रीथ लेक्चर 1: डॉक्टर क्यों फ़ेल होते हैं?

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सर्जन-लेखक अतुल गवांडे का 11 दिन का बेटा हृदय रोग के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया. आईसीयू में उसी बीमारी के साथ एक दूसरा बच्चा भी अस्पताल में भर्ती हुआ. एक बच्चा स्वस्थ हो गया लेकिन दूसरे बच्चे की जान बचाने के लिए डॉक्टर जूझ रहे थे.

सार्वजनिक स्वास्थ्य के मशहूर विचारक अतुल गवांडे ने बोस्टन में पहले रीथ लेक्चर में बताया कि डॉक्टर कब और क्यों विफल हो जाते हैं.

इस लेक्चर में वो साफ़ कर देते हैं कि पिछली शताब्दी के अर्जित ज्ञान ने क्या कुछ संभव बना दिया है, क्या कुछ कुशलता पर निर्भर है और क्या हैं सीमाएँ?

कौन हैं अतुल गवांडे?

अतुल गवांडे हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसिन के प्रोफ़ेसर हैं. एक सर्जन होने के साथ-साथ वो एक लेखक, विचारक और राजनीतिक विश्लेषक भी हैं. सार्वजनिक स्वास्थ्य के विषय पर वह दुनिया के नामचीन विचारकों में से हैं.

बीबीसी रीथ लेक्चर्स के तहत 2014 में उन्होंने “चिकित्सा का भविष्य” (फ़्यूचर ऑफ मेडिसिन) पर चार भाषण दिए. भारतीय मूल के अतुल गवांडे के पिता महाराष्ट्र के एक गांव के रहने वाले थे और उनकी मां इलाहाबाद में पली-बढ़ी हैं.

जब अतुल गवांडे मात्र 26 साल के थे, तब उन्होंने राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की टीम में काम किया. वे बिल क्लिंटन के स्वास्थ्य और सामाजिक नीति के सलाहकार भी रहे.

अतुल गवांडे के पहले लेक्चर का विषय था - वाई डू डॉक्टर्स फ़ेल? (डॉक्टर विफल क्यों होते हैं?)

अतुल गवांडे का पहला रीथ लेक्चर पढ़ें

हर परिवार के अपने खास 'मेडिकल मोमेंट्स' होते हैं. ऐसा मौका हमारे परिवार में जुलाई 1995 में आया, जब मेरे बेटे वॉकर को पैदा हुए सिर्फ़ 11 दिन हुए थे. उसे दूध पीने में मुश्किल आ रही थी, पेट में कुछ रुक नहीं रहा था. हम उसे बच्चों के डॉक्टर के पास ले गए.

डॉक्टर ने अपना स्टेथोस्कोप उसकी छाती पर लगाया, कुछ देर ध्यान से सुना और फिर हमारी ओर देखकर कहा, ''इसके दिल में कोई समस्या है'' और इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा.

मुझे लगता है कि ऐसे लाखों मामले आए दिन होते हैं - एक व्यक्ति दूसरे के पास शारीरिक या दिमाग़ी परेशानियों को लेकर पहुंचता है. इस उम्मीद में, कि उसे मदद मिलेगी और चिकित्सा विज्ञान का यही मूल ध्येय है– जब एक इंसान दूसरे की मदद मांगता है.

मुझे हमेशा यह बात कचोटती थी कि यह क्षण कितना छोटा, सीमित और विचित्र है. हमारे शरीर में 13 अंग प्रणालियां हैं और ताज़ा गणनाओं की मानें तो इनमें 60 हज़ार से अधिक तरह से गड़बड़ी पैदा हो सकती हैं. हमारा शरीर डरावने ढंग से जटिल, अथाह और आसानी से समझ न आने वाली चीज़ है. हम चमड़े की मांसल बोरियों के नीचे छिपे हुए हैं और हज़ारों साल से यह जानने की कोशिश में हैं कि भीतर क्या चल रहा है.

इसलिए मेरे लिए चिकित्सा विज्ञान की कहानी अपने अधूरे ज्ञान और हुनर से निपटने की कहानी है.

अयोग्यता और अज्ञानता

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दो दशक पहले मैंने एक लेख पढ़ा था और मुझे लगता है कि उसके बाद से मैंने जो भी लिखा है और जितना भी शोध किया है वो उससे प्रभावित रहा है. यह लेख दो दार्शनिकों सेम्युएल गोरोविज़ और अलेस्डायर मेकिंटायर ने लिखा था. दोनों ने वर्ष 1976 में ग़लती करने के मानवीय स्वभाव पर लिखा था और हैरानी जताई थी कि कैसे कोई शख़्स जो करना चाहता है, उसमें नाकाम होता है.

मिसाल के लिए, एक मौसम विज्ञानी क्यों यह भविष्यवाणी करने में विफल रहता है कि चक्रवात किस जगह सबसे पहले टकराएगा या डॉक्टर यह क्यों नहीं जान पाए कि मेरे बेटे के शरीर में क्या चल रहा है या फिर उसे सही कर पाए? उनके मुताबिक़ हमारे विफल होने के दो बुनियादी कारण हो सकते हैं. पहला है अनभिज्ञता, यानी हम किसी समस्या या परिस्थिति से जुड़े भौतिक नियमों और स्थितियों के बारे में सीमित जानकारी रखते हैं.

'अयोग्यता' को उन्होंने दूसरा कारण बताया जिसके मुताबिक़ जानकारी तो है पर व्यक्ति या समूह उसका सही ढंग से उपयोग नहीं कर पाते.

अब अज्ञानता से निपटने के लिए हम विज्ञान पर निर्भर हैं और यह कार्य अविश्वसनीय तौर पर दिलचस्प रहा है. जिस बालरोग विशेषज्ञ के पास हम गए और उन्होंने मेरे बेटे की स्थिति का पता लगाने के लिए जो किया, उसकी जड़ वर्ष 1628 में विलियम हार्वी से जुड़ी है, जब हज़ार साल के कयासों के बाद उन्होंने निर्णायक तौर पर बता दिया कि दिल एक पंप है जो शरीर में खून को ऊपर से नीचे प्रवाहित करता है. जब उन्हें यह पता चला तो हम इसे समझ पाए.

दिल तक ट्यूब पहुँचाना

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अगला अहम पड़ाव तीन सदियों बाद वर्ष 1929 में आया जब जर्मनी के एबार्स्वाल्ड में एक शल्य चिकित्सक (सर्जिकल इंटर्न) ने एक अहम ऑबज़रवेशन की. उनका नाम था वर्नर फॉर्समान.

वह एक मामूली सी मेडिकल पत्रिका पढ़ रहे थे जिसमें पशुओं पर हुए एक अध्ययन का ज़िक्र था– एक चित्र में घोड़े की टांग से उसके दिल तक एक ट्यूब टांकी गई थी और बताया गया था कि वहां से रक्त लेने पर क्या होता है.

इस पर उनका कहना था, ''अगर हम घोड़े के साथ ऐसा कर सकते हैं, तो मानव के साथ क्यों नहीं?'' वह अपने बॉस के पास गए और पूछा, ''अगर हम किसी इंसान के दिल तक ट्यूब ले जाएं तो कैसा रहेगा?'' इस पर बॉस बोले, ''तुम्हारा सिर फिर गया है. तुम ऐसा नहीं कर सकते. सर्जरी के दौरान जब कभी दिल को छूने का प्रयास हुआ, तो उसमें ऐंठन शुरू हो जाती है और रोगी मर जाता है. तुम ऐसा नहीं कर सकते.''

उन्होंने फिर पूछा, ''अगर किसी जानवर में ऐसा करें तो?'' उत्तर मिला- ''यह बेमानी है, तुम तो अभी महज़ एक इंटर्न हो. ऐसा सवाल पूछने की हिम्मत कैसे कर सकते हो? जाओ अपना काम करो.''

वर्नर फॉर्समान बस जानना चाहते थे. इसके बाद वह चुपके से एक्स-रे रूम में गए, मूत्र निकालने वाली नली उठाई, अपनी बांह में चीरा लगाया, नस के साथ टांकते हुए ऊपर ले जाकर अपने ही दिल से जोड़ दिया और एक नर्स की मदद से एक के बाद एक इसके नौ एक्स-रे लिए, जिनमें उनके अपने ही दिल में लगी ट्यूब के चित्र थे.

उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. फिर 1956 में उन्हें आंद्रे कुर्नांद के साथ नोबल पुरस्कार मिला. कुर्नांद उनकी खोज को क़रीब 20 साल बाद कोलंबिया विश्वविद्यालय ले गए और इसकी पुष्टि की कि आप न केवल किसी व्यक्ति के दिल में नली लगा सकते हैं बल्कि इसके ज़रिए दिल तक रंग भी प्रवाहित कर सकते हैं ताकि आप इसके फोटो ले सकें और उसे काम करता देख सकें.

हृदयरोग विज्ञान की शुरुआत

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वर्नर फॉर्समान ने जो किया था, उससे कार्डिओलॉजी (हृदयरोग विज्ञान) की स्थापना हुई और इसके बाद 1960, 1970 और 1980 के दशक में, एक के बाद एक ऐसी कई तकनीकों की खोज हुई जो दिल के भीतर की गड़बड़ियां ठीक कर सकें.

विज्ञान की चिंता वैश्विक, शाश्वत सत्य का पता लगाना है और ये भी कि शरीर या दुनिया को संचालित करने वाले नियम कैसे काम करते हैं या वो किस तरह व्यवहार करते हैं.

लेकिन जब इस शाश्वत सत्य या नियमों का एक विशिष्ट स्थिति में इस्तेमाल होता है तो परीक्षा इस बात की होती है कि कैसे यह शाश्वत नियम उस विशिष्ट स्थिति में लागू होते हैं.

तो मेरे बेटे की छाती से आने वाली आवाज़ से जो धारणा शिशु चिकित्सक ने बनाई थी, क्या वह धारणा वॉकर की विशिष्ट स्थिति से मेल खाती है?

यहाँ गोरोविज़ और मेकिंटायर ने तीसरी तरह की असफलता की संभावना को देखा.

उन्होंने कहा कि अनभिज्ञता और अयोग्यता के अलावा एक ''नेसेसरी फॉलिबिलिटी'' (गलती करने की प्रवृत्ति) है जिसके बारे में विज्ञान चुप हो जाता है. वे अपने उस उदाहरण की ओर लौटे कि कोई चक्रवाती तूफान तट से टकराने के बाद क्या करेगा...तट से टकराने के बाद वह कितनी तेजी से आगे बढ़ेगा.

उन्होंने कहा कि जब हम यह जानना चाहते हैं तो हम विज्ञान से उसकी संभावनाओं से ज़्यादा की उम्मीद कर रहे हैं...जो कुछ भी हो रहा है, विज्ञान हमें उसकी सटीक जानकारी दे.

नियमों की पूर्ण समझ

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हर चक्रवात प्रकृति के निश्चित नियमों का पालन करता है, पर कोई एक चक्रवात दूसरे चक्रवात के समान नहीं होता.

हर चक्रवात विशिष्ट होता है. इस वजह से हमें किसी एक चक्रवात के बारे में एकदम सटीक जानकारी (परफ़ेक्ट ज्ञान) नहीं हो सकती.

उनका ये मानना था कि ये वैसे ही है, जैसे दुनिया की पूरी स्थितियों और सभी प्राकृतिक प्रक्रियाओं की पूर्ण समझ हो.

दूसरे शब्दों में कहें, तो इसके लिए सर्वज्ञ होने की ज़रूरत है और यह हम हो नहीं सकते.

तो फिर यह दिलचस्प सवाल उठता है कि हम इससे कैसे निपटें?

अब ऐसा नहीं कि किसी भी चीज़ की भविष्यवाणी असंभव है. कुछ बातें पूरी तरह प्रत्याशित हैं और गोरोविज़ और मेकिंटायर इसके लिए 'आइस क्यूब' को आग में डालने का उदाहरण देते हैं.

एक आइस क्यूब किसी भी अन्य आइस क्यूब की ही तरह होता है और आपको पता है कि अगर आप इसे आग में डालेंगें तो यह पिघल जाएगा.

