ईशनिंदा क़ानूनों को मिलेगी चुनौती ?

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एक नए वैश्विक अभियान के तहत ईशनिंदा क़ानून को चुनौती दी जा रही है. इस अभियान को कई मानवाधिकार संस्थाओं ने एक साझा संगठन बनाकर शुरू किया है.

दि इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट एंड एथिकल यूनियन (आईएसईयू) नामक इस संगठन का कहना है कि फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली एब्डो पर हुए हमले के बाद विभिन्न देशों में ईशनिंदा क़ानूनों को ख़त्म करवाने का ये सही वक़्त है.

ईशनिंदा क़ानून के तहत ही धार्मिक भावनाओं की रक्षा की जाती है. लेकिन दुनिया के कई देशों में ईशनिंदा क़ानून अब भी लोकप्रिय हैं.

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फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्डो के दफ़्तर पर हुए हमले के बाद फ्रांस समेत पूरी दुनिया में 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के पक्ष में लोगों ने पुरज़ोर आवाज़ उठाई.

वहीं, दुनिया के कुछ हिस्सों में पत्रिका में प्रकाशित पैगंबर मोहम्मद के विवादित कार्टून और हमले के बाद प्रकाशित होने वाले अंक में प्रकाशित एक अन्य कार्टून का विरोध हुआ.

कई इस्लामी देशों में पैगंबर मोहम्मद की तस्वीर बनाना मना है, लेकिन ईशनिंदा क़ानून कई अन्य धर्मों और देशों में भी है.

ईशनिंदा क़ानून के समर्थक इसे धार्मिक भावनाओं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का एक तरीका बताते हैं. वहीं इसके आलोचक इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बाधा और राजनीतिक विरोध को दबाने का तरीका मानते हैं.

अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न

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सोंजा एगरिक्स आईएईयू की अध्यक्ष हैं. ये संगठन ठोस तथ्यों से प्रेरित नैतिक समाज की वकालत करता है.

वो कहती हैं कि इस अभियान के तहत उन लोगों की मदद का इरादा है जो पहले से ज़मीनी स्तर पर ईशनिंदा के क़ानूनों से लड़ रहे हैं.

वो कहती हैं, "धर्म का 'अपमान' करने वाले विचार अपराध हैं, यही कारण है बांग्लादेश में आसिफ़ मोहियुद्दीन जैसा मानवतावादी जेल में हैं, सऊदी अरब में रैफ़ बदावी जैसे धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति को कोड़े मारे जा रहे हैं और इसी वजह से अफ़ग़ानिस्तान, मिस्र, पाकिस्तान, ईरान, सुडान और कई अन्य देशों में नास्तिकों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को मारा जा रहा है."

रैफ़ बदावी को सऊदी अरब की एक अदालत ने मई, 2014 में अपने ब्लॉग पर इस्लाम की धार्मिक हस्तियों की आलोचना के लिए एक हज़ार कोड़े मारने की सज़ा दी थी.

पाकिस्तान में भी धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए कड़े क़ानून हैं.

पाकिस्तान में पाँच बच्चों की माँ आसिया बीबी को साल 2010 में एक गिलास पानी को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद इस्लाम का अपमान करने के लिए मौत की सज़ा सुनाई गई है. 50 वर्षीय आसिया अभी जेल में हैं.

ईसाई अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाली संस्था से जुड़े जॉन पॉन्टिफेक्स कहते हैं कि कई बार तो ऐसे मामले अदालत तक पहुँच ही नहीं पाते. वो कहते हैं, "ये क़ानून ईशनिंदा के आरोपी बताए जाने वाले ईसाई या दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ हुई हिंसा को स्वीकार्य बनाता है. जबकि ज़्यादातर मामलों में ऐसे आरोप ग़लत होते हैं."

समाज को लाभ

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ईशनिंदा के क़ानून से क्या सचमुच समाज को कोई लाभ होता है?

