अब अमरीका पास, मॉस्को दूर लगता है

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अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा ने भारत की विदेश नीति को एक नया मोड़ दे दिया है.

वर्ष 1998 तक, जब तक भारत ने परमाणु बम का परीक्षण नहीं कर लिया, अमरीका का भारत के प्रति रवैया नज़रअंदाज करने वाला था, क्योंकि भारत के पूर्व सोवियत संघ और बाद में रूस के साथ संबंध बहुत अच्छे थे.

लेकिन इस परीक्षण के बाद अमरीका की नज़र में भारत की स्थिति ज़्यादा अहम हो गई. उसके बाद उसके कई राष्ट्रपति आए और दोनों देशों के बीच संवादहीनता कुछ हद तक ख़त्म हुई.

ओबामा की यात्रा के बाद तो ऐसा लगता है कि अमरीका अब भारत के अधिक क़रीब आ गया है जबकि मॉस्को दूर हो गया है.

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अमरीका और भारत के नेताओं की आपसी दोस्ती और दोनों देशों के बीच दोस्ती से अलग ये सच्चाई नज़र आती है कि भारत और अमरीका आज एक दूसरे के जितने क़रीब हैं पहले कभी नहीं थे.

सत्तर और अस्सी के दशकों में पले बढ़े भारतीयों की नज़रों में ये भारत के लिए एक सम्पूर्ण परिवर्तन है.

मैं 80 के दशक के आख़िरी साल में कुछ महीनों के लिए अमरीका में रहा था. तब मैं एक छात्र था.

अमरीका और सोवियत संघ के बीच चल रहे शीत युद्ध के आख़िरी साल थे. बर्लिन की दीवार नहीं गिरी थी.

इस्लामिक चरमपंथी नाम की कोई चीज़ दुनिया में मौजूद नहीं थी.

ईरान उस समय अमरीका का दुश्मन था और ईरान की इस्लामी क्रांति पश्चिमी देशों के लिए सिर दर्द बनी हुई थी.

मॉस्को से दोस्ती

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लेकिन अमरीका नहीं, उस समय मॉस्को भारत का सबसे क़रीबी दोस्त था.

उस समय अमरीका में ईरान और सोवियत संघ की ख़बरों से इसके अख़बार भरे रहते थे.

भारत की ख़बरें ढूंढने से भी नहीं मिलती थीं. अमरीका भारत से सचमुच में काफी दूर था. उनके लिए भारत तब संपेरों और जादूगरों का देश था.

ये दूरी बर्लिन दीवार के गिरने, सोवियत संघ के बिखरने और इस्लामी चरमपंथ के शुरू होने के बाद भी जारी रही.

अमरीकियों की नज़रों में भारत अब भी रूसी असर के दायरे में था. भारतीय हथियार रूस से ही खरीदे जाते थे. रूस ही भारत में भारी उद्योग लगाता था.

और जब 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो अमरीका से भारत की दूरी और भी बढ़ गई. भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए.

लेकिन इस परमाणु परीक्षण का फायदा ये हुआ कि पहली बार अमरीका ने भारत को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया और 2000 में 22 साल बाद कोई अमरीकी राष्ट्रपति भारत के सरकारी दौरे पर आया.

क्लिंटन का दौरा

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बिल क्लिंटन के पांच-दिवसीय दौरे ने दोनों देशों के बीच आपसी मतभेद और शक की दीवारों को तोड़ने में मदद की.

उस समय भी क्लिंटन का स्वागत वैसा ही हुआ था जैसा कि इस बार बराक ओबामा का हुआ. दोनों देश थोड़ा नज़दीक तो आए, लेकिन दूरी अब भी बनी रही.

क्लिंटन के दौरे का एक और फायदा यह हुआ कि अमरीका में भारत के बारे में चर्चा होने लगी.

इसे एक मज़बूत लोकतंत्र के रूप में देखा जाने लगा. उधर अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की सिलिकॉन वैली में ज़बरदस्त कामयाबी से भी अमरीका में भारत की छवि बेहतर हुई.

परमाणु करार

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उसके बाद 2006 में जॉर्ज बुश आए. परमाणु मामले में समझौते से भारत का दशकों पुराना अंतरराष्ट्रीय परमाणु अलगाव ख़त्म हुआ.

इसके अलावा भारत और अमरीका के बीच व्यपार तेज़ी से बढ़ने लगा. अमरीका में रिपब्लिकन और डेमोक्रैट दोनों पार्टियों में भारत के प्रति चीन और पाकिस्तान से अधिक प्रशंसा देखने को मिली और ये गुडविल आज भी बना हुआ है.

इस दोस्ती को और मज़बूत करने मनमोहन सिंह अमरीका गए और बराक ओबामा 2010 में भारत आए.

इन यात्राओं से दोनों देश एक दूसरे से और भी क़रीब हुए, लेकिन इस दोस्ती को अब एक उच्च स्तर पर ले जाने की ज़रूरत है.

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इस में रणनीतिक गहराई लाने की ज़रूरत है.

क्या ओबामा और मोदी की निजी दोस्ती दोनों देशों के रिश्तों को शिखर पर ले जाने में कामयाब होगी?

क्या इस हफ्ते बराक ओबामा के दौरे से ये ऊंचाई तय होगी?

ये तो आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन ये तय है कि 80 के दशक की तरह भारत अमरीका से दूर नहीं महसूस होता. अब मॉस्को दूर लगता है.

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