शार्ली एब्डोः 'मौत का भी मज़ाक़ उड़ाया'

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भारतीय कार्टूनिस्ट विश्वज्योति घोष बुधवार को हुए हमले में मारे गए शार्ली एब्डो के कार्टनिस्टों में से कुछ के दोस्त रहे हैं. उन्होंने पत्रिका के कार्यालय में एक दिन भी बिताया था.

वो याद कर रहे हैं फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका के कार्यालय में बिताए गए एक दिन और उन बहादुर कलाकारों के साथ बिताए साथ वक़्त को.

पढ़िए पूरा संस्मरण

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एक बड़ी गोल मेज़, उसपर फैले हुए सफ़ेद काग़ज़ और कुछ काले मार्कर. जब मैं पहली बार पेरिस में शार्ली एब्डो के ऑफ़िस में घुसा तो यही तस्वीर मेरे दिमाग़ में अंकित हुई.

सुबह का वक़्त था और संपादकीय बैठक शुरू हो चुकी थी. कुछ कलाकार पहुंच चुके थे और कुछ रास्ते में थे. आइडिया देने का सिलसिला शुरू हो चुका था.

कार्टूनिस्टों ने ज़ोर-ज़ोर से बोलना शुरू कर दिया था और सफ़ेद बोर्ड के पास खड़े संपादक ने आइडिया और विषय वस्तु को दर्ज करना शुरू कर दिया.

'तो यहां ऐसे काम किया जाता है', मैंने ख़ुद से कहा. शार्ली एब्डो, महज़ 12 पेज की पत्रिका है जिसमें सिर्फ़ राजनीतिक कार्टून और स्ट्रीप्स होती थीं और एक छोटा सा संपादकीय होता था.

ज़्यादा चुटकुले, ज़्यादा कार्टून

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जैसे-जैसे बैठक आगे बढ़ी और ज़्यादा आइडिया और चुटकुले टेबल के दोनों तरफ़ से आने लगे. कुछ कार्टूनिस्टों ने पहले ही काम करना शुरू कर दिया था और अब वे तेज़ी से रेखाएं खींच रहे थे.

मेरा दोस्त टीन्यूस तेज़ी से भागता आया, जैसे स्कूल के सबसे पास रहने वाला लड़का सबसे देर से आया हो.

उसने सफ़ेद बोर्ड पर एक नज़र मारी. थीम अपने आप कुछ कहती हुई लगी. उसके हाथ बाहर निकले काले स्केच पेन ने काग़ज़ पर कुछ बनाना शुरू कर दिया.

मैं उस वक़्त फ्रांस में एक कलाकार के मेहमान के तौर पर रह रहा था. टीन्यूस से मेरी मुलाक़ात एक दोस्त के ज़रिए हुई थी.

परिचय

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यह साल 2004 की बात है. वर्ल्ड सोशल फ़ोरम मुंबई में हो रहा था और शार्ली एब्डो के कुछ कार्टूनिस्ट उसे कवर करने मुंबई आ रहे थे.

टीन्यूस ने मेरा परिचय भारत से आए कार्टूनिस्ट के रूप में दिया और सबने मुझे ग़ौर से देखा, जैसे वो उम्मीद कर रहे हों कि मैं वर्ल्ड सोशल फ़ोरम या फ्रांस में हाल ही एक लेक्चर देकर आई अरुंधति रॉय के बारे में कुछ कहूंगा. बुकर पुरस्कार विजेता रॉय ने फ्रांस के सरबॉन में इराक़ युद्ध पर कुछ महीने पहले एक भाषण दिया था.

मैं बस मुस्कुरा कर रहा गया. फिर मेरे बग़ल में बैठे काब्यू से मेरा परिचय कराया गया. वह भारत आ चुके थे और भारत पर कार्टूनों की उनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी थी.

हमने उन शहरों के बारे में बात की जहां गए थे और उन अजीब चीज़ों के बारे में बात की जिन्हें अक्सर कार्टूनिस्ट ढूंढ निकालते हैं.

भाषा की दीवार नहीं

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अब तक अख़बार का उद्देश्य स्पष्ट था- अश्रद्धा, सरोकार और निंदा. सबसे महत्वपूर्ण था- हास्यास्पद की हंसी उड़ाना. किसी को भी मत बख़्शो.

उसी दौरान फ्रांस में एक स्कूल में एक छात्रा को हिजाब पहनने से मना किया गया था और वो विवाद सुर्ख़ियों में था.

सारे देश में उस ख़बर पर चर्चा हो रही थी- और कार्टूनिस्ट पेंसिल चला रहे थे और दोनों पक्षों को कोंच रहे थे.

