'जर्मनी के बाद फ्रांस में इस्लामोफ़ोबिया'

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पेरिस के 'शार्ली एब्डो' साप्ताहिक पत्रिका पर हुए चरमपंथी हमले की भारत और पश्चिम के अलावा इस्लामिक मीडिया में भी कठोर शब्दों में निंदा की गई है.

अरब देशों के अधिकांश अखबारों में जब 8 जनवरी की सुबह जब हुई तो फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका 'शार्ली एब्डो' पर हुए हमले की ख़बर सुर्ख़ियों में छाई हुई थी.

मुख पृष्ठ पर सरकार की ओर से हमले की निंदा, पीड़ितों के परिवार के प्रति संवेदना और शोक संदेश थे.

इसके अलावा अख़बारों ने हमले के लिए चरमपंथी संगठनों को पश्चिम देशों की ओर से 'धन मुहैया' कराने को ज़िम्मेदार बताया और उनसे अपनी योजना पर फिर से विचार करने की गुज़ारिश की.

"कोई सुरक्षित नहीं है"

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मिस्र के निजी अख़बार अल-यवम में बड़े बड़े शीर्षक में छपा "इस्लामिक स्टेट के चरमपंथ का हमला अब फ़्रांस पर भी."

संपादकीय में अखबार लिखता है कि यहां इस तरह का हमला इसलिए हुआ क्योंकि फ्रांस और यूरोप में चरमपंथ सुरक्षा और खुफिया संबंधी दीवारों को भेदने में सफल रहा.

यही नहीं अख़बार का कहना है कि चरमपंथी संगठन फ्रांस के युवाओं को भी अपने फ़ायदे के लिए ब्रेनवॉश कर रहे हैं.

लेकिन साथ ही अख़बार का ये भी तर्क है कि शार्ली एब्डो पर हमला इसलिए हुआ क्योंकि उसने इस्लामिक स्टेट के मुखिया अबू बकर अल बग़दादी का अपमान किया था.

“चरमपंथ का पालन-पोषण”

मिस्र के एक और निजी अखबार अल-वतन की प्रमुख ख़बर रही, “बियरिंग द बर्न्ट ऑफ फीडिंग टेरोरिज़्म”. (चरमपंथ को पालने का खामियाजा)

लगभग यही रुख संयुक्त अरब अमीरात के सरकारी अख़बार अल-खलीज ने अपने संपादकीय में अपनाया.

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अख़बार लिखता है, “चरमपंथ से निपटने में फ्रांस की नकारात्मक भूमिका की परवाह किए बगैर कहा जाए तो ये चरमपंथ पूरी तरह से निंदनीय है.”

अख़बार आगे कहता है, वैश्विक स्तर पर चरमपंथ से निपटने के लिए नए नज़रिए की जरूरत है क्योंकि "फ्रांस जो आज झेल रहा है वही कल दूसरे देश भी झेल सकते हैं और अरब देश तो इसे रोज़ ही झेल रहे हैं.”

“उपनिवेशवाद”

ओमान के सरकारी दैनिक अख़बार अल वतन ने उपनिवेशवादी ताकतों की ओर संकेत करते हुए संपादकीय में लिखा, “ कुक ऑफ प्वाइज़न विल इवेंचुअली ईट इट "(ज़हर पैदा करोगो तो ज़हर पीना भी होगा).

अख़बार लिखता है, “द अर्थ इज सिंकिंग इन द ब्लड ऑफ़ दोज हू आर अनफ़ेयरली किल्ड”. (दुनिया निर्दोष मारे गए लोगों के खून में डूब रही है.”

एकजुटता का प्रदर्शन

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लेबनान का सरकार विरोधी दैनिक अल-नहर मानता है कि शार्ली एब्डो पर हमला अभिव्यक्ति पर हमला है.

अख़बार का कहना है कि वह खुद भी इस तरह के हमले का साल 2005 में शिकार हुआ था जब इसके पत्रकारों को गोली मार दी गई थी.

अख़बार चरमपंथ को चुनौती देते हुए लिखता है कि एक दिन पत्रकारों की जीत होगी.

लेबनान के हिज़्ज़बुल्ला समर्थक अल-अख़बर दैनिक का पक्ष भी यही है.

उसने हमले में मारे गए कार्टूनिस्टों और लोगों के प्रति एकजुटता जताई है.

बहरीन के सरकारी अखबार अल-वतन ने पहले पन्ने पर संपादकीय में लिखा है, “मतभेद जाहिर करने के लिए हिंसा का उपयोग पूरी तरह से स्पष्ट और घिनौना चरमपंथ है.”

ईरान का मीडिया

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'हार्ड लाइन जीवन' अखबार के पहले पन्ने पर शीर्षक है, "शार्ली एब्डो के 12 पत्रकारों की चरमपंथी हमले में मौतः फ्रांस में इस्लामोफ़ोबिया के कार्टून".

ईरान के सरकारी अखबार की हेडलाइन है, "टेररिस्ट ब्लडी शो इन पेरिस". (पेरिस में चरपंथियों का खूनी खेल).

अख़बार आगे लिखता है "शार्ली एब्डो के दफ़्तर पर तब हमला हुआ है जब फ्रांस के पड़ोसी देश जर्मनी में इस्लामोफ़ोबिया की लहर चल रही है."

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हुर्रियत की वेबसाइट पर लिखा गया, “मीडिया पर किया गया ये हमला न केवल निंदनीय है बल्कि इसने फ्रांस और यूरोप की राजनीति में संस्कृति और धर्म की भूमिका को नए सिरे से पेश किया है. पेरिस हमले ने राजनेताओं की नस छू ली है. मानो यह देश में मुस्लिम समुदाय के साथ पेश आने में नेताओं के सब्र और परिपक्वता की परीक्षा ले रहा हो."

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