नज़रबंद तो हुए लखवी, पर कैसे मिली ज़मानत?

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पाकिस्तान की एक आतंकवाद निरोधी अदालत ने ज़कीउर रहमान लखवी को ज़मानत दी है हालांकि पाकिस्तान की सरकार ने लखवी को तीन महीने के लिए नज़रबंद कर दिया है. भारत उन्हें मुंबई पर 26 नवंबर 2008 को हुए हमले का षड्यंत्रकारी बताता है.

लखवी को मिली ज़मानत पर भारत सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है.

पढ़िए पूरा विश्लेषण

मुंबई पर 2008 में हुए हमले के कथित मास्टरमाइंड ज़कीउर रहमान लखवी को पाकिस्तान की एक आतंकवाद विरोधी अदालत ने ज़मानत दी है. इस ख़बर से पाकिस्तान पर नज़र रखने वाले बहुत से लोगों को आश्चर्य हुआ.

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लखवी लश्कर-ए-तैबा के संस्थापक कमांडर और जमात-उद-दावा के नेता हैं. अदालत ने उन्हें 10 हज़ार अमरीकी डॉलर की ज़मानत देने को कहा है.

सरकारी वकील ने कहा है कि सरकार शुक्रवार को हाई कोर्ट में लखवी को दी गई ज़मानत के खिलाफ़ याचिका दायर करेगी.

अदालत ने बचाव पक्ष के वकील की उस दलील को स्वीकार कर लिया कि पाकिस्तान सरकार छह साल बाद भी उनके मुवक्किल के हमले में शामिल होने का सबूत पेश नहीं कर पाई. पाकिस्तान के बारे में थोड़ी सी भी जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति अनुमान लगा सकता है कि ऐसा पाकिस्तानी सेना के दखल के बिना नहीं संभव हुआ होगा.

'मुंबई के षड्यंत्रकारी'

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किसी को भी इस बात की उम्मीद नहीं है कि पाकिस्तान मुंबई हमले के किसी षड्यंत्रकारी को सज़ा देगा. लखवी अन्य कैदियों से अलग तरीके से जेल में रह रहे थे. वो जेल के अपने निजी कमरे से लश्कर-ए-तैबा को चला रहे थे. वहां वो अपनी पत्नी से भी मिलते थे. हालांकि पाकिस्तान को छोड़कर कोई और ऐसे समय उनकी रिहाई की अपेक्षा नहीं कर सकता, जब देश पेशावर में हुए भयावह आतंकी हमले से उबरने की कोशिश कर रहा है.

अदालत का फैसला प्रधानंत्री नवाज़ शरीफ़ की ओर से पेशावर में बुलाई गई सभी राजनीतिक दलों की एक आपात बैठक के दो दिन बाद ही आया. शरीफ़ ने कहा था कि सरकार अच्छे तालिबान (जो पाकिस्तान के बाहर से संचालित होते हैं और भारत व अफगानिस्तान जैसे दूसरे देशों के खिलाफ कार्रवाई करते हैं.) के साथ-साथ सभी तरह के इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करेगी. सरकार ने फांसी की सज़ा पर लगे प्रतिबंध को भी हटा लिया था.

स्कूल पर हमला

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सेना के स्कूल पर हुए हमले को पाकिस्तान और उसके बाहर के बहुत से लोगों ने पाकिस्तान का 9/11 बताया. उन्होंने उम्मीद जताई कि इससे जिहाद को अपनी सुरक्षा और विदेश नीति को उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने की नीति में उल्लेखनीय बदलाव आएगा.

लोगों की उम्मीदें उस समय और बढ़ गईं जब पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ ने भी आतंकवाद के सफाए की बात की. उन्होंने कहा, ''उन्होंने देश के दिल पर हमला किया है. लेकिन मैं फिर कहता हूं कि वो किसी भी तरह से इस महान देश के आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के संकल्प को डिगा नहीं सकते हैं. इसे हम नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे.''

जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैबा ने कभी इस बात को नहीं छिपाया कि वो भारत और अन्य ग़ैर इस्लामी देशों के खिलाफ जिहाद कर रहे हैं. एक बार हाफिज सईद ने मुझसे कहा था, ''मैं इस बात से क्यों डरूं या छिपकर रहूं कि मैं भारत के खिलाफ जिहाद कर रहा हूं. क्या कोई मुसलमान रमजान के दौरान भूखा रहने से डरता है? '' हालांकि जमात-उद-दावा पाकिस्तान सेना में अपने समर्थकों की संवेदनशीलता को लेकर सतर्क हो गया है. वो खुद को राहत कार्यों से जुड़ा होने का नाटक कर रहा है.

पुराने जिहादी

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लखवी उन पाकिस्तानियों में से एक हैं, जो 1980 की शुरुआत में जिहाद करने अफ़ग़ानिस्तान गए थे. उन्हें सबसे बर्बर जिहादी माना जाता है. वो जमात-उद-दावा इलाल क़ुरान वा सुन्हा (जेडीक्यूएस) के साथ 1980 के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ़ लड़े थे. जेडीक्यूएस ने ही दुश्मन का सिर कलम करने या उसका गला रेतने की इस्लामी परंपरा को पुनर्जिवित किया.

उन दिनों हाफिज़ सईद और ज़कीउर रहमान लखवी जैसे जमात-उद-दावा और लश्कर-ए-तैबा के संस्थापक सदस्य जेडीक्यूएस के कमांडरों के नेतृत्व में जिहाद कर रहे थे.

लश्कर-ए-तैबा के गठन के बाद वो भारत प्रशासित कश्मीर में इसी वीभत्स तरीके से दुश्मनों से निपटते रहे. साल 1995 की गर्मियों में अबु हैबत ने एक भारतीय सैनिक का सिर कलम किया. जमात-उद-दावा ने सैनिक के कटे हुए सिर को अपने सालाना जलसे में प्रदर्शित किया. किसी इंसान का सिर काटकर उसे प्रदर्शित करने की पाकिस्तान में यह शायद पहली घटना थी.

पाकिस्तान की नीति

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Image caption मुंबई पर 26 नवंबर 2008 को हुए हमले के लिए भारत हाफ़िज सईद को मुख्य षड्यंत्रकारी बताता है.

अमरीका पर हुए 9/11के हमले के बाद पाकिस्तानी सेना ने पाकिस्तानी मुजाहिदीन को जिहाद के लिए भारत प्रशासित कश्मीर या अफगानिस्तान जाने से रोका. लेकिन अब ऐसा लगता है कि पाकिस्तान अपने पड़ोसी देशों में जिहाद को बढ़ावा देने की पुरानी नीति पर लौट रहा है.

इस समय अमरीका और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएएसएफ़) अफ़गानिस्तान से निकलने की तैयारी कर रहे हैं. भले ही लखवी को नज़रबंद करने की घोषणा की गई हो लेकिन लखवी को ज़मानत मिलना पाकिस्तानी सेना की ओर से पाकिस्तान की सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश है कि इस बात का कोई मतलब नहीं है कि प्रधानमंत्री क्या कहते हैं, पाकिस्तान की सेना ही यह तय करेगी कि कौन अच्छा तालिबान है और कौन बुरा.

(आरिफ़ जमाल पाकिस्तान मामलों के जानकार और 'काल फ़ॉर ट्रांज़िशनल जिहाद : लश्कर-ए-तैबा 1985-2014' के लेखक भी हैं)

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