बहाना सार्क का, बातचीत पाकिस्तान से?

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भारत के पिछले साल भारत-पाक सचिव स्तर की वार्ता रद्द करने के बाद से द्विपक्षीय वार्ता आधिकारिक तौर पर अभी बहाल नहीं हुई है. लेकिन भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर मंगलवार से इस्लामाबाद की दो दिवसीय यात्रा पर हैं.

क्या यह दौरा दोनों पड़ोसी देशों के बीच औपचारिक बातचीत की शुरुआत का कारण बन सकता है या वास्तव में यह समग्र वार्ता की बहाली ही है?

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Image caption भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर दो दिवसीय यात्रा पर इस्लामाबाद जा रहे हैं.

दोनों देशों के संबंधों पर छाई निराशा के संदर्भ में इस दौरे को काफ़ी अहमियत दी जा रही है.

पाकिस्तान कहता रहा है कि चूंकि वार्ता रोकने का फ़ैसला भारत का था इसलिए उसकी बहाली की पहल भी उसे ही करनी चाहिए.

कूटनीति के कुछ विशेषज्ञ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 13 फ़रवरी की टेलीफ़ोन कॉल को इसी संदर्भ में देखते हैं और कहते हैं कि यह वार्ता की बहाली की ओर पहला क़दम कहा जा सकता है.

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भारत सरकार के अनुसार एस जयशंकर की ताज़ा यात्रा सार्क देशों से संपर्क बढ़ाने का सिलसिला है.

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पूर्व वरिष्ठ राजनयिक नजमुद्दीन शेख़ के अनुसार भारत का भी कहना है कि वह इस यात्रा में सभी विषयों पर बातचीत को तैयार है.

नजमुद्दीन शेख़ कहते हैं, "वह (भारत) स्वीकार नहीं करना चाह रहे हैं कि यह वार्ता की बहाली है, लेकिन मुझे लगता है कि बातचीत केवल सार्क से संबंधित नहीं होगी."

पेशावर विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय विभाग के प्रोफ़ेसर हुसैन सोहरावर्दी कहते हैं कि पाकिस्तान-भारत के संबंधों की ऊंच-नीच को देखते हुए इस तरह के दौरे काफ़ी महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

प्रोफ़ेसर सोहरावर्दी कहते हैं, "जनता यह मानने लगती है कि संबंधों में बेहतरी होगी. यह उम्मीद ही कई मामलों में फ़र्क़ ले आती है जैसे कि व्यापार और मुद्रा. आना-जाना बढ़ जाता है. इससे तत्काल कोई नतीजा निकले या नहीं लेकिन फ़ायदा ज़रूर होता है."

नेताओं के फ़ैसले और वार्ता

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पाकिस्तान-भारत संबंधों का ये दुर्भाग्य रहा है कि नेताओं के फ़ैसलों से वार्ता कई-कई महीनों और वर्षों के लिए पीछे चली जाती है.

पिछले साल अगस्त में सचिव स्तर की वार्ता को भारत ने दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित के कश्मीरी नेताओं से मुलाक़ात पर नाराज़ होकर रद्द कर दिया था.

पाकिस्तान के मुताबिक देखने की बात यह है कि इतने समय वार्ता निलंबित होने से किसको फ़ायदा हुआ है, लेकिन वे सभी विवादास्पद मुद्दों पर भारत से बात करना चाहेगा.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तसनीम असलम का कहना है कि दोनों देशों के बीच जब भी वार्ता बहाल हुई है, उसमें कश्मीर, सियाचिन, पानी, विश्वास बहाली के उपाय, व्यापार और लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं.

तसनीम असलम ने एक पाकिस्तानी निजी टीवी चैनल को साक्षात्कार में कहा कि दोनों देश अगर अपनी-अपनी चिंताओं पर बात करेंगे तो उनके समाधान की ओर बेहतर तरीक़े से चल सकते हैं.

मुंबई हमलों के आरोप-प्रत्यारोप

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मुंबई हमलों की जांच में सुस्ती के भारतीय आरोप के बारे में तसनीम का कहना था, "हमारी भी बहुत सी मांगें और चिंताएं हैं. आप यह न भूलें कि मुंबई हमले से दो साल पहले समझौता एक्सप्रेस की घटना हुई थी. हमारे यहाँ तो एक संगठन के ख़िलाफ़ शक के कारण मुक़दमा भी चल रहा है."

उन्होंने कहा, "इसी को आप समझौता एक्सप्रेस की घटना से मिलाकर देखें तो पाकिस्तानियों को जलाकर मारा गया. मरने वालों में सैन्य अधिकारी भी थे. हमारे लोगों की जानें क्या कम क़ीमती हैं?"

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क्या भारत-प्रशासित कश्मीर में नई सरकार के गठन का इस्लामाबाद वार्ता से कोई संबंध है?

इस सवाल के जवाब में नजमुद्दीन शेख़ कहते हैं कि भारतीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी और मुफ़्ती मोहम्मद सईद के बीच समझौते में यह बात शामिल थी कि भारत, पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू करेगा.

नजमुद्दीन शेख़ के अनुसार, "दोनों देशों के बीच संबंध ख़राब होने पर दुनिया भी चिंतित रहती है और भारत को इसका सामना करना पड़ता है."

नियंत्रण रेखा पर तनाव

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पाकिस्तान और भारत के बीच एक लंबे समय से नियंत्रण रेखा पर तनाव बने रहने के कारण भी इस बातचीत का महत्व बढ़ गया है.

पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ ने पिछले दिनों सियालकोट का दौरा किया था और बयान दिया था कि दुश्मन (भारत) को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा.

इससे क्या प्रतीत होता है? क्या सेना इस बातचीत में "ऑन बोर्ड" है?

इसका जवाब देते हुए प्रोफ़ेसर हुसैन सोहरावर्दी कहते हैं कि दोनों देशों की सेनाएं भी एक दूसरे की नब्ज़ देखने की कोशिश करती हैं.

प्रोफ़ेसर सोहरावर्दी के अनुसार, "सेना जानना चाहती है कि दूसरी ओर मूड कैसा है. दोनों को इससे फ़ायदा होता है. ज़ाहिर हो या न हो लेकिन सेना की सहमति होती है."

विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तसनीम असलम, जनरल राहील शरीफ़ के बयान के बारे में कहती हैं, "हमारे देश में ऐसा नहीं होता कि प्रधानमंत्री कोई बयान दे और दो दिन बाद सेना उसके ख़िलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस करे. सेना प्रमुख का सियालकोट दौरा (भारत के लिए) कोई संदेश नहीं था."

मोदी की मजबूरियां

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पाकिस्तान में यह भी माना जा रहा है कि मोदी सरकार की आंतरिक मजबूरियां शायद कुछ कम हुईं हैं जिसके कारण वह पाकिस्तान के साथ संपर्क बहाल करने के लिए तैयार हुए हैं.

प्रोफ़ेसर हुसैन सोहरावर्दी कहते हैं कि भारत की आंतरिक राजनीति में यह रवैया 1947 से चला आ रहा है.

उनके अनुसार, "साठ के दशक तक तो आंतरिक कारणों की बुनियाद पर आरोप कभी पाकिस्तान तो कभी चीन पर डाल दिया जाता था. इससे होता है कि यदि आप किसी दूसरे देश पर आरोप डाल दें तो सारा देश एकजुट हो जाता है. यह एक नकारात्मक रवैया है. चूंकि कश्मीर के चुनाव हो चुके हैं तो अब बातचीत की जा रही है."

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पाकिस्तानी विश्लेषकों का मानना है कि अगर मोदी सरकार बातचीत बहाल करने पर रज़ामंद हुई है तो इसकी वजह आर्थिक है न कि राजनीतिक.

मोदी सरकार पर आर्थिक विकास के लिए बहुत दबाव है. देखना यह है कि भारत की आर्थिक ज़रूरत और पाकिस्तान की संबंधों में सुधार की ज़रूरत किस हद तक सचमुच में दोनों देशों के बीच अच्छे संबंधों का कारण बनते हैं.

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