पत्रिका के कई अंक देखने से साफ़ हो जाता है कि उसने किसी को नहीं छोड़ा था- धर्मगुरुओं, संस्थाओं, होमोफ़ोग्स (समलैंगिकों से नफ़रत करने वालों), धर्म और हां यक़ीनन निकोला सर्कोज़ी को, जो उस वक्त फ़्रांस के गृहमंत्री थे.

तो, वहां फ्रांस के वही कुछ प्रमुख कार्टूनिस्ट सामने बैठे थे और पूरे जोश के साथ अपनी बात रख रहे थे, निंदा कर रहे थे और अपने काले स्केच पेन के साथ हंस रहे थे.

चुटकुले और दोस्ती

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कुछ ही देर में डिस्प्ले बोर्ड पर कई कार्टून नज़र आने लगे थे, उनमें सबसे अच्छे कार्टून को पत्रिका में प्रकाशित होना था.

संपादक और वरिष्ठ सदस्य इन कार्टूनों पर बात करेंगे और फिर उसके बाद लंबी बहसें होंगी. कितना लोकतांत्रिक और पूरी तरह फ्रांसीसी तरीक़ा था.

कुछ देर बाद काब्यू मेरी ओर मुड़े और कहा, "तुम भी कुछ बनाकर उसे वहां क्यों नहीं रखते? हम देखते हैं कि तुम्हारा हास्य फ़्रांस के स्तर का है या नहीं."

मैं मुस्कुराया और कुछ चीज़ें बनाईं- हालांकि वह फ़्रांसीसी स्तर के थे या नहीं, यह मुझे कभी पता नहीं चला, क्योंकि उन सबने उन्हें बहुत अच्छा बताया था.

समय के साथ टीन्यूस और मैं अच्छे दोस्त बन गए, इसके बावजूद कि हम एक दूसरे की भाषा नहीं बोल पाते थे.

उनकी बीवी, अनुवादक का काम करती थी और वो अक्सर हमारे मूर्खतापूर्ण चुटकलों और मज़ाक़ों का अनुवाद करते-करते बीच में फंस जाती थीं.

कोलकाता और कार्टून

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कुछ साल बाद मैं उन्हें कलकत्ता (अब कोलकाता) पुस्तक मेले में मिला जहां फ़्रांस एक मेहमान देश था.

अन्य फ़्रांसीसी कार्टूनिस्टों के साथ हमारा निर्देश स्पष्ट था- पुस्तक मेले और शहर के बारे में कार्टून में एक दैनिक टैबलॉएड निकाला जाए.

शहर उन्हें बहुत कमाल का लगा- ट्रैफ़िक, हॉर्न बजाती टैक्सियां, कॉफ़ी हाउस में होने वाली बैठकें और बिना फ़िल्टर की चारमीनार सिगरेट. सब कुछ उनकी क़लम से होकर निकला- रेखाएं स्वतःस्फूर्त थीं और मज़ाक अनियमित.

शहर में एलाएंस फ्रेंकेज़ का कांफ्रेंस रूम जल्द ही कुछ इस तरह बदल गया जैसे वो शार्ली एब्डो का संपादकीय कक्ष हो.

ऐसे लोगों का एक समूह, जो मज़ाक का भी मज़ाक बनाना पसंद करते थे.

मौत का भी मज़ाक़

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Image caption हमले में मारे गए लोग दाएं से- अर्थशास्त्री बर्नार्ड मैरिस, मशहूर कार्टूनिस्ट वोलिंस्की और कैबू, चार्ली एब्डोके संपादक स्टीफ़ेन शार्बोनियर और कार्टूनिस्ट बर्नार्ड टिग्नस वर्लहॉक.

मैं सोचता था कि कार्टूनिस्ट की ज़िंदगी भी कितनी मज़ेदार होती है?

जिन लोगों ने हर चीज़ का मज़ाक़ उड़ाया था उन्होंने सफ़ेद काग़ज़ पर काले मार्करों से अपने विचार उकेरने को स्थायी प्रतिबद्धता का प्रतीक बनाकर 'मौत का भी मज़ाक़ उड़ाया'.

ऐसे समय में जब राजनीतिक कार्टून, असहिष्णु लोगों के सबसे आसान शिकार बन गए हैं, कार्टून बनाने वालों की स्याही में कार्टून बनाने, आलोचना करने, आवाज़ उठाने और मज़ाक़ करने का जज़्बा बाक़ी है.

हम उनकी राजनीति से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन मुझे यक़ीन है कि अभी दुनिया में हज़ारों शार्ली एब्डो हैं जो दुनिया में बने रहेंगे और हमें हंसाएंगे, सोचने पर मजबूर करेंगे, चोट करेंगे, बहस करेंगे और फिर इनसब पर दोबारा से हंसने को मजबूर करेंगे..

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