ठीक हो पाएंगे पेशावर के 'बच गए बच्चे'?

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पेशावर में भयानक नरसंहार देखने वाले बच्चे क्या कभी पूरी तरह ठीक हो पाएंगे?

कई पाकिस्तानी यह सवाल पूछ रहे हैं क्योंकि पेशावर के क़बायली समाज में, जहां मनोचिकित्सा और सलाह को अक्सर टाल दिया जाता है. ऐसे में बच्चों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं.

कुछ घायल बच्चों का पेशावर के लेडी रीडिंग अस्पताल में इलाज किया जा रहा है.

यहां के कर्मचारी शहर में हुए कई चरमपंथी हमलों के बाद की स्थितियों से निपट चुके हैं क्योंकि यह शहर चरमपंथ के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की जंग का पहला मोर्चा बन गया है.

'कैसे बताएं?'

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अस्पताल में एक अच्छा ख़ासा ट्रॉमा विंग (सदमे का इलाज करने वाला विभाग) होने के बावजूद बच्चों को स्थायी मनोचिकित्सकीय मदद देने के मामले में यह संसाधनविहीन नज़र आता है.

इमरजेंसी वॉर्ड में एक डॉक्टर ने कहा, "हमले के बाद जब बच्चों को लाया गया तो वे बेहद शांत थे. ऐसी स्थिति में यहां हमेशा रोना-चिल्लाना होता रहता है लेकिन उन्होंने ज़रा भी आवाज़ नहीं निकाली. वो बड़ों से ज़्यादा बहादुर थे या फिर सदमे में थे?"

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पंद्रह साल का अहमद नवाज़ अस्पताल के बिस्तर से टिककर बैठा था, उसके हाथ और पैर पर पट्टियां बंधी थीं. उसके मां-बाप ने उसकी क़मीज़ पर पाकिस्तानी झंडे वाला एक बैज लगा दिया था और वह लगातार आने वाले कैमरा टीमों और आगंतुकों को देखकर मुस्कुराता रहता था.

लेकिन किसी ने भी उसे नहीं बताया था कि स्कूल पर हुए हमले में उसका छोटा भाई मारा गया था.

उसकी चाची ने मेरी बाज़ू खींची और कहा, "क्या आप अहमद को बता देंगी कि उसका भाई शहीद हो गया है. हमें यह समझ नहीं आ रहा कि उसे यह कैसे बताएं?"

'सदमे के असर'

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उधर 13 साल का अनस मुमताज़ घर लौट गया है. वह अपने चचेरे भाइयों के साथ फिर से खेलने की आदत डाल रहा है लेकिन रात डरावने सपने लेकर आती है.

पेशावर स्कूल हमले में वह तो बच गया था लेकिन उसने अपनी मां को मरते देखा था. उसकी मां स्कूल में टीचर भी थीं.

उसके पिता नईम मुमताज़, एक सर्जन हैं. जब उन्हें बताया गया कि हमले में उनकी पत्नी की मौत हो गई तब वो दूसरे बच्चों के आपरेशन में लगे हुए थे.

मुमताज़ के अनुसार अनस इतना डरा हुआ है कि वह अपनी मां की मौत को महसूस भी नहीं कर पाता. उसे लगता है कि चरमपंथी लौट आएंगे.

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शहर के प्रमुख मनोचिकित्सकों में से एक डॉक्टर इफ़्तिख़ार हुसैन कहते हैं कि बच्चों में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) के लक्षण दिख रहे हैं.

उनके अनुसार इन बच्चों को लंबे मनोवैज्ञानिक उपचार की ज़रूरत है.

वो कहते हैं, "इस सदमे की वजह से बच्चों के विकास और भविष्य में उनकी उपलब्धियों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकते हैं."

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