गर तेंदुलकर संसद पर चढ़ाई कर दें...

  • 1 सितंबर 2014
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पिछले एक पखवाड़े से भी अधिक समय से पाकिस्तानी राजनीतिक उथल पुथल के दौर से गुजर रही है.

इमरान ख़ान और ताहिरुल क़ादरी नवाज़ शरीफ़ के इस्तीफ़े से कम पर मानने को राज़ी नहीं हैं.

उधर, ख़ान और क़ादरी समर्थक पत्थर-डंडे और गैस मास्क पहनकर प्रधानमंत्री आवास की ओर कूच कर रहे हैं और सुरक्षा बलों के साथ उनकी झड़पें हो रही हैं.

इन हालात में दिल्ली में बैठा कोई शख्स क्या महसूस कर रहा होगा ? अपने अनोखे अंदाज़ में वुसतुल्लाह ख़ान..

पढ़िए वुसतुल्लाह ख़ान का ब्लॉग

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कभी कभी ऐसे दिन भी आते हैं जब न कुछ सोचा जाता है न लिखा जाता है, बस दिल चाहता है कि आदमी अकेला बैठा रहे. बात करना भी मेहनत करने जैसा लगता है.

इस वक्त मेरा यही हाल है. कल शाम से टीवी बंद कर दिया है, लेकिन दिल चाहता है कि इस टीवी को भी खिड़की से बाहर फेंक दें.

मेरी तकलीफ समझनी है तो ज़रा देर के लिए आंखें बंद कर लें और तसव्वुर कर लें कि कोई एनआरआई आचार्यजी दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर उतरते ही ऐलान कर दें कि लोकतंत्र तो एक फ़्रॉड है और उसके नाम पर पिछले छह दशक से जनता पर जुल्म किया जा रहा है.

आचार्याजी और तेंदुलकर

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'अगर लोकतंत्र ये है कि हर वर्ष हजारों किसान आत्महत्या कर लें, अगर लोकतंत्र ये है कि एक गरीब आदमी को किसी गुंडे से अपना मकान वापिस लेने के लिए दस-दस साल अदालत के सामने नाक रगड़नी पड़े, मृत्यु प्रमाणपत्र भी लेने के लिए क्लर्क को घूस देनी पड़े, अगर किसी पुलिस ऑफिसर को अपनी ही पेंशन लेने के लिए चपरासी से लेकर ऊपर तक हरेक के सामने घिघियाना पड़े तो लानत है ऐसे लोकतंत्र पर...'

'मैं नहीं मानता ऐसी संसद को, सबको लपेट दो.'

जिस समय आचार्यजी ऐलान कर दें कि ऐसे लोकतंत्र का तख्ता पलट करने के लिए वो आगरा से दिल्ली तक दस लाख लोगों के साथ क्रांति मार्च करेंगे, उसी समय यदि कोई सचिन तेंदुलकर ये ऐलान कर दे कि मोदी सरकार धांधली की उपज है, जिसने जनता का वोट चुराया है. इसलिए मेरे हज़ारों सहयोगी तब तक संसद नहीं चलने देंगे जबतक कि मोदी सरकार इस्तीफ़ा नहीं देती?

और फिर आचार्यजी और सचिन तेंदुलकर एक दूसरे के आगे पीछे नई दिल्ली में दाखिल हों और संसद को घेर कर धरना दे दें और विपक्ष समेत किसी की भी बात सुनने से इनकार कर दें.

मोदी और फ़ौज

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और जब सत्रह दिन के धरने के बाद भी मोदी सरकार, प्रधान न्यायाधीश और चुनाव आयुक्त त्यागपत्र न दें तो अचानक ये हज़ारों विरोधी हेलमेट पहन, मुंह पर गैस मास्क लगा, डंडे-गुलेलें और मिर्च स्प्रे हाथों में उठा, पत्थरों से भरे बैग कंधों से लटका, राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास की ओर दौड़ पड़ें और उनकी दीवारें या दरवाजे साथ लाई हुईं क्रेन से तोड़ दें.

पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों से उनकी आंख मिचौली चलती रहे और अर्थव्यवस्था इतनी बिगड़ जाए कि मोदी सरकार को फ़ौज की मदद मांगनी पड़ जाए.

और फिर सेनापति ये कह दें कि फ़ौज तो न्यूट्रल है, सरकार और बलवाई अपना झगड़ा खुद ही निपटाएं.

ये सब टीवी की स्क्रीन देखकर और सुनकर आपको कैसा लगेगा? बस, आपको जैसा लगेगा, वैसा ही मुझे इस वक़्त इस्लामाबाद में बैठकर लग रहा है.

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