ब्लॉग: बड़ी अच्छी जगह है अमरीका!

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बड़ी अच्छी जगह है अमरीका. ख़ासतौर से उनके लिए जो बाहर से आते हैं. आबोहवा का इतना अच्छा असर होता हुआ मैंने और शायद ही कहीं देखा है.

यहां आते ही लोग इतनी अच्छी बातें करने लगते हैं जैसे लगता है कि आत्मा से निकली हुई आवाज़ हो.

पिछले साल अक्तूबर के महीने में नवाज़ शरीफ़ आए थे. इधर-उधर की बातें कीं, ओबामा और अमरीकियों से मुलाक़ातें कीं, और फिर बड़ी ही गंभीर मुद्रा में कहने लगे, "हमने अपने हाथों से अपना मुल्क ख़राब किया है. हमें ही उसे संवारना होगा."

आप कहेंगे कि बंद दरवाज़ों के पीछे कुछ बातें हुई होंगी, कुछ तेवर दिखाए गए होंगे जिसके बाद मियाँ साहब को ये एहसास हुआ होगा.

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मैं जानता था आप लोग किसी के बारे में अच्छा सुन ही नहीं सकते.

इस साल मोदी जी आए, वो भी कितनी अच्छी-अच्छी बातें कह गए, योग के ज़रिए जलवायु परिवर्तन की समस्या सुलझा गए, ख़ुद दस साल यहां का वीज़ा नहीं मिला लेकिन सभी अमरीकियों के लिए वीज़ा फ़्री कर दिया. यानी बस भारत पहुंचकर एयरपोर्ट पर ठप्पा लगवाना होगा. सब कितने ख़ुश थे.

राहील शरीफ़ की यात्रा

और इस हफ़्ते पाकिस्तानी फ़ौज के प्रमुख राहील शरीफ़ यहां आए. फ़ौजी वर्दी बहुत कम दिखी, बड़ा ही सजीला सूट पहने मुस्कराते रहे, अपने यहां शादियों में जो हैंडसम से चाचाजी होते हैं न जो बड़े मीठे से बात करते हैं, सबको खुश रखते हैं- कुछ वैसे ही अपनेपन से अमरीकियों से मिले.

कांग्रेस में जो सीनेटर मौका मिलते ही पाकिस्तानी फ़ौज पर गोला-बारूद बरसाने लगते हैं, उनसे इस गर्मजोशी से मिले कि लगा कि साथ स्कूल जाते थे. बचपन के बाद आज ही मुलाक़ात हो रही है. मुझ पर यकीन नहीं तो तस्वीरें देख लीजिए.

सीनेटर मेंनेडीज़ और सीनेटर कार्कर को न जाने कितनी बार सुना है मैंने. और इस खुशनुमा माहौल में मैं उनकी कही बातों को उठाकर माहौल नहीं ख़राब करना चाहता. उनके साथ शरीफ़ साहब की तस्वीर देखेंगे तो लगेगा कि दोनों सीनेटरों को अभी-अभी 'निशान-ए-पाकिस्तान' देने का एलान किया गया हो.

'हवा का कमाल'

ये सब यहां की हवा का कमाल है. मैं जानता हूं आप सर हिला रहे होंगे.

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एक मोहतरमा जो यहां के एक जाने-माने थिंक टैंक में हैं, उन्होंने मुझसे कहा कि शराफ़त जैसे चेहरे से टपक रही थी उनके. उन्होंने वो हर बात की जो वॉशिंगटन सुनना चाहता है, कई बार तो फ़ौजी से ज़्यादा एक डिप्लोमैट नज़र आ रहे थे. इतने पॉलिश्ड, इतनी नफ़ीसी कि क्या बताऊं!

एक और साहब हैं जो दूसरे थिंक टैंक में काम करते हैं. उन्होंने कहा कि शरीफ़ साहब को देखकर मुझे मुशर्रफ़ की याद आ गई. वह भी अमरीकियों की सोहबत में इतने ही खुश और कंफ़र्टेबल नज़र आते थे. उनका कहना था कि अमरीकियों को ऐसे लोग बड़े पसंद आते हैं.

अब मैंने उनसे नहीं कहा कि भाई ये मुस्कराता चेहरा, ये दोस्ताना बातें सब यहां कि हवा का असर है.

डर लगा कि कहीं वह मुझे भी मोदी और राजनाथ सिंह की ब्रिगेड का न समझने लगें जिन्हें इन दिनों प्लास्टिक सर्जरी से लेकर ड्रोन टेक्नॉलाजी सब कुछ हिंदू ग्रंथों की देन लगती है.

आतंकवाद मुक्त इलाक़ा

लेकिन आपसे तो कह सकता हूं न कि ये हवा का ही असर है. आख़िर आप तो बरसों से जानते हैं मुझे!

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Image caption अमरीकी रक्षा मंत्री चक हेगल के साथ राहील शरीफ़

तो राहील शरीफ़ साहब ने पूरे इलाके को आतंकवाद-मुक्त करने की बात कर दी है, हर आतंकवादी के साथ एक जैसा सुलूक करने की बात की है. अफ़गानिस्तान, ईरान और भारत तक से रिश्तों में बेहतरी की उम्मीद जता दी है.

आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में बहुत बड़ा बदलाव आने जा रहा है. पाकिस्तान अब जन्नत बन जाएगा. अच्छा, ठीक ये जन्नत वाली बात उन्होंने नहीं कही, मैंने अपनी तरफ़ से जोड़ दी है. मुझ पर भी थोड़ा बहुत तो असर हो जाता है न हवा का.

तो उम्मीदों से भरी ये बातें सुनने के बाद जब मैं कंप्यूटर पर बैठा कुछ काम करने तो अचानक से नज़र पड़ी छोटी सी ख़बर पर कि फ़ैज अहमद फ़ैज साहब की तीसवीं बरसी है. मेरे ज़ेहन में उनकी नज़्म गूंज गई--हम देखेंगे. वो दिन के जिसका वादा है...हम देखेंगे.

तो हम तो बस देखेंगे साहब!

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