भूमध्य सागरः प्रवासियों का कब्रिस्तान!

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पिछले दिनों भूमध्य सागर में बेहतर जिंदगी की तलाश में यूरोप की तरफ निकले सैकड़ों लोगों के सपने समंदर की लहरों से हार गए.

भूमध्य सागर में इन लोगों की नौकाएं डूब गईं जिनमें कम से कम 300 प्रवासी मारे गए. वैसे ये इस तरह पहली घटना नहीं है.

पिछले साल इसी तरह मुख्यतः अफ्रीका से यूरोप जाने की कोशिश में 3500 लोग भूमध्य सागर में डूब गए जबकि इस साल अब तक ये आंकड़ा 425 को पार कर गया है.

इसीलिए भूमध्य सागर को प्रवासियों का कब्रिस्तान भी कहा जाता है.

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इटली के लैम्पदूसा द्वीप की डेनियाला कहती हैं, "अगर आप सोचते हैं कि आप अपने घर में आराम से सो रहे हैं और दूसरी तरफ कुछ लोग अपनी जिदंगी को बचाने के लिए जूझ रहे हैं, तो ये बहुत ही बुरी बात है. बहुत ही शर्म की बात है. हमारे बस में कुछ नहीं है. बस इतना ही कर सकते हैं कि उनकी बेहतर तरीके से मदद करें."

ये द्वीप पिछले दिनों फिर उसी त्रासदी का गवाह बना जो हाल के सालों में यहां देखने को मिलती रही है.

त्रासदी उन लोगों की जो आम तौर पर अफ्रीकी देशों से अपनी जान को दांव पर लगा तर बेहतर जिदंगी की आस में यूरोप का रुख करते हैं और कई बार समंदर की लहरें उन्हें निगल जाती है.

भूमध्य सागर

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चंद जो थोड़े खुशकिस्मत हैं, वो यूरोपीय तटरक्षकों की मदद से बच जाते हैं, लेकिन जिंदगी की मुश्किलें खत्म नहीं होतीं.

दो दिन पहले लीबिया से मोटरबोटों पर निकले 300 लोगों को भूमध्य सागर से निगल गया. कुछ ही लोग बचाए जा सके.

अंतरराष्ट्रीय प्रवासी संगठन की इटली की शाखा के प्रमुख फेडेरिको सोडा कहते हैं कि और बहुत से लोग बचाए जा सकते थे.

उन्होंने कहा, "बिलकुल, जिस तरह का बचाव और समुद्र अभियान तंत्र यहां है, बहुत सारे लोग बचाए जा सकते थे. लेकिन अशांत समंदर की वजह से बहुत समस्या हुई."

बेहतर भविष्य!

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फेडेरिको सोडा कहते हैं, "जो बात जरूरी है, वो ये है कि इस तरह से बड़ी संख्या में आ रहे लोगों पर यूरोपीय नीतियों में बदलाव हो."

अगले तीस साल में अफ्रीका की जनसंख्या यूरोप की जनसंख्या से तीन गुनी हो जाएगी और यूरोपीय संघ की नीतियां लोगों के सीमित प्रवाह से निपटने के लिए भी कारगर नहीं हैं.

बेहतर भविष्य के लिए उत्तरी अफ्रीका से यूरोप की तरफ जाने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है.

2013 में साठ हजार लोगों ने भूमध्यसागर को पार किए और इस दौरान डूब कर मरने वाले लोगों की संख्या 600 थी और पिछले साल लगभग एक लाख 70 लोग इस सफर पर निकले और तीन हजार समंदर में डूब गए.

खोज और बचाव

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संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी का यूरोपीय संघ ने खोज और बचाव अभियान से जुड़ी गतिविधियों को सीमित कर प्रवासियों की जानों को जोखिम में डाला है.

दक्षिणी यूरोप के लिए शरणार्थी एजेंसी की प्रतिनिधि कारलोटा सामी का कहना है, "हमने अक्टूबर में सबको चेतावनी दी थी कि खोज और बचाव अभियान की क्षमता को कम करने से ऐसे हादसे हो सकते हैं."

सामी कहते हैं, "अगर यूरोपीय संघ ने तुरंत कदम नहीं उठाया तो ऐसा फिर से होगा. यूरोपीय संघ को कुछ कदम तो उठाने होंगे क्योंकि भूमध्य सागर को पार करने वाले प्रवासियों का सिलसिला तो रुकने वाला नहीं नहीं है."

यूरोपीय तट

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लेकिन ब्रिटेन समेत अन्य यूरोपीय देशों का कहना है कि प्रवासियों के लिए बचाव सेवाओं का बेहतर करने का मतलब होगा कि ज्यादा से ज्यादा लोग यूरोप की तरफ आएंगे, इसीलिए राहत और बचाव की गतिविधियों को सीमित किया गया.

फिलहाल यूरोपीय संघ सीमा नियंत्रण अभियान 'ट्रिटन' चला रहा है, यह यूरोपीय तटों के आसपास ही काम करता है और इसके पास पोतों की संख्या भी बहुत सीमित है.

प्रवासी अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि फ्रांसुआ क्रिपो कहते हैं कि समंदर में प्रवासियों को बचाने के लिए व्यापक अभियान को खत्म करने का इटली का फैसला समुद्र के पहले नियम के ही खिलाफ है.

ख़तरनाक सफर

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वे कहते हैं, "अगर हम अपनी सीमाओं की रक्षा करना चाहते हैं तो बहुत चीजें हम कर सकते हैं लेकिन निश्चित तौर पर पहला काम लोगों को जिंदगी को बचाना है."

इसलिए यूरोपीय देशों को खोज और बचाव अभियान को बढ़ावा होगा और ये कहना बंद करना होगा कि इससे ज्यादा लोग इधर आएंगे.

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क्या हम इसलिए लोगों को मरने दें ताकि दूसरी न आएं. इसे न तो नैतिक और राजनीतिक दोनों ही तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

अंतरराष्ट्रीय प्रवासी संगठन का कहना है कि अगर कोई कदम नहीं उठाया गया तो इस साल भूमध्य सागर में जान गंवाने वाले लोगों की संख्या और बढ़ सकती है.

आर्थिक कारणों के अलावा सीरिया में जारी संकट के चलते वहां के बहुत से लोग भी जान हाथ हथेली पर रख कर भूमध्य सागर के खतरनाक सफर पर निकल रहे हैं.

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