हमारे लिए प्रश्न यह है कि इंसान चक्रवात की तरह हैं या उन आइस क्यूब्स की तरह?

ग़लत जांच का नतीजा

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वॉकर की घटना पर लौटते हुए हम उसे बोस्टन के एक अस्पताल के इमरजेंसी कमरे में ले जाते हैं.

रविवार की सुबह का समय है. एक नर्स ऑक्सीज़न मॉनिटर उठाती है और उसे उसके दायें हाथ की उंगली पर लगाती है. लाल रंग का प्रकाश उसकी जांच करता है. उसका ऑक्सीज़न लेवल 98 फीसदी है, एकदम परफेक्ट.

वो लोग उसकी छाती का एक्सरे लेते हैं और छाती का एक्सरे बताता है कि उसका फेफड़ा पूरी तरह सफ़ेद है.

वो कहते हैं, 'निमोनिया है'...फिर वो 'स्पाइनल टैप' (एक मेडिकल जांच) करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह मस्तिष्क ज्वर (मेनिंजाइटिस) से होने वाला किसी तरह का संक्रमण तो नहीं है.

उन्होंने उसे एंटीबायोटिक दिया और शिशु चिकित्सक को अब तक की जांच की जानकारी दे दी.

उन्होंने बताया कि दिल में कोई गड़बड़ी नहीं है, मामला फेफड़े और निमोनिया का है. शिशु चिकित्सक ने कहा, ''नहीं, यह सच नहीं हो सकता.''

वह इमरजेंसी रूम में आयीं और बच्चे की ओर देखा- उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, उसकी हालत ठीक नहीं थी और तब उन्होंने देखा कि ऑक्सीज़न मॉनिटर गलत उंगली पर लगा हुआ था.

अब यह पता लगा कि कुछ खास स्थितियों में महा धमनी में रुकावट पैदा हो सकती है. यदि पैदाइश के समय आपकी महा धमनी पूरी तरह विकसित नहीं हुई तो रक्त का बहाव दिल से निकलकर शरीर के दाहिने हिस्से में जा सकता है, उस हाथ में जिसकी मॉनिटर से जांच की गई थी.

उन्होंने बाएँ हाथ की जांच की और पता चला कि ऑक्सीज़न का स्तर पढ़ा ही नहीं जा सकता था. वास्तव में वॉकर की हालत गुर्दा (किडनी) और लीवर फ़ेल होने की तरफ़ बढ़ रही थी. वह गंभीर मुश्किल में था और डॉक्टर ने इस तरह की स्थितियों में काम आने वाली जानकारी की विफलता को पकड़ लिया था.

जांच की जटिलता

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तब टीम ने बताया कि इस स्थिति से निपटने के लिए हमारे पास एक दवा है जो मेरे बेटे के पैदा होने से मात्र 10 साल पहले ही खोजी गई थी. प्रोस्टाग्लेंडिन ई2 एक छोटा मॉलिक्यूल है जो इसे ठीक कर सकता है. जब हम गर्भाशय में भ्रूण की अवस्था में होते हैं, तब हमारे पास एक बाइपास सिस्टम होता है जो अलग तरह से रक्त की आपूर्ति करता है और जो जन्म के एक-दो सप्ताह बाद तक खुला रहता है. यह बंद हो गया था और इसीलिए उसकी हालत बिगड़ गई थी.

पर यह मॉलिक्यूल इस रास्ते को दोबारा खोल सकता था और अनुमान यह था जो अन्य बच्चों के साथ हुआ, इस पर भी लागू होना चाहिए.

मतलब, इस बाइपास प्रणाली को फिर से खोला जा सकता है. और हुआ भी ऐसा ही. इससे उसे ठीक होने का समय मिल गया, उसके फेफड़े और लीवर को स्वस्थ होने का समय मिला, उसकी भोजन प्रणाली दोबारा काम करने लगी.

फिर कुछ दिनों के बाद उसकी अविकसित महा धमनी को बदला गया और उसके दिल में मौजूद छेदों को भी ठीक किया गया. उन्होंने उसे बचा लिया. उन्होंने उसे बचा लिया.

