इबोलाः एक-एक कर पूरा परिवार हो गया शिकार

इबोला वॉलंटियर्स इमेज कॉपीरइट BBC World Service

'डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' संगठन की डॉ. कल्याणी गोमाथिनायगम छह हफ़्ते तक लाइबेरिया में रहीं और इबोला मरीज़ों का इलाज़ किया.

कल्याणी जहां थीं, वहां पूरे-पूरे परिवार इबोला के शिकार हो गए.

कल्याणी ने बीबीसी हिंदी को बताया कि इबोला प्रभावित इलाक़ों में स्थिति कितनी गंभीर है.

इबोला पर डॉ. कल्याणी के अनुभव

इबोला मरीज़ों की हालत तेज़ी से ख़राब होती है. वह मरीज़ इलाज के लिए आते थे तो ख़ुद चलकर आते थे और बैठते थे.

इमेज कॉपीरइट

लेकिन 24 घंटे के अंदर ही वह इतने कमज़ोर हो जाते थे कि अपने हाथ से गिलास उठाकर पानी भी नहीं पी सकते थे.

मैं लाइबेरिया के फ़ोया क़स्बे के एक ट्रीटमेंट सेंटर में काम कर रही थी. वहां दूर-दूर से मरीज़ आते थे, कभी-कभी तो पांच-छह घंटे यात्रा करके पहुंचते थे.

कभी सरकारी एंबुलेंस उन्हें लातीं तो कभी फ़ोन आता और हम उन्हें अपनी एंबुलेंस में लेकर आते.

'एक-एक करके..'

कभी-कभी तो पूरा परिवार इस बीमारी का शिकार बन जाता है और एक-एक करके सभी बीमार पड़ते जाते.

कभी ऐसा होता कि कोई ठीक होकर घर लौटता, तो परिवार का दूसरा बीमार होकर अस्पताल पहुंचा जाता. कभी ऐसा भी होता कि बीमार ठीक नहीं हो पाता और एक ही परिवार के चार-पांच लोगों की मौत हो जाती.

इमेज कॉपीरइट EPA

कभी परिवार के बड़े- मां, पिता, दादा, दादी की मौत हो जाती और सिर्फ़ बच्चे ही रह जाते.

हमारे साथ काम करने वाली एक नेशनल स्टाफ़ नर्स का पूरा परिवार इबोला की चपेट में आ गया था.

बीमारी से उसकी मौत हो गई थी. फिर उनकी दो बच्चियां इसकी चपेट में आ गए थे. बच्चों की नानी उनकी देखभाल कर रही थीं. वह भी बीमार हो गईं. उनकी उम्र 70 साल थी, वह ठीक नहीं हो पाईं.

दोनों बच्चियों ने पहले अपनी मां को फिर अपनी नानी को मरते देखा, तो वह डरते रहते थे कि वह नहीं बचेंगे.

उनमें से एक तो ठीक होकर चली गई लेकिन दूसरी बीमार हो गई और फिर उसकी मौत हो गई.

'सबसे बड़ी मुश्किल'

इमेज कॉपीरइट AFP

लोग मरीज़ों को अस्पताल लेकर आते थे तो यह पता नहीं होता था कि मरीज़ वापस आएगा या नहीं.

सामान्यतः जब किसी मरीज़ की मौत नज़दीक होती है तो उसके परिजन उसके साथ रहते हैं, लेकिन इबोला में यह भी नहीं हो सकता.

क्योंकि इबोला काफ़ी ख़तरनाक है, इसलिए हम परिजनों को मरीज़ के साथ नहीं रहने देते. हम डॉक्टरों को बाहर जाकर इंतज़ार कर रहे परिजनों को यह बताना पड़ता था कि आपके मरीज़ की मौत हो गई है.

'डर नहीं लगा'

इबोला बेहद संक्रामक और ख़तरनाक बीमारी है लेकिन ऐसा भी नहीं कि इससे बचा नहीं जा सकता.

इमेज कॉपीरइट EPA

हमारे संस्थान में हमें कुछ प्रोटोकॉल बताए गए थे. हम हर हालत में उनका पालन करते थे. हम अकेले काम नहीं करते थे. कुछ भी करने के लिए हमेशा दो लोग साथ जाते थे जो एक-दूसरे की देखभाल करते थे.

इलाज करते वक़्त हम हमेशा निजी सुरक्षा सामग्री पूरी तरह पहनते थे, जिसके बाद मुझे कभी नहीं लगा कि मुझे कोई ख़तरा है.

लक्षण और उपचार

शुरुआत में इबोला बाक़ी बीमारियों जैसा ही लगता है. सामान्य बुखार की तरह इसमें भी तापमान बढ़ता है, सिरदर्द होता है, शरीर दुखता है, कभी-कभी उल्टी होती है, खाना खाने का मन नहीं करता और डायरिया होता है.

इमेज कॉपीरइट EPA

इस समय चूंकि पश्चिमी अफ़्रीका में टाइफ़ायड और मलेरिया फैला हुआ है, इसलिए इसे पहचान पाना आसान नहीं.

अगर कोई मरीज़ या तीमारदार मर जाता है तो उस पूरे इलाक़े में पहले यह पता लगाया जाता है कि इबोला है या नहीं और फिर इलाज होता है.

अभी तक इसका इलाज तो है नहीं, वैक्सीन की खोज चल रही है तो इसके मरीज़ की हालत बिगड़ने से बचाने की कोशिश की जाती है.

दर्द है तो दर्द की दवा दी जाती है, बुख़ार है तो बुख़ार की और डायरिया है तो पानी की कमी दूर करने की कोशिश की जाती है, ताकि हालत न बिगड़े.

(बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार