शरीफ़ सरकार साफ़ कर दे कि दोनों देशों के रिश्ते और व्यापार तभी आगे बढ़ेंगे जब कश्मीर मुद्दे के हल के क़दम उठाए जाएंगे.

सियासी संकट

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पाकिस्तान में सरकार विरोधी आंदोलन पर रोज़नामा एक्सप्रेस का संपादकीय है- देश को संकट से निकाला जाए.

अख़बार की राय है कि देश में जारी सियासी गतिरोध से पूरे देश में अविश्वास का माहौल है. हर कोई सोच रहा है कि अब क्या होगा, गतिरोध बातचीत के ज़रिए सुलझेगा या कोई और हल निकलेगा.

वहीं रोज़नामा खबरें का कहना है कि टकराव का नहीं, बातचीत का रास्ता अपनाया जाए.

अख़बार की राय है कि इस संकट को बातचीत से सुलझाया जा सकता है और ख़ुद नवाज़ शरीफ़ इस बात को कह चुके हैं. ऐसे में उन्हें विरोध करने वालों को अलग-थलग पड़ने का ताना देने की बजाय ठंडे दिमाग से हालात को समझना चाहिए और प्रदर्शनकारियों की संवैधानिक मांगों पर ग़ौर करना चाहिए.

अख़बार ने अमरीका और यूरोपीय संघ के इस बयान का जिक्र भी किया है कि वे पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन के किसी भी असंवैधानिक क़दम का समर्थन नहीं करेंगे.

दैनिक मशरिक़ ने देश के सियासी हालात को एक कार्टून के ज़रिए पेश किया है जिसमें नवाज़ शरीफ़ अपनी कुर्सी सिर पर उठाए दौड़ रहे हैं और उनके पीछे पड़े हैं इमरान ख़ान और ताहिरुल क़ादरी.

चार दिन की चांदनी

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रुख़ भारतीय उर्दू अख़बारों का करें तो उसमें भी पाकिस्तान से बातचीत रद्द करने का मोदी सरकार का फ़ैसला छाया रहा.

राष्ट्रीय सहारा लिखता है कि मोदी के शपथ ग्रहण में नवाज़ शरीफ़ का आना, मोदी की मां के लिए साड़ियां लाना और दोनों प्रधानमंत्रियों का गर्मजोशी से मिलना, ये सब बातें चार दिन की चांदनी साबित हुईं, लेकिन ख़ुदा करे कि अंधेरी का सिलसिला न शुरू हो जाए.

रिश्वत के आरोपों में सेंसर बोर्ड के प्रमुख की गिरफ्तारी पर हिंदोस्तान एक्सप्रेस का संपादकीय है- सेंसर बोर्ड से काली कमाई.

अख़बार कहता है कि जिस तरह की बेहूदा, भद्दी और द्विअर्थी संवादों वाली फ़िल्में धड़ल्ले से आ रही हैं, उन्हें रिश्वत के बगैर पास नहीं कराया जा सकता.

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