यहां मैं यह समझता हूँ कि इंसान उतना ही ज्ञेय है जितना कि आइस क्यूब.

हम पूरी सटीकता से जानते हैं कि प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत कैसे हो सकती है, इबोला का वाइरस कैसे फैलता है, दिल में क्या गड़बड़ियाँ हो सकती हैं और उन्हें कैसे ठीक किया जा सकता है. पर ऐसे कई क्षेत्र हैं जिनके बारे में हमारी अज्ञानता दूर नहीं हुई है. जैसे एलज़ाइमर की बीमारी और हम इससे कैसे निपटें, मेटास्टैटिक कैंसर, कैसे उस वायरस का वैक्सीन बनाएँ जिससे हम अभी दो-चार हो रहे हैं.

पर मेरी समझ से, हमारे समय की कहानी, अयोग्यता से निपटने के संघर्ष की उतनी ही बड़ी कहानी बन गई है जितना बड़ा अज्ञानता से निपटने का संघर्ष था.

सौ साल पहले हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे थे जिसमें हमारा भविष्य पूरी तरह हमारी अज्ञानता में जकड़ा था. पर इस पिछली सदी में बहुत सारे आश्चर्यजनक अविष्कार हुए और तब उलझन केवल इतनी नहीं रही कि पहले से चले आ रहे अज्ञानता के अंतर को कैसे पाटें बल्कि यह कि कैसे ज्ञान का इसमें समावेश करें ताकि 'फिंगर प्रोब' सही उंगली में हो.

शहर-देहात का फ़र्क

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आईसीयू में मेरे बच्चे (वॉकर) के साथ वाले बिस्तर पर एक बच्चा था जो 200 मील दूर माइन से आया था और वो भी ठीक वॉकर जैसी मुश्किलों से जूझ रहा था.

जब तक उसके शरीर की गड़बड़ियों का पता चला, तब तक काफी देर हो चुकी थी. बीमारी की पहचान, हृदय में रूकावट को खोलने के लिए दवा उस तक पहुँचाने तक उसकी किडनी और फेफड़े फ़ेल हो जाने की स्थिति में पहुँच गए.

और जब हम अपने बेटे के ठीक होने की प्रतीक्षा कर रहे थे, वह बच्चा अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहा था ताकि उसके भविष्य को थोड़ी उम्मीदों से नवाजा जा सके जो मेरे बेटे से एकदम भिन्न होने जा रही थीं.

अब मैं अपने परिवार की ओर लौटता हूँ. मेरे पिता जी का संबंध भारत के एक गांव से रहा जबकि मेरी मां उत्तरी भारत के एक बड़े शहर की हैं. मेरा परिवार अभी भी अपने खेत में गेहूं, गन्ना और कपास उगाता है. अगर वॉकर इस स्थिति में मेरे 37 भतीजे-भतीजियों कि तरह वहाँ होता तो उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी.

मेरी समझ में, वैश्विक स्वास्थ्य के बारे में एक गलतफ़हमी है. हम समझते हैं कि वैश्विक स्वास्थ्य का मतलब विश्व के निर्धनतम हिस्सों में देखभाल से है.

पर वैश्विक स्वास्थ्य के बारे में मेरा नजरिया हर जगह देखभाल को बेहतर बनाने का है. ये विचार है पिछली सदी में हासिल की गई क्षमता को हर एक शहर में हर एक जीवित व्यक्ति तक पहुंचाने का है. पूरी दुनिया में अद्भुत बदलाव आया है.

आर्थिक रूप से, पिछली मंदी के बावजूद, विश्व अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है और इसका परिणाम यह हुआ है कि दुनिया भर में लोगों की आयु में नाटकीय बदलाव आए हैं.

एक समय दुनिया में सांस संबंधी बीमारियों और कुपोषण के कारण सबसे ज्यादा लोग मरते थे और अब उस दुनिया से निकलकर हम एक ऐसी दुनिया में आ गए हैं जब ज्यादा लोग दिल की बीमारियों और सड़क हादसों में मरते हैं.

दिल की बीमारी और सड़क हादसे उन पाँच ऐसे शीर्ष कारणों में हैं जिनके कारण दुनिया में सर्वाधिक लोग मरते हैं. और कैंसर ऐसे 10 शीर्ष कारणों में से है. इस आर्थिक प्रगति के साथ-साथ यह ज्ञान भी हमारे पास आया है कि इन सभी समस्याओं के समाधान उपलब्ध हैं.

'चूक जाने की संभावना'

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भारत के गाँव में रह रहे मेरे परिवार को पता है कि हमारी समस्याएं हल हो सकती हैं और इसलिए अब उलझन इस बात की है कि हम अपनी इस क्षमता को कैसे हर जगह स्थापित करें. भारत में, माइन में, पूरे इंग्लैंड में, यूरोप, लातिनी अमरीका में, पूरी दुनिया में और हम अभी यह तरीका खोज रहे हैं कि कैसे इसे शुरू किया जा सकता है.

आगामी लेक्चर में, मैं तीन विचारों को सामने रखूंगा. पहला है कि दरवाजा खुलने से, चिकित्सा जगत और स्वास्थ्य के पर्दे के पीछे से देखकर हम क्या सीख रहे हैं. हम यह जान रहे हैं कि जीवन बचाने और लोगों की पीड़ा को कम करने के लिए कितना कुछ किया जा सकता है.

दूसरा है- इस तथ्य को जानते हुए कि हमारा ज्ञान हमेशा ही सीमित है, हमें अपनी ज़रूरी चूक (नेसेसरी फ़ॉलिबिलिटी) की वास्तविकता की ओर देखने और इससे निपटने का मौका मिलना चाहिए.

तीसरा है - इन दोनों के निहितार्थों को परखने का मौका, अपनी अयोग्यता और अपनी ज़रूरी चूक के बारे में हम जो सीख रहे हैं और चिकित्सा क्षेत्र के लिए इनका क्या अर्थ है.

अपनी चूक के अंदर झाँकना असुविधाजनक होता है. हम देखने से डरते हैं. हम 19वीं सदी की तरह उस स्थिति में है जब शरीर के अंदर क्या चल रहा है, जानने के लिए, डॉक्टर लाश को कब्र से निकालकर उसकी चीड़-फाड़ करते थे. जब हम शरीर के अंदर झाँकते हैं, तो हम अपनी ही प्रणाली के अंदर झाँक रहे होते हैं और यह जान पाते हैं कि आखिर यह काम कैसे करती है, हम इसे जैसा जानते हैं यह उससे ज्यादा जटिल है और कभी-कभी तो हमारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा झंझट भरा.

मैं समझता हूँ कि आप इस बात से वाकिफ हैं कि अपनी ही दुनिया पर कैमरे का मुंह करना कई बार बहुत ही दुखदायी होता है. गोरोवित्ज़ और मेकिंटाइर ने हमारी विफलताओं को 'अयोग्यता' क्यों करार दिया, उसका भी एक कारण है. ऐसा माना जाता है कि हर बार सही साबित नहीं हो पाने की शर्म के साथ-साथ आत्मग्लानि भी जुड़ी हुई है. इस पर से पर्दा हटने से लोगों में और गुस्सा पैदा हो सकता है.

ऑपरेशन रूम में ऑडियोटैप्स की इजाजत अमूमन नहीं दी जाती और वीडियो रिकॉर्डर बंद कर दिया जाता है. हमारे ऑपरेशन रूम या क्लीनिक में क्या चल रहा है, यह जानने के लिए उसमें कोई ब्लैक बॉक्स नहीं होता. जब हमारे पास कोई डेटा होता है तो उसे भी अमूमन ताले में बंद करके रख दिया जाता है. सूचना होने के बावजूद आप नहीं जान सकते कि किसी विशेष तरह के ऑपरेशनों के लिए किस अस्पताल का 'कंप्लीकेशन रेट' औरों से बेहतर है.

इसका पर्दाफाश करने में इसके दुरुपयोग होने और किसी के साथ अन्याय होने का डर रहता है. पर यकीनन दांव पर ज़िंदगी लगी होती है और मैं समझता हूं कि दरवाजे के नहीं खुलने से कई बार हम ऐसे मौकों को देखने और समझने से चूक जाएंगे जो चमत्कारिक हो सकते थे.

