स्मार्ट टीम लीडर से होता है नुक़सान?

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जब आप लोगों को नियुक्त करते हैं, प्रमोशन देते हैं या अपनी टीम से जोड़ते हैं तो आपकी नज़र स्मार्ट लोगों पर होती है? अगर आपका जवाब हां में है, तो ज़रा ठहरिए.

इस पूरे खेल में बुद्धिमता वह पैमाना है, जिसके मिनिमम ज़रूरी स्तर से काम चल जाता है. लेकिन पुराने समय की ही तरह, मिनिमम स्तर के इस्तेमाल के बाद, ज़रूरत के ज़्यादा बुद्धिमता से नुक़सान होने लगता है.

एनरॉन मैनेजमेंट टीम की पहचान स्मार्ट लोगों की टीम के बतौर होती थी लेकिन ये कितना फ़ायदेमंद रहा, इस पर भी नज़र दौड़ाएं.

अमरीका की ऊर्जा कारोबार से जुड़ी इस कंपनी ने बाज़ार में मौजूद बेहतरीन टैलेंट को टीम में शामिल किया और मुनाफ़ा कमा रही यूनिट की कमान भी उसे सौंप दी जिसका कोई सुपरविज़न भी नहीं होता.

स्मार्ट लोगों से नुक़सान

एनरॉन टीम मैनेजर अपनी स्मार्टनेस के बावजूद बेहद ग़ुस्से वाले थे. ख़ुद को असुरक्षित मानने वाले थे और यही वजह है उनके फ़ैसलों से कंपनी को लाखों डॉलर का नुक़सान उठाना पड़ा. कंपनी साल 2001 में तालाबंदी के कगार पर पहुंच गई.

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निश्चित तौर पर, आपको किस काम के लिए लोगों की तलाश है, इसकी भूमिका अहम होती है. मैं ख़ुद भी रिसर्च, विश्लेषण और तकनीकी लोगों की टीम में सबसे बुद्धिमान लोगों को शामिल करना चाहूंगा.

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लेकिन आप इनको एक कमरे में बंद कर दें और फिर उनसे काम करने को कहें. वे तल्लीनता से अपना काम करते नज़र आएंगे. उनमें भावनात्मक बौद्धिकता की कमी हो या फिर दूसरे लोगों से व्यवहार में भी वो कमतर हों, तो भी उनके काम से नुक़सान कम से कम होगा.

बावजूद इसके क्या मुझे स्मार्ट मैनेजरों की ज़रूरत है?

दरअसल स्मार्ट लोगों की एक बड़ी खामी यह है कि वे अमूमन सोचते हैं कि वो दूसरों से ज़्यादा जानते हैं. हो सकता है, वो जानते भी होंगे.

स्मार्टनेस से फ़ायदा?

लेकिन आप ये बताएँ कि इससे उन्हें क्या मदद मिलेगी? अगर वे किसी चीज़ को बेचना चाहें और उन्हें खरीददार को आकर्षित करना हो, तो उन्हें इसका कैसे फ़ायदा होगा.

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एक सीनियर मैनेजर का उदाहरण है - मैं उन्हें कोचिंग दे रहा था. वो हमेशा ख़ुद को दूसरों से एक क़दम आगे मानती थीं.

इससे उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती आई कि वह यह मानने को तैयार नहीं थीं कि दूसरे मैनेजर, उनकी जैसी सोच से ही दुनिया नहीं देखते.

ऐसे में दूसरे मैनेजरों को अपने प्रोजेक्ट से जोड़ने के लिए उन्हें काफ़ी समय खर्च करना पड़ता था.

अगर आपके पास किसी सवाल का सही जवाब हो तो अलग सोच वाले आपसे सहमत हो सकते हैं.

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मगर मुश्किल यह है कि संस्था ऐसे काम नहीं करतीं. ख़ासकर तब, जब आपको सहयोगियों के साथ काम करना हो, जिन पर आपका सीधे वश न हो.

ऐसे में आपको अपने विचारों से उन्हें सहमत करने की ज़रूरत होती है. मानो उन्हें अपने विचार बेचने होंगे. ऐसे में आपका उनसे स्मार्ट होना या सुपीरियर होना किसी काम का नहीं होता...

औसत मैनेजर

यही वजह है कि कई बार काफ़ी प्रतिभाशाली लोग भी औसत मैनेजर साबित होते हैं. खेल की दुनिया में अमूमन ऐसा नज़र आता है, जहां संन्यास ले चुके सुपरस्टार खिलाड़ी बेहतर कोच या मैनेजर नहीं बन पाते.

केनेडाई हॉकी के लेजेंड वायन ग्रेटज़की ने जब संन्यास लिया, तो पेशेवर हॉकी में उनके नाम सबसे ज़्यादा गोलों के रिकॉर्ड थे लेकिन वे बतौर हेड कोच नाकाम रहे.

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बास्केटबॉल के सबसे महान खिलाड़ियों में शुमार माइकल जॉर्डन भी बॉस्केटबॉल क्लब के जीएम, प्रेसीडेंट और प्रमोटर के तौर पर कभी कामयाब नहीं हो पाए.

यह कई दूसरे मामलों में भी दिखता है. जब ऐसे प्रतिभाशाली लोग बाज़ार में जाते हैं, तो सबसे बेहतरीन उत्पाद पर नज़र डालते हैं. मुझे सिंगापुर में क्रिएटिव टैक्नोलॉजी के दौरान कुछ मैनेजरों का वाकया याद है.

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तब एपल ने अपना आईपॉड लाँच ही किया था. उस क्रिएटिव हेड के पास तकनीकी तौर पर बेहतर एमपी3 प्लेयर था, पर उपभोक्ता आईपॉड पसंद कर रहे थे. वह क्रिएटिव मैनेजर ये नहीं समझ पा रहे थे लोग आईपॉड क्यों पसंद कर रहे थे.

सुनने में बेहतर

कई बार यह होता है कि सबसे बेहतरीन तकनीक हमेशा कामयाब नहीं होती, ठीक वैसे ही जैसे स्मार्ट लोग हमेशा कामयाब नहीं होते.

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उदाहरण के लिए, कॉल सेंटर में उपभोक्ताओं की मदद के लिए आने वाले फोन कॉल्स को लीजिए. अगर कोई तकनीशियन कम समय में उपभोक्ताओं की समस्या हल कर देता है, तो क्या यह बेहतर होगा?

अमरीका की ऑनलाइन शू स्टोर जापोस अपने उन कर्मचारियों को पुरस्कार देती है जो उपभोक्ताओं के सवाल-जवाब में प्रति उपभोक्ता ज़्यादा वक़्त देते हैं.

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दरअसल ज़्यादा प्रतिभाशाली लोगों को नौकरी देने के अपने नुक़सान भी हैं. स्मार्ट और ज्यादा प्रतिभाशाली लोगों को टीम लीडर बनाना, सुनने में तो बेहतर लगता है पर इसे लागू करना उतना बेहतर साबित नहीं होता.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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