सिलिकॉन वैली का बॉस्केटबॉल प्रेमी

विवेक रणदिवे, कारोबारी, अमरीका
Image caption विवेक रणदिवे अमरीकी बॉस्केटबॉल खिलाड़ियों के साथ.

अमरीका की सिलिकॉन वैली को दुनिया में सॉफ्टवेयर जगत का मक्का माना जाता है. पिछले कुछ दशकों में कई भारतीयों ने सिलिकॉन वैली में अपनी विशेष छाप छोड़ी है. ऐसे भारतीयों पर पेश है बीबीसी की ख़ास शृंखला की तीसरी और आख़िरी कड़ी.

पढें- शृंखला की पहली कहानी

इस कड़ी में आप पढ़ेंगे विवेक रणदिवे के बारे में जिन्होंने सॉफ्टवेयर और कारोबार की दुनिया में अपना लोहा मनवाने के बाद एक बिल्कुल ही अलहदा क्षेत्र बॉस्केटबॉल में नई शुरुआत की है.

पढ़ें- शृंखला की दूसरी कहानी

मुंबई में पले-बढ़े विवेक क्रिकेट और फ़ुटबॉल को औपनिवेशिक खेल मानते हैं और इसलिए वो बॉस्केटबॉल को भारत में सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक बनाना चाहते हैं.

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Image caption सिलिकॉन वैली का एरियल शॉट.

अमरीका की सिलिकॉन वैली की ख़ासियत ये है कि ऊंची से ऊंची दीवार को लांघने के बाद भी लोग नई ऊंचाइयों की तलाश जारी रखते हैं.

भारतीय मूल के अरबपति विवेक रणदिवे सॉफ़्टवेयर की दुनिया की ऊंचाइयों को हासिल करने के बाद अब बॉस्केटबॉल की दुनिया में बड़ी छलांग लगा रहे हैं.

हाल ही में उन्होंने अमरीकी नेशनल बॉस्केटबॉल लीग की एक साधारण सी टीम, सैक्रामेंटो किंग्स को रिकॉर्ड कीमत देकर ख़रीदा है और उसे अव्वल पांच टीमों में शामिल करने की कोशिश में हैं.

लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती उन्होंने ली है बॉस्केटबॉल को भारत में क्रिकेट के बाद दूसरे नंबर का खेल बनाने की.

पसंदीदा खेल

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रणदिवे ने रियल टाइम डेटा का इस्तेमाल करके वॉल स्ट्रीट को डिजिटाइज़ किया था जिसने शेयर बाज़ार के काम करने के तरीके को बदल कर रख दिया.

उसके फ़ौरन बाद उन्होंने टिबको नाम से एक कंपनी खड़ी की जिसका बनाया सॉफ़्टवेयर अमेज़न डॉटकॉम, ई-बे और यहां तक कि अमरीका की होमलैंड सिक्योरिटी में भी इस्तेमाल होता है.

हाल ही में उन्होंने उस कंपनी को चार अरब डॉलर में बेचा और अब अपना वक़्त अपने पसंदीदा खेल बॉस्केटबॉल में लगा रहे हैं.

रणदिवे कहते हैं, "बॉस्केटबॉल 21वीं सदी का अहम खेल बनेगा, ठीक उसी तरह जैसे फ़ुटबॉल बीसवीं सदी का था. क्रिकेट और फ़ुटबॉल जैसे खेलों को मैं साम्राज्यवादी खेल मानता हूँ और ये उत्तर साम्राज्यवादी खेल है."

बॉस्केटबॉल में गणित

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मुंबई में पले-बढ़े रणदिवे भारत में क्रिकेट और फ़ुटबॉल खेलते थे, बॉस्केटबॉल उन्होंने पहली बार अमरीका में आकर छुई. जब उन्होंने अपनी ग्यारह साल की बेटी की टीम की कोचिंग शुरू की.