दोबारा सर्ज़री के ख़तरे

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मेरे बेटे वॉकर के घर लौटने के समय डॉक्टरों ने बताया कि वॉकर को दूसरी बार ऑपरेशन की जरूरत पड़ेगी. उसके शरीर में ट्यूब को लगाया गया था, महा धमनी को बदला गया था लेकिन ये सब 11 दिन के बच्चे के शरीर में हुआ था.

स्ट्रॉ की तरह दिखने वाली ट्यूब को उन्होंने उसके शरीर में इस तरह फिट किया था कि शरीर बढ़ने के साथ वह थोड़ी बहुत फैल सकती थी.

पर वह एक वयस्क के शरीर के अनुरूप नहीं था और इसीलिए उन्होंने मुझे कहा कि किशोरावस्था में उसे अपनी महा धमनी बदलवानी होगी और यह जोखिम भरा होगा. एक सर्जन होने के कारण मुझे यह मालूम था कि इसका क्या मतलब है.

इसमें मौत का खतरा 5 फीसद था और पैरालिसिस का 25 फीसद. हम हमेशा ही इस डर से ग्रस्त रहते थे. जब वह दिन आया, तब वॉकर 14 साल का था लेकिन तब तक दुनिया बादल चुकी थी.

तब तक साधारण केथिटर से महा धमनी का विस्तार करने की तकनीक आ चुकी थी.

हम ऐसे विशेषज्ञ को खोजने में सफल रहे जिन्होंने बोस्टन में ही इनमें से कुछ तरीकों को सीखा और विकसित किया था. इस कार्डिओलोजिस्ट ने मुझे (सर्जन होने के नाते) बताया कि इसे कैसे किया जाता है. कई बार आपको ऐसी चीजें भी जाननी पड़ती हैं जिनके बारे में आप वाकई जानना नहीं चाहते.

उन्होंने मुझे बताया कि वॉकर की महा धमनी तक टाँककर ले जाए गए बलून के अंदर दबाव बढ़ाया जाएगा और आप जानते हैं कि ऐसा करने पर वह अपनी रक्त वाहिनी के फैलाव को महसूस कर सकता है और ट्रिक यह है कि उस ट्यूब को इतना तक फाड़ा जाए कि केथिटर में फैलाव तो हो पर वह फटे नहीं.

वह जो करने जा रहे थे उसमें चूक होने की संभावना थी पर उनको पता था कि उसे कैसे किया जाता है. वॉकर अच्छी तरह से इस प्रक्रिया से गुजर गया.

असाधारण बात यह थी कि वह अगले दिन ही अपने घर वापस आ गया और उसके अगले दिन वह इतना ठीक हो गया कि बाहर खेलने गया और टखने की चोट लेकर लौटा. इस साल जून में वह हाईस्कूल से निकल गया और इस साल की सर्दी में उसने कॉलेज में दाखिला लिया है.

वह एक सामान्य और लंब जीवन व्यतीत करेगा, जो कमाल की बात है. जो मुख्य प्रश्न हमें खुद से पूछना है वो यह है कि हम कैसे यह संभव कर पाएँ कि दूसरे लोग भी इससे लाभान्वित हों और दूसरों के लिए इसे संभव बनाने के अपने कर्तव्य को हम कैसे पूरा करें?

इसे करने का एक ही तरीका जो मुझे नजर आ रहा है, वो है कि पर्दा उठाया जाए - उस प्रोसीजर रूम, उस क्लीनिक, उस ऑफिस या उस अस्पताल में जो हो रहा है, उस पर से पर्दा उठाया जाए.

अदृश्य को दृश्य बनाकर ही इसे प्राप्त किया जा सकता है. मैं इसीलिए लिखता हूं, इसीलिए हम विज्ञान का दामन थामे हुए हैं क्योंकि हम इसी तरह से समझ पाएँगे और मेरी समझ में यही चिकित्सा क्षेत्र के भविष्य की कुंजी है.

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