'अल क़ायदा से भारत के अस्तित्व को बड़ा ख़तरा नहीं'

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अल क़ायदा के प्रमुख आयमन अल ज़वाहिरी के वीडियो ने, जिसमें 'जमात क़ायदात अल जिहाद फ़ी शीभी अल क़र्रात अल हिंदिया' यानी भारतीय उपमहाद्वीप में जिहादी संगठन बनाने का ऐलान किया गया है, मीडिया जगत में बहुत प्रमुखता पाई है.

भारतीय विशेषज्ञ इससे ख़ासतौर पर चिंतित हैं कि ज़वाहिरी के ऐलान में तीन भारतीय राज्यों जम्मू कश्मीर, गुजरात और असम का ज़िक्र हुआ है. और यह कि अब अल क़ायदा ब्रैंड के हाइपरटैररिज़्म के लिए और संगठन में भर्ती के लिए ये राज्य निशाना बनेंगे.

हालांकि भारत में कमज़ोर ठिकाने चरमपंथ के निशाने पर हो सकते हैं मगर अल क़ायदा ने अब जो कहा है वो पहले भी ऐसी बातें कर चुका है.

पढ़िए अजय साहनी का पूरा विश्लेषण

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उन्माद में सरकार और गृहमंत्रालय के बीच की बातें ही घूमती दिखाई दीं और शायद आंतरिक सुरक्षा पर अपनी अचूक पकड़ का दिखावा करने की कोशिश में तुरंत ‘हाई अलर्ट’ भी घोषित हो गया.

चूंकि तब तक किसी फ़ौरी चरमपंथी ख़तरे की कोई ख़ास ख़ुफ़िया जानकारी नहीं थी तो यह साफ़ नहीं कि सिवाय मुस्लिम इलाक़ों में पुलिसकर्मियों के जब-तब उत्पीड़न के इस ‘हाई अलर्ट’ से और क्या हासिल होना था.

हालांकि ख़बरों को देखें तो मीडिया को इस क़दम के ज़रिए भरोसा दिला दिया गया था.

किसी भी चरमपंथी ख़तरे को हल्के में नहीं लिया जा सकता, मगर आकलन हक़ीक़त के मुताबिक़ होना चाहिए. इसकी कुंजी है - किसी इरादे का ऐलान और कार्रवाई की क्षमता.

ज़वाहिरी के इरादे के ऐलान को गंभीरता से लेना चाहिए. ऐसे में जब भारतीय उपमहाद्वीप में जिहाद के लिए एक नए संगठन का गठन किया गया है और उसका नेता मौलाना असीम उमर को चुना गया है, तो फिर इसे और भी गंभीरता से लेना चाहिए.

1996 से कोशिश

हालांकि इन आकलनों को हल्के में लेना इसलिए ज़रूरी है कि अल क़ायदा 1996 से ही दक्षिण एशिया को निशाना बनाने में नाकाम रहा है, जब ओसामा बिन लादेन आमतौर पर भारत को और जम्मू कश्मीर और असम को दुनिया के कुछ उन हिस्सों में गिना करते थे जहां मुसलमानों के ख़िलाफ़ ‘अत्याचार’ हो रहे थे और जहां जिहाद की जायज़ वजहें मौजूद थीं.

2002 के दंगों के बाद भारत संबंधी अल क़ायदा के कई बयानों में गुजरात को इन दोनों सूबों के साथ शामिल किया जाने लगा.

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फिर 2006 में बिन लादेन ने दुनियाभर के मुसलमानों के ख़िलाफ़ ‘क्रूसेडर-ज़ियोनिस्ट-हिंदू’ का सिद्धांत तैयार किया और कहा, "यह उम्मत का फ़र्ज़ है कि इराक़, फ़लस्तीन, अफ़ग़ानिस्तान, सूडान, कश्मीर और चेचेन्या में जिहाद शुरू करने के लिए सभी आदमी-औरतें और नौजवान ख़ुद, अपने पैसे, अनुभव और सभी तरह की मदद करें."

दिलचस्प यह कि 2010 में अल क़ायदा में नंबर तीन सईद अल मसरी ने पाकिस्तान में ड्रोन हमले में अपनी मौत के वक़्त गोलमोल से दावे किए थे.

इसमें जर्मन बेकरी को निशाना बनाने वाले ‘भारतीय ऑपरेशन’ का ज़िक्र था.

उन्होंने तब कहा था, "पिछली फ़रवरी में भारत में हुआ हमला पश्चिमी भारत की राजधानी में एक स्थानीय यहूदी के ख़िलाफ़ था." इसमें भारत के भूगोल और दूसरी जानकारियों की अधूरी सी छाप थी.

उनके मुताबिक़, "जर्मन बेकरियों के इलाक़े में दुश्मन ने छिपने की कोशिश की, और क़रीब 20 यहूदी मारे गए थे." (हालांकि असल में भारत की राजधानी दिल्ली से क़रीब 14 सौ किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम में 13 फ़रवरी 2010 को यह हमला हुआ था. पुणे में जर्मन बेकरी पर इस धमाके में 17 लोग मारे गए थे. इनमें ईरान के एक मुसलमान, सूडान के तीन मुसलमान, एक इटैलियन और 12 भारतीय थे.)

चेतावनियां

2012 में पाकिस्तान के लिए अल क़ायदा के ‘उपदेश और मीडिया विभाग’ प्रमुख उस्ताद अहमद फारुक़ ने चेतावनी दी थी कि म्यांमार और असम में मुसलमानों की हत्या "से हमें दिल्ली की तरफ़ तेज़ी से कूच करने के लिए मज़बूती मिली है."

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भारतीय उपमहाद्वीप में अल क़ायदा के नेता बताए गए मौलाना असीम उमर ने जून 2013 में एक वीडियो जारी किया था, जिसका टाइटिल था - “तुम्हारे समंदर में तूफ़ान क्यों नहीं?” इसमें भारतीय मुसलमानों को वैश्विक जिहाद में शामिल होने के लिए उकसाया गया था.

उल्लेखनीय है कि भारत में अल क़ायदा की कड़ियां जोड़ने की कोशिश कोई नई बात नहीं. पाकिस्तान में मौजूद भारत को निशाना बनाने वाले कई चरमपंथी संगठन जैसे लश्करे तैयबा, जैशे मुहम्मद, हरकत उल मुजाहिदीन और इंडियन मुजाहिदीन और यहां तक कि हरकत उल जिहाद इस्लामी बांग्लादेश (जिसकी 1992 में बिन लादेन के संगठन इंटरनेशनल इस्लामिक फ़्रंट के सीधे आर्थिक सहयोग से स्थापना हुई थी) के कई साल से अल क़ायदा से वैचारिक, वित्तीय और सामरिक संबंध हैं.

भारत में इंडियन मुजाहिदीन के ऑपरेशंस कमांडर यासीन मुहम्मद अहमद ज़रार सिद्दीबापा उर्फ़ यासीन भटकल ने अगस्त 2013 में गिरफ़्तारी के बाद बताया था कि उन्होंने अल क़ायदा के साथ मिलकर भारत में ‘ज्वाइंट ऑपरेशंस’ का फ़ैसला किया था और इस बाबत उनकी अल क़ायदा के एक वरिष्ठ नेता से बात चल रही थी.

इसके अलावा इंडियन मुजाहिदीन के काडर अल क़ायदा में शामिल होकर ‘अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर लड़ रहे’ थे.

चरमपंथी संगठनों की आस्था

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कुल मिलाकर ज़वाहिरी ने मौजूदा बयान में केवल वही बातें दोहराई हैं, जिन्हें पिछले कई बयानों में तथाकथित ‘जिहाद’ के लिए भारतीय मुसलमानों को भड़काने के इरादों और कोशिशों के रूप में कहा जा चुका है. अहम यह है कि भारत में अल क़ायदा के पास ख़ुद ऑपरेशन लायक़ क्षमता नहीं है.

हालांकि इंडियन मुजाहिदीन समेत भारत में काम कर रहे कई पाकिस्तानी संगठन उसका वैचारिक नेतृत्व कुबूल करते हैं. ये स्थिति कई साल से है और इसका भारत में इस्लामी चरमपंथ की चाल पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है.

यह समझना उपयोगी है कि भारत ने पाकिस्तान, उसकी सेना और ख़ुफ़िया संगठनों की तरफ़ से पिछले 25 साल से प्रायोजित इस्लामी चरमपंथ का मुक़ाबला किया है और उसे सीमित रखा है. अल क़ायदा की तरफ़ से कोई भी ख़तरा उतना बड़ा नहीं हो सकता जितना पाकिस्तान की इन सामूहिक कोशिशों की वजह से है.

इस्लामाबाद का नाम

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एक और चीज़ जिसे बहुत से आलोचक भूल जाते हैं वह है ज़वाहिरी के बयान में इस्लामाबाद का नाम जिनसे उन्होंने वादा किया - "बर्मा, कश्मीर, इस्लामाबाद और बांग्लादेश के हमारे भाइयों हम तुम्हें भूले नहीं हैं और हम तुम्हें नाइंसाफ़ी और ज़ुल्म से मुक्त कराएंगे."

कम से कम 2008 से अल क़ायदा पाकिस्तान सेना और राज्य को विश्वासघाती मानता है और उन्हें जिहाद का जायज़ निशाना मानता है. ऐसे में दक्षिण एशिया में जिहादी ताक़तों के मज़बूत होने से दूसरे इलाक़ों से पहले पाकिस्तान को काफ़ी गंभीर और तत्काल ख़तरा पैदा हो जाएगा.

भारत में चरमपंथी हमले का ख़तरा बड़ा है, और शायद 2008 के मुंबई हमलों से कम नहीं है. ख़ुफ़िया और सुरक्षा एजेंसियों में असंगठित और अनियमित सुधार ही देखने को मिला है और देश की सुरक्षा में उनकी कुल क्षमताओं का योगदान मामूली ही रहेगा. हालांकि कमज़ोर ठिकानों पर चरमपंथी हमले का ख़तरा है पर चरमपंथ भारत के अस्तित्व या उसके ढांचे के लिए कोई बड़ा ख़तरा नहीं है.

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