प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार ऐसे क़ानून सबसे ज़्यादा मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में प्रचलित हैं. इन्हीं देशों में इस क़ानून के सबस बड़े पैरोकार भी हैं.

'दी ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन' 56 इस्लामी देशों का संगठन है. यह संगठन संयुक्त राष्ट्र में लगातार यह प्रयास करता रहा है कि धर्म का अपमान करने के बारे में वैश्विक क़ानून बनाया जाए.

संगठन का कहना है कि ऐसे क़ानून से विभिन्न संगठनों के संग भेदभाव रोका जा सकेगा.

पिछले साल संगठन के महासचिव इयान अमीन मदनी ने कहा था कि 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का अधिकार इस्लामी शिक्षाओं से टकरा रहा है.

उन्होंने उन देशों कि निंदा की जो 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की सीमा नहीं तय करना चाहते हैं. उनके अनुसार इससे धार्मिक अल्पसंख्यकों को नुकसान हो रहा है.

लेकिन ईशनिंदा क़ानून केवल मध्य-पूर्व में नहीं पाए जाते.

यूरोप में ईशनिंदा

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डेनमार्क की दंड संहिता का अनुच्छेद 140 ईशनिंदा के बारे में हैं. इसका आख़िरी बार प्रयोग 1938 में किया गया था जब एक नाज़ी समूह को यहूदी-विरोधी प्रचार के लिए इसके तहत सज़ा दी गई थी.

म्यांमार में दिसंबर में तीन लोगों को धर्म के अपमान का मामला दर्ज किया गया क्योंकि उन लोगों ने कथित तौर पर हेडफ़ोन पहने हुए बुद्ध की तस्वीरें बांटी थीं.

यूरोप के कुछ अन्य देश भी धर्म-विरोधी विचारों को आपराधिक श्रेणी में रखते हैं.

माल्टा में साल 2012 में सार्वजनिक ईशनिंदा के लिए 99 लोगों को दोषी ठहराया गया. दोषियों को जुर्माना से लेकर जेल तक की सज़ा दी गी.

साल 2014 में रूस में सांसदों ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने से रोकने के लिए नए क़ानून पर मतदान किया, जिसका पुसी रॉयट ने नामक समूह के लोगों ने सार्वजनिक विरोध किया था.

समूह के तीन लोगों पर दर्ज किए गए मामले में 'धार्मिक भावनाएं आहत करने' का भी आरोप था.

आयरलैंड में समाजिक कार्यकर्ता इस बात को लेकर नाराज़ हैं कि सरकार 2009 मे लाए गए ईशनिंदा क़ानून पर जनमत संग्रह कराने इनकार कर रही है.

पिछले ही साल ग्रीस में एक व्यक्ति को एक रूढ़िवादी ईसाई भिक्षु को फ़ेसबुक पर व्यंग्य करने के लिए 10 महीने जेल की सज़ा दी गई थी.

नफ़रत के ख़िलाफ़

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जो लोग 'धर्म के अपमान' से जुड़े क़ानून का विस्तार चाहते हैं वो भी भविष्य की योजनाएँ बना रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद के अनुसार सऊदी अरब के अनुरोध पर परिषद की मार्च में होने वाली बैठक में धर्म के अपमान का मुद्दा उठाए जाने की संभावना है.

वहीं आईएसईयू अभियान के संचार निदेशक बॉब चर्चिल कहते हैं कि उनका उद्देश्य भेदभाव का बढ़ावा देना नहीं है.

वो कहते हैं, "हमारा अभियान नफ़रत फैलाने को रोकने के लिए बनाए गए क़ानूनों के ख़िलाफ़ नहीं है, ऐसे क़ानून वाजिब हैं."

चर्चिल इस बात से भी इनकार करते हैं कि इस अभियान से सांस्कृति साम्राज्यवाद को बढ़ावा मिलेगा.

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