स्वर्ण मंदिर में सीखे लंगर के गुर

स्वर्ण मंदिर में अमरीकी छात्राएं इमेज कॉपीरइट TERESA SINGH

भारत में गुरुद्वारों में 'लंगर' खिलाना तो सदियों पुराना है, लेकिन अमरीका के एन अरबोर स्थित मिशिगन यूनिवर्सिटी में 'लंगर एट दि डियाग' कुछ हैरान करने वाला रहा.

मिशिगन यूनिवर्सिटी के कैंपस में ऐसा अचानक नहीं हुआ.

दरअसल, अमरीका से छात्रों का एक दल गर्मियों में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पहुँचा था.

वहां उन्होंने रोज़ाना 60 हज़ार लोगों को लंगर में खाते हुए देखा.

हैरानी इसलिए भी थी इतना बड़ा आयोजन कर्मचारियों की लंबी-चौड़ी फ़ौज के बूते नहीं बल्कि सिर्फ़ स्वयंसेवकों के जरिये हो रहा था.

सिखों के गुरुद्वारों में सार्वजनिक प्रार्थना के बाद जो निशुल्क शाकाहारी भोजन दिया जाता है, उसे लंगर कहते हैं.

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सदियों पुरानी इस परंपरा के तहत सामाजिक और आर्थिक भेदभाव को मिटाते हुए सभी लोगों को एक जगह खाना परोसा जाता है.

लंगर से प्रभावित

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Image caption अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में रोजाना हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु लंगर खाते हैं.

छात्रों के दल का नेतृत्व करने वाले कंप्यूटर साइंस के प्रोफ़ेसर जसप्रीत सिंह कहते हैं, "अमरीका समाज में ऐसे स्थानों की आवश्यकता है, जहां ग़रीब, अमीर और सभी नस्लों के लोग एक जगह पर आएं. यूनिवर्सिटी का लंगर यह माध्यम बन सकता है."

यूनिवर्सिटी के लंगर में छात्रों ने प्लाइमोथ गुरुद्वारा साहिब की मदद से छोले, चटनी और सलाद तैयार किया गया.

खाने को हाथों से पैक किया गया और फिर यूनिवर्सिटी परिसर में इसे लोगों को बांट दिया गया.

प्रेरणादायक

छात्रों के दल में शामिल रही जेसिका इलर कहती हैं, "यह दौरा काफ़ी प्रेरणादायक रहा. मेरे ठीक बग़ल में बैठा हुआ व्यक्ति हो सकता है कि लंदन का करोड़पति हो और अगले दिन कोई भिखारी लड़की मेरे पास बैठी हो."

स्वर्ण मंदिर में सेवा करने वाली सराह मार्शल कहती हैं, "मैंने वहां रोटियां पकाने का काम चुना. मुझे उनकी भाषा नहीं आती थी. लेकिन हर सुबह मेरे वहां आने पर मैं उनकी आंखों में चमक देख सकती थी."

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राधा पटेल ने कहा कि स्वर्ण मंदिर का अनुभव आंखे खोलने वाला रहा कि समर्पित भाव से क्या नहीं हासिल हो सकता.

राधा कहती हैं, "भारतीय संस्कृति में समुदाय बहुत अहम है."

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