अमीरी बढ़ रही है और ग़रीबी...?

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हम अमीर होते जा रहे हैं. क़रीब हर देश में अमूमन प्रत्येक आदमी का जीवन स्तर बेहतर हो रहा है.

साल 2010 तक के आंकड़ों के मुताबिक़ बीते साठ सालों में दुनिया की आबादी तक़रीबन चार गुना बढ़ गई.

इस दौरान देशों की आर्थिक सेहत में काफ़ी सुधार हुआ है.

चीन की अर्थव्यव्सथा में 18 गुने की चौंका देने वाली वृद्धि दर्ज की गई है. दक्षिण कोरिया और ताइवान में यह इज़ाफ़ा इससे भी ज़्यादा है.

कुल मिलाकर देखें तो 1950 की तुलना में दुनिया 25 गुना अमीर हो गई है.

बढ़ रही है अमीरी

हालांकि कुछ देशों की हालात इससे उलट है. मसलन, अफ्रीकी महादेश के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में औसत जीवन स्तर इसी अवधि के दौरान गिरकर आधा हो गया है.

दुनिया की अमीरी को बताने वाले आंकड़े में सब कुछ ठीक ही हो, ऐसा नहीं है. इनमें महसूस की जा सकने वाली वो बातें शामिल नहीं हैं जिनसे ज़िंदगी की गुणवत्ता पर असर पड़ता है.

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जैसे कि सामुदायिक शक्ति किसमें निहित है या फिर पर्यावरण के मानक क्या हैं.

हर चीज़ की तुलना डॉलर में करने और मुद्रास्फीति के हिसाब को ध्यान में रखने की अपनी कुछ तकनीकी अड़चनें भी हैं.

लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि 'हिस्ट्रीकल इकॉनामिक डाटा' प्रोजेक्ट के तहत विश्वसनीय स्रोतों से आंकड़े जुटाएं गए हैं.

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत स्वर्गीय प्रोफ़ेसर एंगस मैडीसन ने किया था और उन्होंने जो कहानी पेश की, वो स्पष्ट है. आर्थिक लिहाज़ से देखें तो हम बेहतर हुए हैं.

एक फ़ायदा तो ये भी हुआ है कि हम ज़्यादा जी रहे हैं. पिछली सदी के मध्य में पैदा हुआ कोई बच्चा 50 साल जीने की उम्मीद कर सकता था. अब ये संख्या 70 है.

एक बार फिर से देखें तो देशों के बीच बहुत ही विविधता है. लेकिन इस दौरान तक़रीबन सभी देशों में यह चलन देखा जा सकता है.

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हालांकि बोत्स्वाना इस चलन का एकमात्र अपवाद है जहां औसत उम्र कुछ महीने कम हुई है.

ख़र्च करने वाली जीवनशैली

लंबी उम्र के पीछे कई वजहें होती हैं. लेकिन आर्थिक तरक़्क़ी का ये मतलब हुआ कि हम अपने स्वास्थ्य पर, पोषण पर अधिक ख़र्च कर सकते हैं.

हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे पास पीने के लिए साफ़ पानी हो.

और अगर हम क़रीब जाकर देखें तो हमें बढ़ते जीवन स्तर की कहानियों का पता चलता है.

वैश्विक मंदी के गर्त में उतरने से पहले सदी के शुरुआती सात सालों में कार रखने वाले लोगों की संख्या में 30 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी.

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यह इज़ाफ़ा मंझोले और छोटी आय वाले देशों में भी ख़ासतौर पर देखा गया.

अब जीवन स्तर से जुड़े सीधे सपाट औसत आंकड़ों, प्रति व्यक्ति जीडीपी पर लौटते हैं. इसके पीछे कुछ और कारण है कि ये क्यों पूरी तस्वीर नहीं बयान करते हैं.

ग़ैर-बराबरी भी बढ़ी

ये आय के वितरण और ग़ैर-बराबरी के बदलते स्वरूप पर कोई रोशनी नहीं डालते.

ज़्यादा कमाई वाले लोगों की दौलत और बढ़ती है तो आप जीवन स्तर के बढ़े हुए औसत आंकड़ों पर पहुंच सकते हैं भले ही बाक़ी लोगों के लिए कुछ न बदला हो.

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ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकॉनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के आंकड़ें भी इस ओर इशारा करते हैं कि उसके सदस्य देशों में असमानता बढ़ी है.

इनमें धनी देश भी हैं और कुछ उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं भी हैं. ग्राफ़ में गिनी गुणांक के ज़रिए इसे समझने की कोशिश की गई है.

संख्या जितनी बड़ी है, आय के वितरण में असमानता उतनी ज़्यादा है और यह हाल के सालों में बढ़ी है.

इस बात को लेकर बहस जारी है कि ग़ैर-बराबरी कितने ख़राब तरीक़े से बढ़ रही है.

और ये सवाल उठना भी समझ में आता है कि इनसे निपटने के लिए क्या सरकारी नीतियां अपनाई जानी चाहिए.

असमानता का बढ़ना हमें यह याद दिलाता है कि भले ही दुनिया अमीर हो गई हो लेकिन सभी ऐसा महससू नहीं करते.

बीबीसी हिंदी पर आने वाले दिनों में आप हमारी ख़ास सिरीज़ के तहत अमीर होती दुनिया की कई तस्वीरें दिखाएंगे, कुछ चमक भरी, कुछ बदरंग भी.

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