ग्रेट कैनन: दुश्मनों को पछाड़ने का चीनी हथियार?

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टोरंटो विश्वविद्यालय से जुड़े एक संस्थान का दावा है कि चीन ने इटंरनेट पर अपनी 'दुश्मन वेबसाइट्स' पर काब़ू पाने के लिए कुछ बेहद घातक हथियार इजाद कर लिए हैं.

विश्वविद्यालय के मंक स्कूल ऑफ़ ग्लोबल अफ़ेयर्स की सिटिज़न लैब के शोधकर्ताओं ने शुक्रवार को 'ग्रेट कैनन' नाम से रिपोर्ट प्रकाशित की है.

सिटिज़न लैब का कहना है कि इस साल मार्च के महीने में गिटहब और ग्रेटफ़ायर सर्वर पर हुए हमले में चीन का हाथ होने के संकेत हैं.

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ग्रेटफ़ायर डॉटओआरजी ने लोगों को इंटरनेट पर चीन सरकार के प्रतिबंध को लाँघने के तरीक़े सिखाए थे.

एक बड़े हमले के बाद ग्रेटफ़ायर डॉटओआरजी लगभग अपंग हो गया है.

कहां से हुई शुरुआत?

मार्च में ग्रेटफ़ायर डॉटओआरजी ने चीन में कुछ वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगाए जाने के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ी थी. इसने गिटहब पर इस सरकारी प्रतिबंध को लांघकर चीन में प्रतिबंधित वेबसाइटों को देख सकने के तरीक़े पोस्ट किए.

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माना जा रहा है कि इसको रोकने के लिए गिटहब पर हमले हुए हैं. इस तरह के हमलों को डीडीओएस या डिस्ट्रिब्यूटेड डिनायल ऑफ़ सर्विस कहते हैं.

यह वेबसाइट को अपंग कर देने वाला हमला होता है जिसमें वेबसाइट पर इतना ट्रैफ़िक भेज दिया जाता है कि वह इसे संभाल ही न पाए और क्रैश हो जाए. ठीक उस तरह जैसे आपके घर के चारों ओर एक समय में इतने लोग जमा हो जाएं कि आप घर से बाहर ही न निकल पाएं.

इस साल 30 मार्च में हुए एक प्रेस कांफ्रेंस में चीन ने इससे इनकार किया था.

पढ़ें पूरी रिपोर्ट 'चीन का ग्रेट कैनन'

जटिल था यह हमला

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ग्रेटफ़ायर ने 19 मार्च को ट्विटर पर और गिटहब ने 27 मार्च को साइबर हमले की पुष्टि की थी.

गिटहब ने अपने ब्लॉग में कहा कि 26 मार्च से इस पर हमला शुरू हुआ था और इसमें किसी नई जटिल तकनीक का इस्तेमाल किया गया था.

शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसा लगता है कि इस हमले के पीछे 'ग्रेट कैनन' था जिसमें चीन का हाथ होने की संभावना है.

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रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की इंटरनेट फ़िल्टरिंग की कोशिशों को 'ग्रेट फ़ायरवॉल' के नाम से जाना जाता है. यह एक तरीक़ा है जो विदेशी सर्वर्स से आ रहे किसी भी तरह के प्रतिबंधित कंटेंट के अनुरोध को बंद कर देता है.

इससे सर्च करने वाले को कोई नतीजा नहीं मिलता.

क्या हैं 'ग्रेट फ़ायरवॉल'?

चीन के इंटरनेट पर पाबंदी लगाने के विभिन्न कदमों को दुनिया 'ग्रेट फ़ायरवॉल' के नाम से जानती है. यह चीन के गोल्डन शील्ड प्रोजेक्ट का हिस्सा है जिसने 2006 में काम करना शुरू किया था.

रिपोर्ट के अनुसार यह पब्लिक सिक्योरिटी मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है.

शोधकर्ताओं की रिपोर्ट कहती है कि 'ग्रेट फ़ायरवॉल' से चीन अपने देश के भीतर सर्च किए जा रहे प्रतिबंधित कन्टेंट को ब्लॉक कर देता है.

रिपोर्ट के अनुसार 'ग्रेट कैनन' सर्च करने वाले ब्राउज़र में मैलिशियस कोड डालकर चीन की ओर आ रहे प्रतिबंधत कंटेट का रुख़ मोड़ने का तरीक़ा है. इस तरीके में पूरे कंटेट को एक नई दिशा या वेबसाइट की तरफ़ भेजा जा सकता है.

'चीन के शामिल होने के संकेत'

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मार्च में साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ, मिक्को हिपोनेन के ट्वीट को देखें तो पता चलता है कि उन्होंने गिटहब हमले में इस प्रकार के एक तरफ़ जा रहे ट्रैफ़िक को दूसरी तरफ़ भेजे जाने के संकेत दिए थे.

उन्होंने ट्वीट में कहा था "गिटहब पर हुए डीडीओएस हमले में लगता है कि बाइडू (चीन का सर्च इंजन) की ओर जा रहा इंटरनेट ट्रैफिक गिटहब की ओर आ रहा है."

हालाँकि शोधकर्ताओं ने इस रिपोर्ट में 'ग्रेट कैनन' के निर्माण में चीन का हाथ होने की पुष्टि नहीं की है पर माना है कि 'द ग्रेट फ़ायरवॉल' और 'ग्रेट कैनन' के सोर्स कोड (साफ़्टवेयर) में समानताएं हैं.

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जिसके कारण यह माना जा सकता है कि 'ग्रेट कैनन' 'ग्रेट फ़ायरवॉल' के संस्थागत ढांचे पर ही बनाया गया होगा.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चूंकि केवल दो ही रिपोज़िटरी को निशाना बनाया गया है, जिनमें प्रतिबंधित कंटेंट को लांघने के तरीके सिखाए गए थे. इसलिए भी इसमें चीन का हाथ होने की आशंका है.

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