आज एमबीए करने का कोई फ़ायदा भी है?

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कुछ समय पहले तक एमबीए पाठ्यक्रम की बड़ी अहमियत थी. माना जाता है कि बिज़नेस एडमिनेस्ट्रेशन में मास्टर करने से आपके करियर और वेतन पैकेज में अचानक से उछाल आ जाता है.

लेकिन क्या अब वाकई में ऐसा होता है? क्या कारोबार की दुनिया में कामयाब होने की लिए एमबीए की डिग्री किसी काम की है?

लिंक्डइन इंफ़्लूएंशर्स पर इस सप्ताह इसी टॉपिक पर बहस देखने को मिली. हम इनमें से दो लोगों की राय आपके सामने एक रहे हैं. एक एमबीए डिग्री को अभी भी बेहद जरूरी मानते हैं, जबकि दूसरी राय एकदम अलग है.

रेयान होम्स, हूटसुइट के सीईओ

जब मैं 20 साल का था, तो कॉलेज से ड्रॉपआउट करके मैंने पीट्ज़ा की दुकान खोली. उस वक्त ये कोई आसान फ़ैसला नहीं था. कॉलेज ड्रॉपआउट के भविष्य को लेकर तमाम आशंकाएं होती थीं.

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होम्स ने अपनी पोस्ट 'हाउ आई स्किप्ड द एमबीए एंड व्हाय यू शुड टू' में अपने अनुभवों के बारे में लिखा है.

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उन्होंने लिखा है, "मैं 1.1 करोड़ यूज़र्स वाली कंपनी का सीईओ हूं. दुनिया की 100 बड़ी कंपनियों में भी कुछ यूजर्स शामिल हैं. दुनिया में छह देशों में हमारे दफ़्तर हैं और करीब 700 कर्मचारी हमारे यहां काम करते हैं. हर दिन हम टेक्नॉलॉजी की दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली इंजीनियर, डिज़ाइनर और मार्केटिंग माइंड्स के साथ काम करते हैं."

होम्स आगे लिखते हैं कि अगर वे अपने कॉलेज की पढ़ाई को पूरा करने के लिए एक साल तक रुक जाते या फिर एमबीए हासिल करने लगते तो क्या यहां तक पहुंच पाते?

वे ख़ुद ही कहते हैं शायद नहीं.

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होम्स ने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में यूनिवर्सिटी की पढ़ाई महंगी होती जा रही है और आज की अर्थव्यवस्था में पढ़ाई में हुए निवेश की वापसी की गारंटी नहीं है.

'एमबीए रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट नहीं'

होम्स के मुताबिक, "ये एमबीए के साथ भी हो सकता है. ओद्यौगिक मानसिकता वाले युवाओं के लिए एमबीए अब सबसे बेहतर विकल्प नहीं रहा है."

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ऐसा क्यों है, इसके पीछे होम्स कई वजह बताते हैं.

1. एमबीए से सेलरी पर असर नहीं- एमबीए ग्रेजुएट्स की सेलरी समय के साथ लगातार कम हो रही है, वहीं दूसरी ओर एमबीए की पढ़ाई लगातार महंगी होती जा रही है. 1990 के दशक में अमरीका के शीर्ष एमबीए संस्थानों से एमबीए करने वालों की सेलरी पांच साल में तीन गुना बढ़ जाती थी, लेकिन 2008-09 में ये देखने को मिला कि उन्हीं एमबीए संस्थानों के ग्रेजुएट को आधी सेलरी पर नौकरी शुरू करनी पड़ी.

जबकि हार्वर्ड और कोलंबिया विश्वविद्लाय से दो साल के एमबीए पाठ्यक्रम का शिक्षण शुल्क 300,000 डॉलर से भी ज़्यादा हो चुका है.

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2. एमबीए की डिग्री से नेटवर्क नहीं तैयार होता- बीते एक दशक के दौरान डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने उन तौर तरीकों को बदला है जिनसे हमारा नेटवर्क तैयार होता था.

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बेहतर नेटवर्क के जरिए बिज़नेस इंफ़्लूएंशर्स और डिसाईन मेकर्स से अच्छे अवसर मिलने के चांसेज होते हैं. लेकिन अब इस तरह के नेटवर्क की कोई जरुरत नहीं होती और आपके कॉलेज के साथी इस प्रतिस्पर्धी युग में भरोसेमंद रहें, ये भी जरूरी नहीं है."

जॉन ए बेयर्न, चेयरमैन, सी-चेंज मीडिया इंक

पिछले पांच सालों में जिन युवाओं ने एमबीए करने का फ़ैसला लिया, उनके लिए ये समय काफी शानदार साबित हुआ. उन्हें कहीं ज्यादा बेहतर करियर विकल्प मिले हैं और उनकी सेलरी में भी काफी इजाफ़ा हुआ है.

बेयर्न ने अपने पोस्ट में 'वाय द एमबीए रिमेंस वन ऑफ़ द मोस्ट वैल्यूबल डिग्रीज़ एवर' में एमबीए को काफी अहमियत देते हैं. वे आगे कहते हैं, "एमबीए कि डिग्री उन कुछ चुनिंदा डिग्रियों में शामिल है जिसका तुरंत फ़ायदा होता है."

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बेयर्न इसके सबूत के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं नए एमबीए ग्रेजुएटों की सेलरी को देखिए.

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बेयर्न कहते हैं, "अमरीका के शीर्ष 16 बिज़नेस स्कूल में सेलरी 1.10 लाख से 1.25 लाख डॉलर सालाना है. वहीं मंझोले बिज़नेस स्कूल के ग्रेजुएटों को नियुक्ति के दौरान 25 हज़ार डॉलर तक मिलता है. इन सबके अलावा बोनस, ट्यूशन फी, शेयर और स्थानांतरित होने के खर्चे भी अलग से मिलते हैं."

एमबीए आज भी फ़ायदेमंद

बेयर्न के मुताबिक लंदन बिज़नेस स्कूल, आईएनएसईएडी, आईईएसई बिज़नेस स्कूल स्पेन के छात्र भी ऊपरी रेंज में आते हैं.

बेयर्न कहते हैं, "पिछले साल, इमॉरे, व्हार्टन और शिकागो के 98 फ़ीसदी एमबीए ग्रेजुएट्स को तीन महीने के अंदर जॉब मिल गई थी. किसी भी शीर्ष स्कूल से पास आउट 90 फ़ीसदी युवाओं को तीन महीने के अंदर नौकरी मिल गई."

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बेयर्न के मुताबिक आर्थिक मंदी का दौर पीछे छूट गया है. उनके मुताबिक 2015 का साल बिज़नेस स्कूलों के छात्र के लिए सबसे अच्छा साल साबित होने वाला है.

बेयर्न के मुताबिक कारपोरेट नियोक्ता दूसरी श्रेणी के बिज़नेस स्कूलों तक पहुंच रहे हैं, ख़ासकर फ़ाइनेंसियल सर्विस में काफी नौकरियां मिल रही हैं. इसके चलते एमबीए पास युवाओं को बेहतर अवसर मिलेंगे.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहाँ पढ़ें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.

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