कौन था श्रीलंका का 'चे ग्वेरा'?

रोहाना विजेवीरा

लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के उभार के दौरान ही श्रीलंका सरकार के ख़िलाफ़ एक और हथियारबंद संघर्ष हुआ था जिसके बारे में बाहरी दुनिया को बहुत कम मालूम है.

श्रीलंका के दक्षिणी हिस्से में कट्टर वामपंथी नेता रोहाना विजेवीरा ने सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ जनता को गोलबंद कर हथियारबंद संघर्ष छेड़ा था.

विजेवीरा क्यूबाई क्रांति के नायक चे ग्वेरा की तरह ही दिखते थे. एक ग़रीब परिवार में पैदा हुए विजेवीरा सोवियत संघ की यात्रा के दौरान स्टालिन से प्रभावित थे.

ग्रामीण और ग़रीब आबादी को गोलबंद कर उन्होंने श्रीलंकाई सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ दिया था.

दो बार तख़्तापलट की कोशिशों के बाद उन्हें पकड़ लिया गया और चे ग्वेरा की तरह उनकी मौत भी हिरासत में हुई.

इस संघर्ष में क़रीब 70,000 लोगों की जानें गईं.

पढ़ें चार्ल्स हैवीलैंड की रिपोर्ट

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पच्चीस वर्ष पहले, 13 नवंबर 1989 को इस खूनी संघर्ष को चलाने वाले कट्टर वामपंथी नेता रोहाना विजेवीरा की हिरासत में मौत हो गई थी.

बीबीसी विटनेस प्रोग्राम में बात करते हुए विजेवीरा के वकील और दोस्त प्रिंस गुनासेकरा ने बताया, "मैंने उनकी मृत्यु के बारे में सुना. असल में, हमें इसकी आशंका पहले से थी."

जब उत्तर की तरफ तमिल संघर्ष अपने उफान की ओर था तो देश के दक्षिणी हिस्से में भी हिंसा चरम पर थी. विजेवीरा की जनथा विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) या पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ने उन लोगों को मार डाला जो उनकी विचारधारा को नहीं मानते थे.

विजेवीरा श्रीलंका के सुदूर दक्षिण में एक कम्युनिस्ट ग्रामीण परिवार में 1943 में पैदा हुआ थे.

उनकी मृत्यु के बाद एक समय उनके सहकर्मी रहे विक्टर इवान ने लिखा है, "उनके माता-पिता ग़रीब और सामान्य थे."

चे ग्वेरा से प्रभावित

विजेवीरा ने सोवियत संघ की यात्रा की और स्टालिन से प्रभावित हुए. लेकिन, वो अपने लहराते बालों और लाल सितारे वाली गोल टोपी के साथ क्यूबाई क्रांति के हीरो रहे चे ग्वेरा की तरह दिखना पसंद करते थे.

विजेवीरा की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और छह बच्चों को एक पोत में बंद कर दिया गया था, जिनका आज तक पता नहीं चला.

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Image caption अस्सी के दशक के अंत में श्रीलंका में ऐसे पोस्टर आम थे.

एक समय उनके वकील रहे पी राजानायागम कहते हैं, "वह बहुत करिश्माई और प्रभावशाली वक्ता थे और बिना किसी लिखित भाषण के ही तीन चार घंटे बोल सकते थे."

ग्रामीण और ग़रीब लोगों में उनका ख़ासा प्रभाव था.

हालांकि विजेवीरा की जनजातीय पहचान भी इसका एक कारण था. श्रीलंका (तब सीलोन) की आबादी एक मिश्रित जनजातीय आबादी थी और विजेवीरा का आधार बहुसंख्यक सिंघलियों के बीच अधिक था.

सत्ता को दोष

पढ़े-लिखे सिंघली अपनी बेरोज़गारी के लिए सत्ता को दोष देते थे.

वर्ष 1971 में विजेवीरा जेल में बंद थे और वहीं से उन्होंने विद्रोह को संचालित किया, लेकिन यह असफल रहा और जेवीपी के हज़ारों सदस्य मारे गए.

उस समय श्रीलंका में जेवीपी नेता के ख़िलाफ़ एक पोस्टर आम था- "बर्बरों को मारो."

Image caption विजेवीरा के दोस्त और उनके वकील गुनासेकरा अब लंदन में रहते हैं.

वर्ष 1982 विजेवीरा ने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा. हालांकि वह तीसरे नंबर पर रहे. 1980 के दशक के अंत में जेवीपी पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके बाद विजेवीरा एक बार फिर हिंसक विद्रोह की साजिश रचने लगे.

टॉर्चर

उनकी पार्टी का तर्क था कि लिट्टे के साथ शांति वार्ता चलाना सिंघलियों को बेचने जैसा है.

प्रिंस गुनासेकरा कहते हैं कि यह राष्ट्रपति ही थे जिन्होंने जेवीपी के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों को उकसाया.

जेवीपी में जो थे और जिनका उससे संबंध था उन्हें उठा लिया गया, टॉर्चर किया गया और मार दिया गया.

जेवीपी ने भिक्षुओं, शिक्षाविदों, यूनियन नेताओं, यहां तक कि अभिनेता से नेता बने लोकप्रिय विजया कुमारतुंगा की हत्या की. विजया की पत्नी चंद्रिका कुमारतुंगा बाद में राष्ट्रपति बनीं.

बीबीसी सिंघला के संपादक प्रियाथ लियानागे के अनुसार, "जेवीपी कंगारू कोर्ट लगाते थे तो सरकार के पास हत्या करने वाले गिरोह और उत्पीड़न केंद्र थे. वर्ष 1989 में यहां चारों ओर हिंसा थी."

लापता लोग

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गुनासेकरा बताते हैं कि सरकार ने हरे-भरे जंगलों से लेकर बौद्ध विहारों तक पर बदले का कहर ढाया.

उन्होंने कहा कि जेवीपी समर्थकों को गिरफ़्तार किया गया, उनका सिर क़लम किया गया और उनके सिरों को खंभों पर लटकाया गया.

उनके अनुसार, वर्ष 1989 में रोहाना विजेवीरा को एक चाय बगान में परिवार समेत गिरफ़्तार कर लिया गया और हिरासत में उनकी मौत हो गई.

जेवीपी का विद्रोह इस तरह ख़त्म हो गया, लेकिन सुरक्षा बल महीनों तक समर्थकों को तलाशते रहे. इनमें हज़ारों आज तक लापता हैं.

तस्वीर

हालांकि अब जेवीपी बहुत छोटी पार्टी हो गई है, लेकिन उसकी रैलियों में अभी भी रोहाना विजेवीरा की तस्वीर लगाई जाती है.

आज भी उसके कट्टर समर्थक मौजूद हैं.

एक अनुमान के अनुसार, इस हिंसा में लगभग 70,000 जानें गईं, लेकिन फिर भी लिट्टे की तरह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर कम ही गया.

विजेवीरा की मौत के समय राष्ट्रपति रहे प्रेमदासा और रक्षा मंत्री रंजन विजेरत्ने का बाद में लिट्टे ने हत्या कर दी.

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