काला नौजवान दफ़न, नस्लभेद पर सवाल क़ायम

  • 26 अगस्त 2014
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अमरीका के मिज़ूरी राज्य में उस काले नौजवान के शरीर को दफ़ना दिया गया है जिसे एक गोरे पुलिस अधिकारी ने दो हफ़्ते पहले दिन-दहाड़े गोली मार दी थी.

अट्ठारह साल के माइकल ब्राउन की मौत के बाद से मिज़ूरी के फ़रगसन शहर में कई दिनों तक दंगे हुए, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं और 21वीं सदी के अमरीका में नस्लवाद की बहस एक बार फिर से तेज़ हो गई.

ब्राउन की मौत और उसके बाद उठे कई सवालों पर पढ़िए वॉशिंगटन से ब्रजेश उपाध्याय की ये विशेष रिपोर्ट -

रिपोर्ट विस्तार से

सोमवार की सुबह फ़रगसन के बैपटिस्ट चर्च के बाहर उमस भरी गर्मी में हज़ारों की भीड़ जुटी. इनमें से कुछ माइकल ब्राउन के रिश्तेदार थे, कुछ दोस्त थे लेकिन ज़्यादातर ने नौ अगस्त से पहले माइकल ब्राउन का नाम भी नहीं सुना था.

बहुतों की आंखें नम थीं लेकिन जैसी कि इस चर्च की परंपरा है, यहां ब्राउन की मौत नहीं उनकी जिंदगी का जश्न मनाया गया, जैज़ और गॉस्पेल म्यूज़िक पर थिरककर, तालियां बजाकर और दुआ मांगकर.

घटना

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नौ अगस्त को एक गोरे पुलिस अधिकारी डैरन विल्सन के हाथों निहत्थे माइकल ब्राउन की मौत को काले समुदाय ने बर्बर हत्या का नाम दिया. कहा गया कि ब्राउन ने अपने हाथ सरेंडर की मुद्रा में उठा रखे थे जब उन्हें छह गोलियां मारी गईं.

वहीं पुलिस ने घटना की अगली सुबह एक वीडियो जारी कर दिया जिसमें ब्राउन को एक दुकान से ज़बरदस्ती सिगार का एक पैकेट लेते हुए दिखाया गया था लेकिन ये भी पता चला कि जब उन्हें गोली मारी गई उस वक्त तक पुलिस वाले को ये नहीं मालूम था कि उन्होंने छीना-झपटी की है.

पुलिस का कहना है कि ब्राउन ने पुलिस अधिकारी पर हमला किया था जिसके जवाब में ये कार्रवाई हुई. बुधवार से एक ग्रैंड जूरी इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी.एफ़बीआई भी इस मामले की जांच कर रही है.

नस्लवाद पर बहस

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लेकिन अमरीका में बहस इस बात पर नहीं हो रही कि ब्राउन ने जुर्म किया था या नहीं, बहस अब काले समुदाय के ख़िलाफ़ बरसों से चली आ रही पुलिस की ज़्यादती पर है.

काला समुदाय इसे एक पैटर्न का हिस्सा मानता है जिसमें पुलिस की गोली का शिकार बने काले नौजवान को कभी अपराधी, कभी नशेबाज़, तो कभी सरफिरे की तरह पेश कर उसकी मौत को जायज़ ठहराने की कोशिश की जाती है.

चर्च में माइकल ब्राउन के एक रिश्तेदार एरिक डेविस ने कहा कि अब बहुत हो चुका और वक्त को बदलने की ज़रूरत है.

एरिक डेविस का कहना था, “हमने अपने भाइयों और बहनों का क़त्ल बहुत देख लिया और जो लोग सत्ता में हैं हम उनसे कह रहे हैं कि हमारी आवाज़ सुनो. अब हमें वोट के ज़रिए चीज़ें बदलनी होंगी.”

अमरीका के कई हिस्सों में अब भी काले समुदाय के लोग बहुत कम मतदान करते हैं.

गहरी खाई

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काले और गोरे की खाई अब भी कितनी गहरी है इसका अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि फ़रगसन शहर में ही गोरे समुदाय के लोग पुलिस ऑफ़िसर डैरन विल्सन के हक में नारे लगा रहे हैं. उनकी मदद के लिए पैसा जुटाया जा रहा है और अब तक चार लाख डॉलर से ज़्यादा चंदा इकट्ठा हो चुका है.

कुछ ही हफ़्तों पहले न्यूयॉर्क में पुलिस के हाथों एक काले व्यक्ति की मौत हुई थी, पिछले साल भी एक सिक्योरिटी गार्ड को ट्रेवर मार्टिन नाम के काले नौजवान की हत्या के बाद निर्दोष करार दिया गया था.

काले समुदाय का कहना है कि पुलिस हो या अदालत वो चमड़ी का रंग देखकर फ़ैसला करती है.

लेकिन दूसरी हक़ीकत ये भी है कि यहां बंदूक से मारे जाने वाले 90 प्रतिशत काले नौजवान पुलिस के हाथों नहीं बल्कि दूसरे काले नौजवानों के हाथों मारे जाते हैं.

और माइकल ब्राउन की याद में जुटे लोगों के सामने यहां के जाने-माने काले नेता ऐल शार्पटन ने इस सवाल को भी उठाया.

पुराने ज़ख़्म

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ऐल शार्पटन का कहना था, “हम एक दूसरे के साथ जिस तरह का बर्ताव करते हैं उस पर हमें शर्म आनी चाहिए. हम जिस तरह से एक दूसरे पर बंदूक का निशाना लगाते रहते हैं वो उन्हें मौका देता है हमारे ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का क्योंकि हममें से कुछ ऐसे हैं जिनके लिए हमारी पहचान ही यही है कि हम कितना नीचे गिर सकते हैं.”

बहुतों का मानना था कि राष्ट्रपति ओबामा को चुनकर अमरीका ने नस्लभेद को हमेशा के लिए दफ़ना देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठा लिया है.

लेकिन हर दूसरे-तीसरे महीने देश के किसी न किसी कोने में कोई ऐसी घटना होती है जो इस बरसों पुराने ज़ख़्म पर एक और वार कर जाती है. और व्हाइट हाउस में एक काले राष्ट्रपति की मौजूदगी सिर्फ़ एक चुनावी जीत भर नज़र आती है.

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