2020 स्पेस: 6 बड़ी भविष्यवाणियां

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आज से 10 साल बाद अंतरिक्ष में मनुष्य किन महत्वाकांक्षी योजनाओं को अंजाम देने वाला है ?

अंतरिक्ष में हो रही खोज 1960 के दशक के बाद इतनी रोमांचक कभी नहीं रही जितनी आज के समय है.

आज भारत और चीन के बीच 'स्पेस रेस' या अंतरिक्ष की होड़ दिख रही है, वह आने वाले समय में और बढ़ेगी.

अमरीकी एजेंसी नासा ने स्पेस शटल के बाद, हाल ही में ओरियोन का प्रक्षेपण किया जो अंतरिक्ष में यात्रियों को ले जा सकता है.

यूरोप ने पृथ्वी से 51 करोड़ किलोमीटर दूर एक धूमकेतु पर एक अंतरिक्ष यान उतारा है और चीन अगला स्पेस स्टेशन बनाने की तैयारी कर रहा है.

इस बीच, निजी कंपनियां मानव अंतरिक्ष उड़ानों, अंतरिक्ष पर्यटन और यहां तक कि इंसान को मंगल ग्रह पर भेजने के अभियान से अंतरिक्ष के अर्थशास्त्र को बदलने पर आमादा हैं.

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अगले कुछ साल में टेनिस कोर्ट के आकार जैसी जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप भी बनकर तैयार हो जाएगा.

इस तरह, 2020 के बाद अगले 10 साल में क्या हम चांद पर नए अड्डे, मंगल पर मानव बस्तियां और बहुत से अन्य विस्मयकारी ब्रह्मांडीय खोजों की उम्मीद कर सकते हैं.

अंतरिक्ष: 6 बड़ी भविष्यवाणियां

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बीबीसी ने जिन तीन विशेषज्ञों से बात की है, वो हैं - स्कॉट पेस, स्पेस पॉलिसी इंस्टिच्यूट वाशिंगटन के निदेशक ; डेविड बेकर, नासा के पूर्व इंजीनियर, स्पेसफ़्लाइट पत्रिका के संपादक ; मोनिका ग्रेडी, प्रोफेसर, प्लैनेटरी एंड स्पेस साइंसेज, यूके ओपन यूनिवर्सिटी.

1. फिर चांद पर जाएँगे

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डेविड बेकर: चांद पर हम सिर्फ़ तीन दिन में पहुंच सकते हैं और वहां पर अंतरिक्ष यात्रियों को अपेक्षाकृत कम समय के लिए भेजने के लिए बस थोड़े से ही प्रयास की ज़रूरत है. चीन चांद को अपना लक्ष्य बना रहा है और वहां पर अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजना चाहता है.

मोनिका ग्रेडी: मैं चांद पर अर्ध-स्थाई आवास की परिकल्पना करती हूं. पर यह बस्ती बसाने जैसा नहीं है; इसका इस्तेमाल चांद पर जाने और वहां से मंगल पर रॉकेट भेजने के लिए हो – सौर प्रणाली की आगे और खोज के लिए चांद को आधार बनाया जा सकता है.

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स्कॉट पेस: अमरीकी अंतरिक्ष नीति के साथ मुश्किल यह है कि इसने न केवल चांद से हाथ झाड़ लिया, बल्कि इसके बदले मंगल और एस्टिरॉयड्स पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है. इस कारण से अंतरिक्ष कार्यक्रम में उसके कई साझेदार कन्नी काट गए हैं क्योंकि उनकी दिलचस्पी चांद में थी.

ये एजेंडे में शामिल होना चाहिेए क्योंकि अमरीका और उसके बड़े साझेदारों के भू-राजनीतिक, तकनीकी और आर्थिक हित इससे जुड़े हुए हैं.

2. मंगल पर अभी क्यों नहीं

मोनिका ग्रेडी: हालाँकि मंगल मानवीय खोज का लक्ष्य है, लेकिन एक बार वहाँ पहुंचने और अपना झंडा गाड़ देने के बाद मुझे नहीं पता कि हम क्या करेंगे. इस बारे में बातचीत हो रही है कि क्या मंगल को उसी तरह इंसान का निवास स्थान बनाया जाना चाहिए, जैसा कि हमने धरती को बनाया है.

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स्कॉट पेस: जब हमने कहा कि हम मंगल पर जा रहे हैं, तो हमारी बहुत सी सहयोगी अंतरिक्ष एजेंसियों ने कहा, “मंगल पर जाना तो ठीक है पर यह इतना बड़ा आयोजन है कि हम इसका संचालन नहीं कर सकते. रणनीतिक रूप से हमने एक ऐसा रास्ता चुना जिसमें आज की दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ अंतरराष्ट्रीय साझेदारी ही हमसे छूट गई.”

डेविड बेकर: इस बात को मानना पड़ेगा कि नासा के इतिहास में इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि उस पर जनसंपर्क विभाग के उन कुछ लोगों का नियंत्रण हो जो व्हाइट हाउस के इशारे पर चलते हैं. नासा से लोगों को जो दृश्य दिखाया जा रहा है वह उस एजेंसी की क्षमता से बहुत अलग है.

नया ओरियोन अंतरिक्ष भी अंतरिक्ष में केवल तीन सप्ताह तक ही ऑटोनोमस (स्व-संचालन) काम के लिए सक्षम है. मंगल पर जाते हुए भी यह रास्ते में मानव बस्ती बसाए, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है. मंगल पर जाना मुश्किल, ख़तरनाक और फ़िलहाल समयपूर्व है.

