क्या जन्मदिन आपका भाग्य बांच सकता है?

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जन्म कुंडलियों से ज्योतिषी अक्सर आपके व्यक्तित्व के बारे में भविष्यवाणियां करते हैं, लेकिन यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि वैज्ञानिक अध्ययन इस तरह की भविष्यवाणियों का भंडाफोड़ करते आए हैं.

हालांकि 1970 के दशक में एक अध्ययन में पाया गया कि कुछ राशियां व्यक्तित्व की कुछ विशेषताओं से मेल खाती हैं, बाद में वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि यह कुछ और नहीं बल्कि उम्मीदों की ताक़त को प्रतिबिम्बित करता है.

अगर हम यह सुनते हुए बड़े हुए हों कि हम न्यायप्रिय और निष्पक्ष होंगे, जिद्दी या जुनूनी होंगे तो हम उसी के अनुरूप काम भी करेंगे.

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महत्वपूर्ण बात यह है कि जो व्यक्ति अपनी जन्मकुंडली के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, वे उनके बारे में की गई भविष्यवाणियों के अनुरूप व्यवहार करने में विफल रहते हैं.

जन्मकुंडली की कोई विशेष भविष्यवाणी ग़लत हो सकती है पर इनमें कहीं न कहीं सत्य का कुछ अंश होता है. पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों की भी समझ में यह आने लगा है कि आपके जन्म का महीना आपके भाग्य की भविष्यवाणी कर सकता है.

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स्कूल में प्राप्त होने वाले ग्रेड पर इसका असर सर्वाधिक स्पष्ट हो सकता है – स्कूली वर्ष के अंत में पैदा होने वाले बच्चे स्कूली वर्ष के शुरू में पैदा होने वाले बच्चों की तुलना में कुछ ख़राब प्रदर्शन करते हैं, हालांकि यह अंतर अगले कुछ सालों में नगण्य हो जाता है. पर इसके ऐसे भी कुछ स्वरूप हैं जिनकी आसानी से व्याख्या नहीं हो सकती.

जन्म महीने की भूमिका

उदाहरण के लिए, 1990 के दशक के अंत में शिकागो विश्वविद्यालय के लियोनिद गाव्रिलोव ने पाया कि सर्दियों में पैदा हुए लोगों में लंबी अवधि तक जीने की संभावना होती है. उन्होंने उसके बाद से अब तक विभिन्न अध्ययनों से इसकी पुष्टि की है.

इसके लिए उन्होंने उन लोगों का अध्ययन किया है जो 100 या इससे अधिक वर्षों तक जिंदा रहे और उनके नवीनतम अध्ययन में कहा गया है कि मार्च में पैदा होने वाले बच्चों की तुलना में शरद ऋतु में पैदा होने वाले बच्चों की 100 साल तक जीने की संभावना 40 फ़ीसदी अधिक होती है.

गाव्रिलोव के अध्ययनों को लेकर शुरू में काफ़ी विरोध हुआ और इन्हें ग़लत समझा गया. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के श्रीराम रामगोपालन इस बात से सहमत हैं कि यह विषय अब अपनी गति पकड़ रहा है.

रामगोपालन ने कहा, “अभी पिछले चार-पांच साल में ही बड़े और विस्तृत अध्ययन होने लगे हैं जिनमें इन मुद्दों पर विस्तार से काम हुआ है.” हाल के कुछ अध्ययनों में तो लाखों प्रतिभागियों को शामिल करने के उदाहरण हैं.

उदाहरण के लिए, रामगोपालन के ख़ुद के अध्ययन में इंग्लैंड के लगभग 60 हज़ार लोगों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड को खंगाला गया और तब जाकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया है कि शरद और वसंत ऋतु में पैदा हुए बच्चे में पागलपन, अवसाद, और ‘बाइपोलर’ गड़बड़ियों के ज़्यादा होने की आशंका होती है.

चश्मा लगाएंगे कि नहीं?

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आपके जन्म का महीना आपके जिस एक और लक्षण को प्रभावित कर सकता है वो है आपकी नज़र.

सर्दियों में पैदा होने वाले बच्चों में कमज़ोर निकट दृष्टि दोष की संभावना बहुत कम होती है. एलर्जी आपको कितना प्रभावित करेगी यह भी इस बात पर ज़्यादा निर्भर करता है कि आप किस महीने में पैदा हुए हैं.

