'कुत्ता भी कर सकता है इक़रारे जुर्म'

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कराची में एमक्यूएम के दफ़्तर पर पड़े छापे पर पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में काफ़ी कुछ लिखा गया.

'जंग' ने अपने संपादकीय में लिखा है सुरक्षा बलों के मुताबिक़ सज़ायाफ़्ता अपराधी और टारगेट किलिंग करने वालों की गिरफ़्तारी के अलावा प्रतिबंधित हथियार, नैटो कैंटेनरों से चोरी हथियार, वॉकी टॉकी और बड़ी संख्या में गोलियां बरामद हुईं.

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अख़बार के मुताबिक़, एमक्यूएम समेत सभी सियासी पार्टियां कराची में क़ानून व्यवस्था की राह में बाधा पैदा करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करती हैं.

अख़बार का कहना है कि, जहां देश सुप्रीम कोर्ट कह चुका हो कि राजनीतिक पार्टियों में हिंसक तत्व मौजूद हैं तो वहां कार्रवाई करने में बेहद सावधानी बरतने की ज़रूरत है ताकि फ़ायदे के लिए उठाया गया क़दम कहीं नुक़सान में न बदल जाए.

अख़बार ने इस कार्रवाई के बाद कई जगहों पर एमक्यूएम कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शनों का ज़िक्र भी किया है.

‘जलता कराची’

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'नवाए वक़्त' लिखता है कि कराची पिछले 30 साल से अशांति की आग में जल रहा है और आज न सिर्फ भाषाई गुटबाज़ी बल्कि धार्मिक लबादे में मौजूद दहशतगर्द कराची के अमन के दुश्मन बने हुए हैं.

साथ ही अख़बार ने पीपुल्स पार्टी की तरफ से छापे की निंदा किए जाने पर लिखा है कि महज सीनेट चेयरमैन के चुनाव में मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट के वोट हासिल करने के लिए आसिफ़ अली जरदारी एमक्यूएम के साथ खड़े हो गए.

एमक्यूएम के दफ़्तर पर छापे को लेकर दैनिक इंसाफ़ का संपादकीय है- 'बकरे की मां कब तक ख़ैर मनाती.'

उधर, 'एक्सप्रेस' ने आम आदमी पार्टी की अंदरूनी खींचतान पर भारतीय पत्रकार कुलदीप नैयर का लेख छापा है जिसे शीर्षक दिया गया है- 'आम आदमी पार्टी भी जनता पार्टी की राह पर.'

केजरीवाल को नसीहत

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लेख में अरविंद केजरीवाल को नसीहत दी गई है कि वो मोरारजी देसाई की मिसाल से बचें, जिनकी वजह से जनता पार्टी टूट गई थी क्योंकि अगर आम आदमी पार्टी नाकाम होती है तो फिर कांग्रेस और बीजेपी का विकल्प तैयार करने में सालों साल का अरसा लग जाएगा.

कराची से छपने वाले 'क़ौमी ख़बर' में एक दिलचस्प कार्टून दिखा, जिसमें एक पुलिस वाले ने एक कुत्ते की गर्दन पकड़ रखी है, जो कह रहा है मैं कुत्ता नहीं बिल्ली हूं.

और इसके नीचे पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी लिखी है कि पंजाब पुलिस चाहे तो कुत्ता भी इक़रारे जुर्म कर सकता है.

मनमोहन की मुश्किलें

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रुख़ भारत का करें, तो कोयला घोटाले में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को समन भेजे जाने पर 'हमारा समाज' लिखता है- मनमोहन की मुश्किलें.

अख़बार लिखता है कि कुछ सवाल उठ रहे हैं, मसलन, मनमोहन सिंह एक स्वच्छ छवि और पाक दामन वाले शख्स हैं, तो जो घोटाले उन के दौर में हुए उनकी तरफ़ उन्होंने ध्यान क्यों नहीं दिया, उनके दौर में इतने बड़े घोटाले हो रहे थे, वो अपनी आंखें क्यों मूंदे रहे.

इसके अलावा अख़बार ने ये भी सवाल किया है कि क्या वाजपेयी सरकार के दौरान सभी कोयला आवंटन पारदर्शी तरीक़े से हुए?

‘बीजेपी का ड्रामा’

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'सहाफत' ने भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में अलगाववादी मसर्रत आलम की रिहाई पर हंगामे को बीजेपी का ड्रामा बताया है.

अख़बार ने उन ख़बरों का हवाला दिया है जिनके मुताबिक़ मसर्रत आलम की रिहाई का फ़ैसला जम्मू कश्मीर में पीडीपी-भाजपा की सरकार बनने से पहले उस समय कर लिया गया था जब राज्य में कोई निर्वाचित सरकार नहीं थी.

अख़बार सवाल उठाता है कि क्या ये मुमकिन है कि राज्यपाल शासन में होने वाले फ़ैसलों की केंद्र सरकार को जानकारी न हो.

अख़बार के मुताबिक़, ये जानकारी सामने आने के बाद बीजेपी समेत उन सभी पार्टियों ने खामोशी इख़्तियार कर ली है जो इस पर हंगामा कर रही थीं.

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