3. चीन और भारत की रेस

डेविड बेकर: भारत और चीन के बीच अंतरिक्ष की होड़ दिखने लगी है और आने वाले समय में और बढ़ेगी.

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स्कॉट पेस: मैं नहीं समझता हूं कि उस अर्थ में यह होड़ जैसा है. चीन के लिए यह राष्ट्रीय गौरव और कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन, औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार करने और युवाओं को विज्ञान और तकनीक की ओर आकर्षित करने का ज़रिया है.

डेविड बेकर: पश्चिमी देशों में हर नए प्रेसिडेंट या नई सरकार के सत्ता में आने पर नई अंतरिक्ष नीति घोषित होती है. इसमें आमतौर पर निरंतरता की कमी होती है और समय और धन की बर्बादी होती है. इस दृष्टि से चीन लाभ की स्थिति में है– उसकी राजनीतिक व्यवस्था ग़ैर-लोकतांत्रिक है, जिससे वह आने वाले कई वर्षों के लिए अग्रिम योजना बना सकता है और उनको पूरा करने की दिशा में काम कर सकता है.

4. अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन का भविष्य

स्कॉट पेस: अमरीका 2024 तक आईएसएस से जुड़ा रहने के लिए प्रतिबद्ध है, पर समस्या यह है कि हमारे (अमरीका के) साझेदार उस समय तक वहां रहेंगे कि नहीं. यह रूस के साथ भविष्य पर भी निर्भर करता है.

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रूस और अमरीका दोनों ही आईएसएस से जुड़े हैं, और दोनों देशों की आपसी निर्भरता बहुत गहरी है. आपसी सम्बन्धों की कटुता से इसे बचाने के भी प्रयास हो रहे हैं.

डेविड बेकर: रूसी अकेले आईएसएस को नहीं चला सकते क्योंकि यह उनका नहीं है. मुझे लगता है कि इस पूरी चीज़ को “डिऑर्बिट” करना होगा. 2020 तक इसको स्थापिक किए और इसके उपकरणों को शुरू किए हुए 20 साल से अधिक हो जाएंगें.

स्कॉट पेस: अंतरिक्ष स्टेशन का भविष्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के भविष्य पर निर्भर करता है. और अगर हम इस बारे में स्पष्ट रूप से नहीं जानते कि अंतरिक्ष स्टेशन के बाद आगे हम क्या करना चाहते हैं, तो सच तो ये है कि हमें इस अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को बंद करना पड़ेगा. इंसान की अंतरिक्ष यात्रा तो निश्चित रूप से जारी रहेगी पर यह पश्चिमी देशों के नेतृत्व में नहीं होगी. 2020 के दशक के मध्य तक चीन का स्टेशन भी आईएसएस पर होगा. यूरोप चीन से चर्चा कर रहा है कि एक चीनी एस्ट्रोनॉट भी आईएसएस पर हो.

5. प्राइवेट कंपनियां एजेंसियों से आगे

डेविड बेकर: मुझे लगता है कि एक्ससीओआर और वर्जिन गैलेक्टिक कंपनियां लोगों को अंतरिक्ष में ले जाएँगी. आप अंतरिक्ष की सैर कर सकेंगे पर अधिक संभावना वैज्ञानिकों और प्रयोगों को ‘सब-ऑर्बिटल’ फ्लाइट्स पर ले जाने की होगी.

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मोनिका ग्रेडी:पहली बात तो यह कि अंतरिक्ष में अमीर और तकनीकी में दिलचस्पी रखने वाले ही जा पाएंगे. जब विमानों की उड़नें शुरू हुई थीं, तो सिर्फ़ धनी लोग ही इसमें यात्रा कर पाते थे. चांद पर जाने वाले रॉकेट की उड़ान के साथ भी यही बात है. इस समय तो स्पेस एजेंसियां अंतरिक्ष की परियोजनाओं को अंजाम देती हैं, लेकिन बाद में काम स्पेसएक्स, वर्जिन गैलेक्टिक जैसी कंपनियाँ ही करेंगी.

स्कॉट पेस: अमरीकी सरकार का आईएसएस को आगे ले जाने के लिए योजना नहीं बनाना, उभरते व्यवसायिक अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए काफी ख़तरनाक़ है. बिना किसी सरकारी मदद के ये अपने बूते पर कैसे बनी रह पाएंगी, यह कहना मुश्किल है.

6. साहसिक लोग जाते रहेंगे

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स्कॉट पेस: इंसान क्या है इसकी परिभाषा के लिए ऐसे कई सवालों का जवाब देना पड़ता है: हम कहां जा सकते हैं? हम क्या देख सकते हैं? हम क्या सीख सकते हैं और वहां से क्या ला सकते हैं? रोबोटिक सिस्टम के साथ साझेदारी में हम जितना संभव हो, उतनी जगहों पर जाना पसंद करेंगे.

मोनिका ग्रेडी: बेशक, रोबोट वो सब कर सकेगा जो इंसान कर सकता है. वैज्ञानिक और तकनीकी उद्देश्यों के लिए इंसानों को भेजने की ज़रूरत नहीं होगी. पर एक उत्सुकता होती है – कौन लोग, क्या करेंगे और क्या खोजेंगे, उम्मीद और प्रेरणा की बात होती है. एक बार जब रोबोट हमें यह बता दे कि यह काम कैसे किया जाता है, लोग वहां जाएंगे.

डेविड बेकर: मुझे लगता है कि ये बड़ी परियोजनाएं तो होंगी ही- मैं इन्हें साकार होते हुए देखना चाहूँगा. यह बाजार से और लोगों से निर्देशित होगा. हम अंतरिक्ष कार्यक्रमों का लोकतंत्रीकरण होते हुए देखने जा रहे हैं.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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