अफ़ग़ानिस्तान में पत्रकारों पर हमले बढ़े

अफगानिस्तान पत्रकार

अफ़ग़ानिस्तान में पत्रकारों पर जानलेवा हमले बढ़ते जा रहे हैं.

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राईट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान में पत्रकारों को ज़्यादा ख़तरा सरकार, निर्वाचित राजनेता और सरकारी सेना के लड़ाकों से है. जबकि तालिबान का आतंक जस का तस बना हुआ है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पत्रकार जानलेवा हमले के डर से भ्रष्टाचार और भूमि क़ब्ज़े से जुड़ी ख़बरों की रिपोर्टिंग से बचने लगे हैं.

ह्यूमन राईट्स वॉच का कहना है कि तालिबान से उन पत्रकारों को ख़तरा है जो उनकी जीत का डंका नहीं पीटते.

महिला पत्रकारों को अधिक ख़तरा

न्यूयॉर्क स्थित संस्था ह्यूमन राईट्स वॉच ने बुधवार को 'रिपोर्टिंग बंद करो, वरना हम तुम्हारे परिवार को ख़त्म कर देंगे' शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की.

देश में महिला पत्रकारों पर और भी गंभीर ख़तरा बताया जा रहा है.

ह्यूमन राईट्स वॉच की रिपोर्ट कहती है कि महिला पत्रकारों को न केवल हिंसा और जान से मारने की धमकी मिली है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बंदिशें भी झेलनी पड़ रही हैं.

समाचार एजेंसी एपी के अनुसार अफ़ग़ान पत्रकार हुसैन सिरत की कार जब पिछले दिसंबर में लापता हो गई तो उन्हें लगा कि ये मामूली चोरी का मामला है. लेकिन बाद में एक व्यक्ति ने फ़ोन करके उन्हें बताया कि वो गाड़ी और बंदूक़ लेकर उन्हें मारने के इरादे से गया था.

उसके बाद के हफ़्ते में अफ़ग़ानिस्तान के सबसे बड़े दैनिक अख़बार 8एएम, जो डायचे वेले के साथ काम करता है, के संपादक सिरत पर न केवल सड़क पर हमला हुआ बल्कि उन्हें एक धमकी भरा संदेश भी मिला जिसमें उन्हें काफ़िर कहा गया.

बिगड़ते हालात

8एएम के संपादक सिरत कहते हैं, ''मैं असुरक्षित महसूस करने लगा हूं.'' उनका परिवार घर से बाहर निकलने में डरता है.

उनका आरोप है कि अब तक न तो पुलिस और न ही सुरक्षा एजेंसियां धमकी देने वालों का सुराग़ खोज पाईं.

समाचार एजेंसी एपी का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में साल 2014 में आठ पत्रकार मारे गए हैं.

Image caption अफगानिस्तान में हस्त-ए-सोब के संपादक परवेज कावा का कहना है कि उन्हें लगातार धमिकयां मिलती हैं.

दक्षिणपंथी समूह 2014 को मीडिया के लिए साल 2001 के बाद सबसे बुरा साल बताते हैं. साल 2001 में अमरीका की अगुआई विदेशी सेना के हमलों में तालिबान को भारी नुक़सान उठाना पड़ा.

काबुल में अफ़ग़ान मीडिया प्रेशर ग्रुप 'नेई' के कार्यकारी निदेशक कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं कि हालात बिगड़ते जा रहे हैं. पिछले तीन सालों में दोगुनी संख्या में पत्रकार मारे गए हैं.'

नेई के प्रमुख अब्दुल मुजीब खालवतगर का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में पत्रकारों पर हो रहे हमलों पर कोई तवज्जो नहीं दे रहा.

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