उनका कहना है कि जिस तरह से दूसरी टीमें इस खेल को खेलती थीं उससे लगता था कि वो दिमाग़ का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं कर रही हैं.

वो कहते हैं, "मैंने इसमें गणित का फ़ॉर्मूला लगाया, जिसमें एक-एक सेकंड का हिसाब रखते हुए दूसरी टीम के हर मूव को ब्लॉक करने की कोशिश की गई और हम कामयाब हुए."

उनके लिए बॉस्केटबॉल सिर्फ़ खेल नहीं एक बड़ा बिज़नेस भी है. दर्शकों को लुभाने के लिए वो कभी गूगल ग्लास टेक्नॉलॉजी के ज़रिए मैच दिखाते हैं, कभी लोकप्रिय ऑनलाइन करेंसी बिटकॉइन का इस्तेमाल करते हैं तो काफ़ी बॉलीवुड नाइट का आयोजन करते हैं.

लेकिन सबकी जड़ में रहता है डेटा जिसका इस्तेमाल वो वैसे ही कर रहे हैं जैसे सॉफ़्टवेयर इंडस्ट्री में किया करते थे.

खेल में तकनीकी

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रणदिवे अपनी टीम को आगे बढ़ाने के लिए गणित और डेटा के इस्तेमाल पर कहते हैं, "बास्केटबॉल में आज तक जितना डेटा तैयार हुआ है, अब सिर्फ़ एक साल में उससे ज़्यादा डेटा हमारे पास जमा हो रहा है. खिलाड़ी की पोज़ीशन, कौन सा कॉम्बिनेशन सबसे अच्छा रिज़ल्ट देगा, दूसरी टीम को गार्ड कैसे करें, कहां से बॉल फेकें, विपक्षी कहां से फेंकते हैं....ये सभी डेटा से जुड़े पहलू हैं और हम उसका इस्तेमाल कर रहे हैं."

भारत में बॉस्केटबॉल

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Image caption विवेक रणदिवे क्रिकेट को औपनिवेशिक खेल मानते हैं.

रणदिवे भारत को बॉस्केटबॉल के लिए बड़े बाज़ार की तरह देख रहे हैं और उसे लोकप्रिय करने के लिए वहां काफ़ी मेहनत और पैसा लगा रहे हैं.

वो कहते हैं, "हम अपने लक्ष्य से आगे चल रहे हैं. भारत में इस वक्त दस लाख बच्चे बास्केटबॉल खेल रहे हैं....और हमें लगता है कि ये संख्या कुछ सालों में एक करोड़ हो जाएगी. खेलों की दुनिया अब तेज़ी से बदल रही है."

कई शहरों में उन्होंने बॉस्केटबॉल क्लीनिक शुरू की हैं, स्कूलों को इसमें जोड़ रहे हैं, टीवी पर उसे लोकप्रिय करने की कोशिश चल रही है और कई अमरीकी बॉस्केटबॉल स्टार्स को भारत ले जा रहे हैं.

दफ़्तर का बोर्डरूम हो या बॉस्केटबॉल का कोर्ट उनका कहना है कि कामयाबी के लिए एक ख़ास रवैये, की ज़रूरत होती है और भारत में इन दिनों वो नज़र आ रहा है.

बेटी की टीम का ऐटीच्यूड

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Image caption भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमरीका में.

अपनी बेटी की टीम की कोचिंग के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "हमने एक जोशीला नारा बनाया हुआ था, वन टू थ्री...ऐटीच्यूड. एक और लड़की टीम में आई और उसने उस नारे को बना दिया—वन टू थ्री..ऐटीच्यूड..हाह!! यानी और ज़्यादा जोश."

उनके मैथ्स के फॉर्मूले का रेकॉर्ड देखकर लगता है कि शायद वो अपने मकसद में कामयाब हो जाएं. लेकिन भारत, जहां क्रिकेट एक मज़हब है, वहां बास्केटबॉल के लिए नई जगह बनाना बच्चों का खेल नहीं होगा.

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