जिन्हें भाती है पिंक ड्रेस और गुड़िया

ट्रांसजेंडर बच्चे

ट्रांसजेंडर होने का एहसास बच्चों के साथ उनके अभिभावकों के लिए भी बहुत पीड़ादायी होता है.

इस एहसास को ‘जेंडर डिस्फ़ोरिया’ कहते हैं जो कोई मानसिक बीमारी नहीं है और इसका इलाज हो सकता है.

इसकी जटिलताओं को लेकर आम तौर पर लोग सामने नहीं आते, इसीलिए इनकी संख्या की बहुत सटीक जानकारी नहीं है.

लेकिन ब्रिटेन में पिछले छह सालों में इस एहसास से जूझ रहे 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की आने वाली शिकायतों में चार गुना से भी ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है.

लिली (6) और जेसिका (8) (बदले हुए नाम) भी इन्हीं बच्चों में से हैं, जो लड़के के रूप में पैदा हुई थीं.

लेकिन जैसे-जैसे बड़ी हुईं वो हर उस चीज़ से जुड़ती चली गईं जिनका संबंध लड़कियों से होता है, मसलन, नाम, पोशाक, रंग, खिलौने, गुड़िया आदि.

विस्तार से पढ़ें

इन्हें खेलता हुआ देखकर अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि वो लड़के के रूप में पैदा हुई थीं.

इनके अभिभावकों के अनुसार, "बहुत कम उम्र से ही दोनों बच्चे अपने लिंग को लेकर सचेत थे. वे अपने लिंग से अधिकाधिक नाखुश और लड़कियों जैसे पोशाक और खिलौनों की ओर आकर्षित होते गए."

लिली कहती हैं, "अगर मुझे लड़कों जैसा रहना पड़ता तो मैं वाकई बहुत परेशान होती. लेकिन अब मैं लड़कियों की तरह रह रही हूं इसलिए बेहतर महसूस करती हूँ."

जेसिका का कहना है, "लड़के रूप में रहना बहुत हताश करने वाला था. मुझे ऐसा लगा कि मैं लड़के के रूप में फिट नहीं बैठती."

इन बच्चों के अभिभावकों ने बताया कि स्कूल में ये टॉयलेट नहीं जाती थीं क्योंकि लड़के सोचते थे कि ये लड़कियां हैं और अपने टॉयलेट इस्तेमाल नहीं करने देना चाहते थे.

जबकि उन्हें लड़कियों के टॉयलेट इस्तेमाल की इजाजत नहीं थी, इसलिए वो स्कूल में कभी पानी नहीं पीती थीं, ताकि घर आने तक उन्हें टॉयलेट जाने की ज़रूरत न पड़े.

साल 2012 में इक्वलिटी एंड ह्यूमन राइट कमिशन द्वारा ब्रिटेन में 10,000 लोगों पर किए गए सर्वे से पता चला कि पूरी आबादी में एक फ़ीसदी लोग ट्रांसजेंडर हैं.

लेकिन सच्चाई क्या है इसका अंदाज़ा किसी को नहीं है क्योंकि अधिकांश लोग कभी भी मदद के लिए सामने नहीं आते.

जेंडर डिस्फ़ोरिया

कुछ लोग सोचते हैं कि ज़रूर ऐसे बच्चों के मां बाप ने उन्हें इस तरह की परवरिश कर उनकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी है या वो सोचते हैं कि लड़की की चाहत में मां बाप ने ऐसी परवरिश दी.

लेकिन ऐसा नहीं है. मैंने अभिभावकों को हताशा से गुजरते और यह पूछते पाया कि क्या उन्होंने कुछ ग़लत किया है और ऐसी संवेदनशील परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए देखा है.

ऐसे माता पिता खुद को बहुत अजीबो ग़रीब स्थिति में पाते हैं, जिनके बड़े बेटे हैं और वो लड़कों की तरह ही हैं.

इन बच्चों के अभिभावकों को जेंडर डिस्फ़ोरिया के बारे में तब पता चला जब उन्होंने गूगल में तलाश किया कि "अगर मेरा बेटा लड़कियों की तरह पोशाक पहनना चाहता है तो इसमें क्या कोई चिंता की बात है?"

लिली की मां जेन कहती हैं, "जब लिली चार साल की थीं, एक बार लड़कियों के ड्रेस और नेकलेस पहन कर कहा कि क्या मैं बड़ी हो कर ऐसा ड्रेस पहन सकती हूँ."

जेन के अनुसार, "पहले तो मैंने सोचा कि बच्चे ऐसा कहते हैं लेकिन बड़े होने के बाद सब ठीक हो जाएगा और हो सकता है कि वो गे के रूप में बड़ा हो."

लड़की जैसी चाहत

जेन कहती हैं, "इस सच्चाई को स्वीकारना बहुत कठिन होता है कि आपका बच्चा संभवत: ट्रांस जेंडर है. दो साल पहले हमने एक वीडियो देखा जिसमें एक अमरीकी दंपति ट्रांसजेंडर बच्चे के बारे में बात कर रहे हैं. तब मुझे लगा कि ये तो वही बात है जिसका हम सामना कर रहे हैं."

जेन और उनके पति को अचानक इस बात का पता नहीं चला कि उनके बच्चे जेंडर डिस्फ़ोरिया का शिकार हैं, यह धीरे-धीरे उजागर हुआ.

जेन कहती हैं, "वो तीन साल का था उसने एक खिलौने की दुकान में बार्बी डॉल की मांग की. मैंने कहा कि यह लड़कियों के खेलने वाला खिलौना है. लेकिन वो हमेशा लड़कियों वाले खिलौनों की ओर आकर्षित होता रहा. दो और तीन साल की उम्र में वो हमेशा गुड़ियों, गुलाबी ड्रेस और राजकुमारी जैसी चीजों को पाना चाहता था."

जेसिका के पिता और मां एला कुछ साल पहले अलग हो गए थे. जेसिका अपनी दूसरी मां को ‘सौतेली मां’ कहती हैं.

जबकि एला को लगता है कि कहीं उनके आपसी संबंध का तो बच्चों पर असर नहीं पड़ा. हालांकि वो कहती हैं कि दो बड़े बेटों को उन्होंने इसी तरह पाला था.

विशेषज्ञों का कहना है कि जेंडर पहचान का मुद्दा बच्चे और उनके परिवार के लिए बहुत कष्टकारी होता है.

मदद का वक़्त

लेकिन इस मामले में तब तक कोई मेडिकल मदद नहीं दी जा सकती जब तक बच्चा जवान नहीं हो जाता.

लिंग परिवर्तन के लिए अनुमानित खर्च 10,000 पौंड (लगभग 10 लाख रुपए) के क़रीब आता है.

ट्रांसजेंडर लोगों के लिए ज़िंदगी काफ़ी मुश्किल होती है. पिछले साल मानसिक सेहत पर निगरानी रखने वाली एक संस्था पीएसीई के एक सर्वे में पता चला कि ऐसे 59 फ़ीसदी लोगों ने खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार