क्यों यमन में पांव पसारना चाहता है आईएस?

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यमन की राजधानी सना में दो मस्जिदों पर हुए हमले को देश में हिंसा के नए दौर की शुरुआत माना जा सकता है.

इस हमले में क़रीब 140 लोग मारे गए थे और 350 बुरी तरह ज़ख़्मी हुए थे.

इस हमले से जुड़ी सबसे अहम बात यह है कि इसकी ज़िम्मेदारी चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली है.

अगर वाकई में आईएस ने इस हमले को अंजाम दिया है तो इसने यमन के मौजूदा हालात को और पेचीदा बना दिया है. इससे भी अधिक पेचीदा हो जाएगा आईएस के ख़िलाफ़ संघर्ष.

ताक़त

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आईएस अपने आपको पूरी दुनिया के मुसलमानों का रहनुमा मानता है और पूरी दुनिया में शरीया लागू करना ख़ुदा का हुक़्म समझता है.

इसलिए यह चरमपंथी संगठन मानता है कि उसे हर ओर अपना विस्तार करना चाहिए.

संगठन को विस्तार देना आईएस की रणनीति का मुख्य पहलू है. इससे वे एक मिथक बनाने में सफल होते हैं कि संगठन को रोका नहीं जा सकता है, उन्हें हराया नहीं जा सकता है.

उसके नेता यही प्रचारित भी करना चाहते हैं.

वे आईएस को एक ब्रांड नाम बनाकर मुस्लिमों को अपना आधिपत्य स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं.

लेकिन आईएस अपनी शुरुआती कामयाबी को ग़लत आंक रहा है.

उसे शुरुआती सफलताएं इराक़ी सेना में मनोबल की कमी और सीरियाई विद्रोहियों के पास अत्याधुनिक हथियार न होने से मिली थी. यह इस्लामिक स्टेट की ताक़त की जीत नहीं थी.

रणनीति

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जब आईएस ने यज़ीदियों का क़त्लेआम शुरू किया और अमरीकी बंधकों को मारने लगे तो अमरीका को दखल देना पड़ा.

अमरीकी दखल ने आईएस के विस्तार को बहुत हद तक रोक दिया और कई जगहों पर उन्हें पीछे हटने को मज़बूर कर दिया.

इसके अलावा अमरीकी दखल ने प्रमुख इस्लामी विद्वानों और अल-क़ायदा जैसे प्रतिद्वंदी संगठनों का मन बदल दिया है.

वहीं इराक़ और सीरिया की जटिल परिस्थितियां और मध्य-पूर्व में एक और लड़ाई में फंस जाने के डर ने अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी एक सतर्कतापूर्वक रणनीति तैयार करने पर मजबूर किया है.

नतीजतन, अमरीका और उसके सहयोगी इस्लामिक स्टेट को जड़ से उखाड़ने को लेकर गंभीर नज़र नहीं आ रहे हैं.

इसलिए वो अपने समर्थकों को भी यह विश्वास दिलाने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं कि आईएस मरणासन्न हो चुका है.

दूसरी ओर, इस्लामिक स्टेट विस्तार की अपनी रणनीति के प्रति गंभीर होते हुए भी अपनी लड़ाई जारी नहीं रख पा रहा है.

चेतावनी

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ऐसे हालात में आईएस को अपनी मौजूदगी और कामयाबी कहीं और साबित करनी थी.

नवंबर 2014 में संगठन ने घोषणा की थी कि उसके लड़ाके लीबिया, अल्जीरिया, सिनाई प्रायद्वीप, यमन और सऊदी अरब के जिहादियों के साथ निष्ठा बढ़ाएंगे.

इस साल की शुरुआत से संगठन ने अफ़गान और पाकिस्तानी तालिबान और बोको हराम जैसे चरमपंथी संगठनों को भी अपने प्रभाव में ले लिया था.

इन घोषणाओं के बावजूद वास्तव में इस्लामिक स्टेट की ताकत इराक़ और सीरिया के बाहर सीमित है.

ऐसे हालात में इराक़ और सीरिया के अनुभव से यह पता चलता है कि यमन में हुआ हमला एक चेतावनी है.

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