दरवाज़ा जिसे कहते थे 'गेट ऑफ़ डेथ'

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दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड में नाज़ियों के बनाए यातना शिविरों में करीब 10 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई जिसमें ज़्यादातर यहूदी थे.

इस कैंप से लोगों की रिहाई के 70 साल पूरे होने पर कई आयोजन हो रहे हैं.

कुछ साल पहले मैं जब पोलैंड गई थी तो इन शिविरों में जाने का मौका मिला. ठीक से याद करूँ तो बात 27 दिसंबर 2008 की है.

(पढ़ेंः हिटलर की आत्मकथा)

25 दिसंबर को वहाँ क्रिसमस मनाया, काफ़ी जश्न भरा माहौल था... क्रिसमस के बाद सोचा, क्यों न पोलैंड को करीब से देखा- समझा जाए.

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और पोलौंड के इतिहास को वहाँ बने यहूदी यातना शिविरों के बगैर समझना नामुमिकन सा है.

वहाँ के एक छोटे से शहर से कार के ज़रिए मैं अपनी मेज़बान के साथ सुबह पहुँची ऑस्त्विज़ कैंप.

जब ऑस्त्विज़ कैंप में लोहे के गेट से आप शिविर के अंदर आते हैं तो एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर लिखा है, 'आपका काम आपको आज़ादी दिलवाता है.'

अंदर आने पर नज़र एक खास दरवाज़े पर गई. नात्ज़ी काल से जुड़ी हॉलीवुड की कई फ़िल्में बनी हैं.

'गेट आफ़ डेथ'

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इनमें एक दृश्य अकसर रहता है जहाँ यहूदी लोगों से लदी रेलगाड़ियाँ एक दरवाज़े से होते हुईं शिविर के अंदर पहुँचती थीं.

इस दरवाज़े को 'गेट ऑफ़ डेथ' कहा जाता है.

(पढ़ेंः जहां जन्मे थे हिटलर)

शून्य से कई डिग्री कम तापमान में बर्फ़ से ढके इस दरवाज़े के पास जब मैं खड़ी थी तो एक अजीब सी सिहरन मेरे अंदर दौड़ गई.

यहाँ की वीरानगी और सन्नाटे के बीच खड़े होकर आप उस मंज़र की कल्पना भर ही कर सकते हैं.

ऑस्त्विज़ का म्यूज़ियम

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इस शिविर का दौरा करवाने वाली गाइड हमें एक ख़ास जगह ले गईं और बताया कि लाखों लोगों को इन गैस चैम्बरों में डालकर मार दिया जाता था.

यूँ तो आज तक देश विदेशों में कई म्यूज़ियमों में गई हूँ लेकिन ऑस्त्विच के म्यूज़ियम में जाना बेहद अलग और दिल को हिला देने वाला अनुभव रहा.

(पढ़ेंः मुसोलीनी का बंकर)

म्यूज़ियम के अंदर करीब दो टन बाल रखे गए हैं.

गाइड ने बताया कि मरने से पहले नात्ज़ी लोगों के बाल काट लेते थे ताकि उनसे कपड़े वगैरह बनाए जा सकें.

यातना शिविर

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लकड़ी के कुछ बिस्तर भी वहाँ रखे हैं जहाँ बंदी सोते थे. यहाँ की हर चीज़ एक कहानी कहती है. शिविर में घूमते हुए मैं वहाँ बने शौचालयों तक पहुँची.

गाइड ने बताया कि बंदी इन शौचालयों को साफ़ करने की ड्यूटी करने को बेहतर काम समझते थे क्योंकि शौचालय साफ़ करने वालों को यातनाएँ कम उठानी पड़ती थीं.

(पढ़ेंः दुकान का नाम हिटलर रखने पर...)

लेकिन इन शिविरों में एक अनोखी चीज़ भी देखने को मिली. यातनाओं के बीच छिप-छिपाकर कुछ क़ैदी कला को ज़िंदा रखे हुए थे.

एक क़ैदी की बनाई कलाकृति देखकर मन में ख़्याल आया कि उस क़ैदी के ज़हन में उस समय क्या चल रहा होगा.

'वॉल ऑफ़ डेथ'

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ऑस्त्विज़ शिविर के परिसर में एक दीवार है जिसे 'वॉल ऑफ़ डेथ' कहते हैं.

कहते है कि यहाँ अक्सर लोगों को बर्फ़ के बीच खड़ा कर गोली मार दी जाती थी.

(पढ़ेंः हिटलर की हत्या के साजिशकर्ता की मौत)

ऑस्तिविज़ कैंप के मेरे इस दौरे में एक बात मुझे खटकी. मेरी मेज़बान दूसरे शहर से गाड़ी चलाकर मुझे यहाँ ले लाईँ पर अंदर नहीं गईं.

उन्होंने घंटों खड़े होकर बाहर ही मेरा इंतज़ार किया. पूछने पर कोई खास वजह नहीं बताई. शाम को वो मुझे अपनी दादी के यहाँ ले चलीं.

मारे गए लोग

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80 साल से ज़्यादा की उम्र, आँखों में रोशनी न के बराबर.

उन्होंने बताया कि कैसे वो नात्ज़ी यातना शिविर से बच निकलने में सफल रहीं लेकिन उनके परिवार के लोग मारे गए.

इसके बाद मैने अपनी मेज़बान से कुछ पूछना मुनासिब नहीं समझा और दोबारा कभी ऑस्त्विज़ के बारे में उनसे बात नहीं की.

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