लखवी की रिहाई, पाकिस्तानी ख़ुश हों या दुखी

इमेज कॉपीरइट Getty

पाकिस्तान के आम लोगों को मालूम नहीं कि मुंबई हमलों के केस में मुख्य अभियुक्त ज़की-उर-रहमान लखवी की रिहाई पर ख़ुशी जताएं या फिर ग़म.

खुशी इस बात पर कि ‘एक बेक़सूर व्यक्ति’ को इतने लंबे समय तक जेल में रखा गया, या फिर ग़म इस पर कि पाकिस्तान सरकार और भारत मिल कर एक अभियुक्त को मुजरिम नहीं साबित कर सके.

आम तौर पर इस बारे में लोगों की राय मिली जुली है.

भारत और पाकिस्तान की सरकारें ज़की-उर-रहमान लखवी के मुक़दमे में सबूतों को लेकर ही लड़-लड़ कर थक गई, लेकिन जो फ़ैसला वो चाहती थीं वो सामने नहीं आ सका.

पाकिस्तानी पंजाब प्रांत की सरकार ने 14 मार्च को चौथी बार लखवी की नज़रबंदी के आदेश जारी किए थे. आख़िर कब तक ऐसा चलता.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption 2008 में हुए हमलों में होटल ताज समेत मुंबई के कई ठिकानों को निशाना बनाया गया

मुंबई हमलों में शामिल होने या न होने को लेकर लखवी का मुक़दमा आठ बरसों के बाद भी शुरू न हो सका.

न आगे बढ़ेंगे न पीछे

दोनों देशों के रिश्तों में बेहतरी तो दूर की बात है, दोनों देशों के बीच ये छोटा सा मुक़दमा भी किसी नतीजे तक नहीं पहुंच पाया.

अभियुक्त या चश्मदीदों तक पहुंच मुहैया कराने की समस्या और क़ानूनी पेचीदगियों ने दोनों को किसी नतीजे पर पहुंचने से रोक दिया.

अतीत की तरह और कुछ तो नहीं होगा, बस दिल्ली और इस्लामाबाद एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराएंगे.. न बात आगे बढ़ेगी और न पीछे.

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने पहले ही बयान में इस रिहाई की वजह भारत की तरफ़ से सहयोग न किए जाने को बता दिया है जिससे क़ीमती वक़्त बर्बाद हुआ और सरकार का मुक़दमा कमज़ोर हुआ.

बंद कमरे में अदालती कार्यवाही की वजह से मीडिया के लिए ये मुमकिन ही नहीं कि कोई राय क़ायम कर सकता कि कार्यवाही कितनी पारदर्शी है या नहीं और सबूत कितने ठोस है या नहीं.

ज़्यादा चर्चा नहीं

इमेज कॉपीरइट AP

पाकिस्तानी मीडिया ने भी इस ख़बर को ज़्यादा अहमियत नहीं दी है. अंग्रेज़ी के एक बड़े अख़बार ने आख़िरी पन्ने पर जगह दी तो दूसरे ने एक कॉलम की ख़बर के तौर पर प्रकाशित किया.

यही सूरत-ए-हाल सोशल मीडिया पर भी देखने को मिल रही है. भारतीय लोग बढ़-चढ़ कर पाकिस्तान की आलोचना कर रहे हैं और कह रहे हैं कि ‘अगर पेशावर स्कूल हमला हुआ तो अच्छा हुआ’, लेकिन इसके जवाब में पाकिस्तान से कोई ज़्यादा ट्वीट नहीं किए जा रहे हैं.

एक ही क़ाबिल-ए-जिक्र ट्वीट पूर्व सांसद फ़राह नाज़ इस्फ़हानी की तरफ़ से देखने को मिला है जिसमें लखवी की रिहाई को ‘शर्मिंदगी’ और पाकिस्तान की सॉफ़्ट इमेज के लिए ‘बुरा’ क़रार दिया.

लेकिन वहीं जानकार रज़ा रूमी ने इसे लखवी के लिए ‘आख़िरकार न्याय’ बताया है.

भारत और अमरीकी दबाव

इमेज कॉपीरइट AP

इस्लामाबाद के सरकारी हलकों में इस बात का अहसास है कि आने वाले दिनों में भारत और अमरीका दोनों इस पर ख़ामोश नहीं रहेंगे.

इन दोनों की प्रतिक्रिया किस तरह की होगी, इसका अंदाज़ा भी पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान लगा चुका होगा.

शायद वो समझते हैं कि पाकिस्तान पर बयानों के ज़रिए दबाव डालने की कोशिश की गई तो कोई ज़्यादा मुश्किल नहीं होगी लेकिन बात अगर इससे आगे बढ़ती है तो रणनीति के बारे में सोचा जाएगा.

फ़िलहाल पाकिस्तान सरकार का अगला कदम क्या होगा, ये बात अमरीका और भारत की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार