'बमबारी से बचने के लिए दुबके बैठे हैं लोग'

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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सीरिया की राजधानी दमिश्क के यारमुक शिविर में फलस्तीनी शरणार्थियों की हालत पर चिंता जताई है.

सुरक्षा परिषद का मानना है कि इस शिविर में फंसे 18,000 फ़लस्तीनियों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. ऐसे में उन तक मानवीय मदद फौरन पहुंचाने की ज़रूरत है.

इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने एक अप्रैल को इस शिविर पर हमला किया था.

15 सदस्यों वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्ष और जॉर्डन की राजदूत दीना कवर ने लोगों की सुरक्षा और उनके लिए मानवीय सहायता अपील की है.

बदतर होते हालात

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सुरक्षा परिषद की एक रिपोर्ट सुनाते हुए फ़लस्तीनी राहत एजेंसी उंवरा के पियरे क्राह्नबुह्ल ने कहा हालात इतने बदतर कभी नहीं थे.

संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन के मुख्य प्रतिनिधि रियाद मंसूर ने कहा कि उनके लोग पहले ही काफी कष्ट झेल चुके हैं और फलस्तीनी लोग सीरिया के अंदरूनी विवाद में शामिल भी नहीं हैं.

रियाद मंसूर के मुताबिक इन शरणार्थियों को बचाना फिलहाल उनकी सरकार की प्राथमिकता है.

पुराना है यारमुक शिविर

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राहत एजेंसी उंवरा के एक और अधिकारी ने बताया कि शिविर में बिजली-पानी नहीं है, खाने की चीज़ें नहीं है और लोग अपने घरों में बमबारी से बचने के लिए यहां दुबके बैठे हैं.

हालांकि कुछ फलस्तीनी वहां से भागने में कामयाब रहे लेकिन ज़्यादातर अब भी इस लड़ाई को झेल रहे हैं.

सीरिया में इस लड़ाई को चार साल हो चुके हैं और इसमें तकरीबन दो लाख लोग मारे जा चुके हैं और एक करोड़ दस लाख लोग बेघर हो चुके हैं.

फलस्तीनी शरणार्थियों का इस संघर्ष से कोई सीधा संबंध नहीं है. यारमुक शिविर उन फलस्तीनियों के लिए बनाया गया था जो वर्ष 1948 में अरब-इसराइल युद्ध से बच कर सीरिया आए थे.

सीरिया में गृह युद्ध शुरू होने से पहले इस शिविर में लगभग 150,000 शरणार्थी रहते थे.

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