पेशावरः ख़ूनी जंग में दम तोड़ती दस्तकारी

पाकिस्तान, पेशावर

किसी दूसरे शहर से पेशावर पहुंचते ही जो चीज़ सबसे पहले ध्यान खींचती है, वो केवल सुरक्षाकर्मियों की संख्या नहीं, बल्कि उनके हाथों में मौजूद हथियार हैं.

लगभग हर चौक चौराहे पर खड़े यातायात पुलिस के वार्डन के हाथ में भी बड़ी सी बंदूक़ है.

यह दृश्य इस शहर और यहां बसने वालों की मानसिक स्थिति का हाल बताने के लिए काफ़ी है.

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अमरीका में ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद पाकिस्तान में सशस्त्र गुटों की गतिविधियों से शायद ही कोई शहर सुरक्षित रहा होगा.

लेकिन जितनी हत्याएं और ख़ून ख़राबे पेशावर शहर को देखनी पड़ी हैं, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती.

(पढ़ेंः पाकिस्तान की पहली महिला केंद्रीय मंत्री का निधन)

यह शहर पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापारिक मार्गों से जोड़ता है.

लेकिन अमन-चैन के ख़तरनाक़ हालात के कारण पेशावर आर्थिक तबाही के कगार पर खड़ा दिखता है.

बेदम कारोबार

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वैसे तो यहां के हालात से हर व्यवसाय ही प्रभावित हुआ है, लेकिन दस्तकारी उद्योग से जुड़े राज्य के लाखों कुशल कामगार खासकर बेरोज़गारी और ग़रीबी के कारण शरीर और जान का रिश्ता भी मुश्किल से बनाए हुए हैं.

पेशावर के चार, सद्दा रोड पर कई ऐसे छोटे परिसर हैं जहां पारंपरिक एंटीक फ़र्नीचर बनाए जाते हैं.

(पढ़ेंः यहां होता है सिर्फ पत्रकारों का इलाज)

उनमें से एक इकाई हैदर ख़ान की है. वह पहले फ़र्नीचर के साथ सेरेमिक्स का भी निर्यात करते थे, लेकिन अब व्यापार में दम नहीं रहा.

हैदर कहते हैं, "पहले हम इटली, जर्मनी, फ्रांस और अमरीका सहित कई देशों को माल भेजते थे, लेकिन अब तो यह काम ख़त्म होने को है."

आत्मघाती विस्फोट

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वो कहते हैं, "पहले यहां विदेशी ख़रीदार आते थे, लेकिन पेशावर में विदेशियों की आवाजाही दस साल से बंद हो चुकी है. पहले मैं साल में पच्चीस से तीस कंटेनर सामान भिजवाया करता था, लेकिन अब दो से तीन भी नहीं जा पाते हैं."

(पढ़ेंः बंदूक के साये में शिक्षा)

पेशावर का बाज़ार मसगराँ एक ज़माने में विदेशी पर्यटकों के लिए ख़रीददारी का पसंदीदा ख़रीद केंद्र हुआ करता था. पिछले कुछ सालों में इस बाज़ार में दो आत्मघाती विस्फोट हो चुके हैं.

यहाँ विशेष रूप से तांबे के बर्तन और सजावट की वस्तुओं की दुकानें थीं, लेकिन अब यहां केवल दो दुकानें बची रह गई हैं. इसमें से एक दुकान सईद अहमद की है.

मजबूरी

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सईद अहमद तीन पीढ़ियों से यह काम कर रहे हैं. लेकिन व्यापार की स्थिति को देखते हुए उन्होंने अपने बेटे को ये हुनर सिखाने का इरादा छोड़ दिया है.

वो कहते हैं, "हमारा काम कोई आसानी से नहीं सीख सकता. इस काम को सीखने में दस से पंद्रह साल लगते हैं. इसलिए अब हमारे कारीगर कोई और काम नहीं कर सकते."

(पढ़ेंः 'हमारा काम शिक्षा देना है...')

उन्होंने बताया, "कारोबार बंद होने के कारण अब यह ये लोग रेहड़ियां लगाने, मज़दूरी और चौकीदारी का काम करने के लिए मजबूर हो चुके हैं."

उनका कहना है, "अगर यही स्थिति बरक़रार रही तो कुछ समय में पीतल और तांबे का काम करने वाले कारीगर नहीं रहेंगे."

कोई मदद नहीं

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आए दिन होने वाले हमलों ने पेशावर नहीं बल्कि पूरे सूबे के कारीगरों की कमर तोड़ कर रख दी हे. याकूब लाला स्वात में हस्तशिल्प के बड़े व्यापारी थे.

अब उनका सत्तर प्रतिशत कारोबार बंद हो चुका है. वो कहते हैं, "पूरे सूबे में टार्गेट किलिंग और जबरन उगाही शुरू हो चुकी है."

(पढ़ेंः फजलुल्लाह अमरीका की चरमपंथी सूची में)

उन्होंने बताया, "ये लोग नाम नहीं बताते, केवल फ़ोन करते हैं और कहते हैं इतनी रकम पहुंचा दो वरना तुम इस दुनिया में नहीं रहोगे. बस फिर क्या करें, लोग पैसे दे देते हैं या फिर इलाक़ा छोड़ देते हैं."

हद तो ये है कि जंग से जूझ रहे इस इलाके में हाथ से बनी चीजों को बनाने के छोटे और मंझोले दर्जे के कारोबार से जुड़े लोगों को इन असाधारण परिस्थितियों में भी कोई मदद नहीं दी गई है.

9/11 के बाद

हाथ के बने हुए कालीन व्यवसाय से जुड़े व्यापारी मजहरुल हक़ कहते हैं, "साल 2000 तक हम चरम पर थे. मेरा निजी निर्यात ही एक अरब रुपये तक था."

उन्होंने बताया, "नौ ग्यारह के बाद हमें यह अनुमान नहीं था कि व्यापार इतना ख़राब हो जाएगा, लेकिन इसके बाद शुरू होने वाले धमाकों ने ये हाल किया कि आज 70 फीसदी व्यापार नष्ट हो चुका है."

(पढ़ेंः हौंसलों की उड़ान भर, स्कूल चले हम!)

वे कहते हैं, "लेकिन हमें सरकार ने कोई विशेष मदद या सुविधाएं नहीं दीं, ताकि एक कारोबार बंद हो रहा है तो हम दूसरा कर लें."

खैबर पख़्तूनख़्वाह के छोटे शहरों और गांवों के कारीगर भी पेशावर से सामान बाहर भिजवा रहे थे.

लाखों का ख़र्च

लेकिन अब हालात ये है कि पेशावर में न कार्गो ट्रेन है और न ही यहां से कोई अंतरराष्ट्रीय उड़ान सेवा जा रही है.

आतिफ रशीद हैंड क्राफ्ट एक्सपोर्टर हैं. वो कहते हैं "फ्लाईटस बंद हैं. सामान को कराची भिजवाने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं."

उन्होंने बताया. "जब हम कस्टम क्लियरेंस करवाकर सामान को कराची भिजवाते हैं तो वह इस में चेकिंग के नाम पर ड्रिलें मारकर सुराख कर देते हैं कि सामान पेशावर से आया है और कभी तो इस चक्कर में हैंडीक्रॉफ्ट कंटेनर से चोरी भी हो जाती है."

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