'मूर्तियां- बेचने की और, तोड़ने की और..'

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चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट दुनिया का सबसे धनी चरमपंथी समूह है. जिन्होंने इस समूह के प्रचार के भौंडे वीडियो देखे हैं, उन्होंने चरमपंथियों को चमचमाती नई महंगी स्पोर्ट्स कारों को भी चलाते हुए देखा होगा.

विश्लेषकों का कहना है कि ये पैसे चंदा, तेल की तस्करी (रोज़ाना 16.45 लाख डॉलर), अपहरण (पिछले साल दो करोड़ डॉलर की कमाई), मानव तस्करी, जबरन वसूली, डाके और अंत में कीमती पुरातन वस्तुओं की बिक्री से आता है.

ये आय का फ़ायदेमंद ज़रिए बन गया है और ये स्पष्ट होता है कि दमिश्क के पश्चिम में स्थित अल-नाबुक से लूटी गई चीजों की बिक्री से. एक रिपोर्ट के अनुसार इन लूटी गई चीज़ों की बिक्री से 3.6 करोड़ डॉलर की आय हुई.

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ये लोग एक ओर जहां निमरूद, नीनेवेह और हत्रा में मौजूद प्राचीन स्थलों को नष्ट कर रहे हैं, वहीं इन स्थानों से मिली अनेकों कलाकृतियाँ चोर बाज़ार में बिकती हुई मिल रही हैं.

आईएस इसके लिए या तो तथाकथित 'बुलडोज़र आर्कियोलोजी' का प्रयोग करता है या फिर स्थानीय लोगों को इन स्थानों और मकबरों को खोदने के काम पर लगाता है.

बुलडोज़र आर्कियोलोजी का मतलब है इन स्थानों पर इन कलाकृतियों को खोजने के लिए किसी भी उपलब्ध मशीन का प्रयोग करना, जिससे इन स्थानों को क्षति पहुँचती है.

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'मूर्तियां- बेचने की और, तोड़ने की और'

फिर चरमपंथी समूह इन बेशकीमती वस्तुओं की कीमत के अनुरूप टैक्स वसूलता है, जिसकी शरिया कानून के तहत इजाज़त है. ज़मीन के नीचे से क्या निकला, इसकी जानकारी किसी को नहीं होती और बाद में इस तरह की लूट की पहचान असंभव होती है.

मूसल म्यूज़ियम में प्राचीन असीरियाई मूर्तियों को "तुच्छ मूर्ति" कहते हुए नष्ट करने वाले आईएस के उस वीडियो को देखकर धोखा मत खाइए.

आईएस ने ऐसी बेशकीमती स्मारकों को क्षतिग्रस्त इसलिए किया क्योंकि उनको वह बेच नहीं सकता था. इस बात के सबूत हैं कि जिन कीमती वस्तुओं को वह वहां से उठाकर ले जा सकते थे उन्हें वह बेच रहे हैं.

इराक़ के राष्ट्रीय प्राचीनकालीन विभाग के फ़ौजे अल-महदी का कहना है कि म्यूज़ियम में मौजूद कोई भी मूर्ति असली नहीं थी और वो सभी प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बनी उनकी नकल थीं.

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यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के पुरातत्व संस्थान के डॉ. मार्क अलतावील कहते हैं, "बग़दाद म्यूज़ियम की वे सभी मूर्तियां मौलिक की कॉपी थीं और उन्हें तब बनाया गया था जब इराक़ में क्षेत्रीय म्यूज़ियम बनाए जा रहे थे. पश्चिमी देशों में भारी मांग होने की वजह से मूसल में पिछले 25 सालों से भारी लूट मची हुई है."

छोटा है तो बेहतर है

दुनिया में चोरी की कलाकृतियों का पता लगाने के काम में जुटी कंपनियों में से एक है एम्स्टर्डम की आर्टियाज़.

आर्टियाज़ के आर्थर ब्रैंड ने इस चोरी के धंधे को "ब्लड एंटीक्स" का नाम दिया है. वैसे पुरातन वस्तुएं सामान्यतः ब्लड डायमंड की तुलना में आसानी से इधर से उधर नहीं ले जायी जा सकती है, लेकिन इनकी कीमत ब्लड डायमंड की तुलना में कहीं अधिक होती है.

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यूरोप के काला बाज़ार से सीरिया और इराक़ की कलाकृतियों की ख़रीद-फ़रोख़्त की कई रिपोर्टें आ रही हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, स्कॉटलैंड यार्ड सीरियाई प्राचीन कलाकृतियों से जुड़े चार मामलों की जांच कर रहा है - पर वित्तीय मदद के बिना लूटी हुई कलाकृतियों के काला बाज़ार और संबंधित नेटवर्क को बंद करना असंभव है.

जिन वस्तुओं की काफी मांग है उनमें प्राचीन तख्तियाँ, मर्तबान, सिक्के, शीशे और विशेषकर मोज़ेक हैं, जिन्हें आसानी से टुकड़ों में बाहर भेजा जा सकता है.

ऐसी चीज़ें जो ज़्यादा छोटी होती हैं और जिनको आसानी से छिपाया जा सकता है और बाहर भेजा जा सकता है, उनकी ज़्यादा कीमत मिलती है.

"बहुत मशहूर चीज़ों की कीमत उनकी वास्तविक कीमत का एक मामूली हिस्सा होती है. अवैध तरीके से बेची जा रही कोई बड़ी वस्तु, काला बाज़ार में वास्तविक कीमत के 10-15 फ़ीसदी पर बिकती है लेकिन अगर वह वस्तु छोटी हो और उसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सके तो उसकी कीमत बढ़ जाती है."

आईएस अपने खर्चों को पूरा करने के लिए ब्लड एंटीक्स का प्रयोग करने वाला पहला चरमपंथी संगठन नहीं है.

1974 में आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (आईआरए) ने पुरानी बेशकीमती पेंटिंग्स चुरा लीं, उस समय उस कृति की कीमत 120 लाख डॉलर थी.

तोड़ो और हथियाओ

सीरिया और इराक़ से लूटी गए हजारों कलाकृतियों में से सिर्फ कुछ ही दोबारा नज़र आएँगी. ये कलाकृतियां यूरोप और अमरीका के निजी संग्रहों में पहुंचें जाएँगी जहां इस्लाम-पूर्व की इन वस्तुओं की विशेष मांग है. इनके अलावा ये जापान और आस्ट्रेलिया में भी ऐसे ही लोगों के पास चली जाएंगीं. अगर ये वापस मिल भी जाती हैं तो जांचकर्ताओं को इनको हासिल करने में सालों लग जाते हैं.

पिछले महीने अमरीकी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (आईसीई) ने लगभग 60 कलाकृतियों को प्रदर्शित किया जिनमें असीरियाई राजा सरयून द्वितीय का बहुत ही खूबसूरत सिर भी शामिल था जिसकी कीमत बाजार में 12 लाख डॉलर है.

ऑपरेशन लॉस्ट ट्रेयर 2008 में शुरू किया गया था जब यह बात उड़ी थी कि दुबई का एंटीक डीलर हसन फज़ैली अवैध वस्तुएं जहाज़ से अमरीका भेज रहा है.

सरयून द्वितीय के सिर वाली कलाकृति के मूल रूप से तुर्की से आने का पता चला और दस्तावेजों में इसकी कीमत 6,500 डॉलर घोषित की गई थी. तस्करी की अन्य वस्तुओं में मिस्र की अंत्येष्टि नाव भी शामिल थी जिसकी कीमत 57,000 डॉलर आंकी गई. कुछ शिपमेंट का सीधे न्यूयॉर्क के बड़े म्यूज़ियम्स, गैलरी और आर्ट हाउस से संबंध था.

हालांकि, आईसीई की जब्त की गई वस्तुएं इराक़़ युद्ध के समय की थीं.

वर्ष 2003 में इराक़़ युद्ध के समय, यह जानते हुए कि युद्ध के कारण कलाकृतियों का भारी नुकसान होगा पुरातत्वविदों, म्यूज़ियम के निदेशकों, और कला की दुनिया के प्रमुख लोगों ने पेंटागन के अधिकारियों के साथ बैठक की थी.

लेकिन यह बैठक बगदाद के नेशनल म्यूज़ियम को लूटे जाने से भी नहीं बचा सकी.

इतना ही नहीं, उस समय के हुकूमत ने लूट को ये कहते हुए प्रोत्साहन दिया कि ये कलाकृतियां म्यूज़ियम की बजाय अन्य जगहों पर ज़्यादा सुरक्षित हैं.

ख़तरनाक है खेल

गहनों, सीरेमिक्स और मूर्तियों सहित 15 हज़ार से अधिक वस्तुएं म्यूज़ियम से चुरा ली गईं. एक बहुत ही प्रसिद्ध कृति जो चुराई गई वह 5000 साल पुराना फूलदान था जिसे बाद में जब बरामद किया गया तो वह 14 हिस्सों में टूटा हुआ मिला.

इसके अलावा उर की वीणा जिसे दुनिया का सर्वाधिक पुराना वाद्य यंत्र कहा जाता है, चुराए जाने के बाद जब मिला तो वह बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका था.

सैकड़ों कलाकृतियाँ तो अभी तक नहीं मिली हैं और ओटोमन साम्राज्य का पिछले 500 वर्षों का रिकार्ड नष्ट हो गया. इनके अलावा पिकासो और मिरो की कृतियां आग की भेंट चढ़ गईं. एक अनुमान के अनुसार इराक़ से चुराई गई कलाकृतियों की कीमत 10 अरब डॉलर तक हो सकती है.

लूटी गई कलाकृतियां बाजार में आने से पहले कई हाथों से गुज़रती हैं और कई बार तो दशकों तक यह बाजार में नहीं आती हैं.

एसोसिएशन फॉर रिसर्च ऑफ क्राइम्स अगेन्स्ट आर्ट की प्रेसिडेंट लिंडा अल्बर्ट्सन के अनुसार, "ये कहना मुश्किल है कि आईएस काला बाज़ारी से कितने की कमाई कर रहा है क्योंकि किसी लूटी गई वस्तु के दोबारा बाज़ार में आने में दशकों लग जाएंगे. उदाहरण के तौर पर कंबोडिया के अंगकोर वाट की कलाकृतियां गृहयुद्ध समाप्त होने के 40 साल बाद नीलामी में दिखीं."

ऐसे कला संग्राहक दुनिया भर की सांस्कृतिक धरोहरों की तबाही के लिए काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.

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