गर्मियों में पैदा होने वाले बच्चों के एलर्जी से प्रभावित होने की संभावना कम होती है.

निश्चित रूप से इन धारणाओं के पीछे की प्रक्रियाएं बहुत ही अस्पष्ट हैं.

खान-पान में बदलाव

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खान-पान में परिवर्तन और हर साल होने वाले संक्रमण शिशु के विकास को प्रभावित करते हैं जिसका दशकों बाद उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.

मसलन पेशेवर बेसबॉल खिलाड़ियों के अमूमन सर्दियों में पैदा होने की संभावना अधिक होती है. इसका कारण संभवतया यह हो सकता है कि जीवन की शुरुआत से ही ये बच्चे ज़्यादा स्वस्थ होते हैं.

विभिन्न मौसमों में आप विभिन्न तरह की एलर्जियों से ग्रस्त हो सकते हैं. जब आंखों की दृष्टि की बात आती है, तो अध्ययनों में पाया गया है कि अंधकार की अवधि ‘आईबॉल’ के विकास को विनियमित करती है.

इसलिए गर्मियों के लंबे दिनों के कारण आंखों का फ़ोकस बिगड़ सकता है, जबकि सर्दियों में पैदा हुए बच्चों में आगे चलकर चश्मे की ज़रूरत कम होती है.

वैज्ञानिक तथ्य

अब विटामिन डी को ही लें – यह उस समय बनता है जब हमारा शरीर सूर्य की रोशनी के संपर्क में आता है.

विटामिन डी की कमी से हड्डियां कमजोर होती हैं और सूखा रोग होता है, यह हम बहुत पहले से जानते हैं पर अब यह पता लगा है की यह प्रतिरोधक प्रणाली के विकास में भी अहम भूमिका निभाता है.

रामगोपालन कहते हैं, “पशुओं पर किए गए अध्ययन में पता चला है की अगर गर्भधारण के समय विटामिन डी की मात्रा को सीमित किया जाता है तो पैदा होने वाला बच्चा तंत्रिका संबंधी भयंकर गड़बड़ियों का शिकार हो जाता है.”

इस वजह से विटामिन डी की कम मात्रा दिमाग की ‘वायरिंग’ के विकास में अंतर पैदा करती है. इसको प्रमाणित करने के कुछ संकेत डेनमार्क से आए हैं.

जन्म के तुरंत बाद वहां हर बच्चे की एड़ी में सुई चुभाकर उसका खून रिकॉर्ड के लिए रख लिया जाता है.

80 और 90 के दशक में पैदा हुए बच्चों के उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि जन्म के समय जिनके शरीर में विटामिन डी का स्तर सबसे कम था, उनमें जीवन में आगे चलकर पागलपन की स्थिति विकसित होने की संभावना अधिक होती है.

क्या हैं विकल्प?

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भावी मां-बाप हो सकता है कि चिंतित हो जाएं और यह सोचना शुरू कर दें कि उन्हें इन बातों को ध्यान में रखकर गर्भधारण के बारे में सोचना चाहिए – पर यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि इसका असर अपेक्षा की तुलना में काफ़ी कम होता है.

इसके बावजूद रामगोपालन का कहना है कि हम कुछ साधारण तरीकों से इन मौसमी अंतरों को मिटा सकते हैं – उदाहरण के लिए सर्दियों में पैदा होने वाले बच्चे को विटामिन डी का डोज़ देकर.

ये खोज कम से कम हमें अपने भविष्य की अनजान दुनिया में झांकने का मौका तो देती ही है.

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स्पष्ट रूप से आनुवांशिक गुणों के वाहक जीन्स और हमारा पालन-पोषण सबसे अहम है, पर अगर हमारे जन्म का महीना हमारे मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की अवधि को आकार देने में भूमिका अदा कर सकता है तो हमारा भाग्य रचने में और न जाने किस-किस की भूमिका होगी?

सितारे हमारा भाग्य लिखते हैं, ऐसा अगर नहीं भी माना जाए तो भी अब हमने उन अदृश्य ताक़तों को समझना शुरू कर दिया है जो हमारे जीवन के रास्तों को उस दिन से निर्देशित करने लगती हैं जिस दिन हम अपनी मां की कोख में आते हैं.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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